Manto… Bol ke lab azaad hai tere !!!

मंटो समीक्षा (Manto Review)

4*/5*
“नीम के पत्ते कड़वे सही पर खून तो साफ करते है।”
“अगर आप मेरे अफसानों को बर्दाश्त नहीं कर सकते तो जमाना ही नाक़ाबिले बर्दाश्त है।”
इन जुमलों से आप इन को कहने वाले कि बेबाक़ी का अंदाजा तो साफ तौर पर लगा सकते है। बेबाक़ी एक हुनर है जो सब में नहीं होता और जिसमें होता है वो नाक़ाबिले बर्दाश्त होता है। नंदिता दास के निर्देशन में बनी फ़िल्म मंटो, पाकिस्तान के मशहूर अफ़साना निगार सआदत हसन मंटो की बायोपिक है। जिन के अफसानों पर ताउम्र अश्लीलता का इल्जाम लगता रहा। कुछ शख्सियतें ऐसी होती है, जिन को अपने होने का सही कारण पता होता है। ऐसी ही शख्सियत के धनी थे मंटो। उन की कहानियां हकीकत के क़रीब और समाज का स्पष्ट दर्पण हुआ करती थी।
कुछ फिल्में ऐसी होती है जो हमारें क़ाबिल नहीं होती और कुछ फिल्मों के क़ाबिल हम नहीं होते। मंटो एक ऐसी फ़िल्म है जिस के क़ाबिल आपको बनना पड़ेगा। अगर आप सआदत हसन मंटो को जानते है तो उनको महसूस करने के लिए यह एक बेहतरीन फ़िल्म है, और अगर जानना चाहते है तो उनके बारे में जिज्ञासा को बढ़ाने के लिए भी उपयुक्त फ़िल्म है।
नंदिता दास ने इस फ़िल्म में मंटो के जीवन के चार सालों को प्रदर्शित किया है जो 1946 के बॉम्बे से शुरू होते है। चालीस के दशक को कार्तिक विजय(सिनेमाटोग्राफर) और रीता घोष(प्रोडक्शन डिज़ाइनर) ने बहुत ही बख़ूबी और सभी बारीकियों के साथ पर्दे पर उतारा है। मंटो का बॉम्बे में फिल्मों से जुड़े होने और उनका उस समय के नामचीन लोगों (अशोक कुमार, जद्दनबाई, नौशाद अली, इस्मत चुगताई) से सम्बन्धों को भी खूबसूरती से पिरोया गया है। विभाजन के चलते जब मंटो को बॉम्बे छोड़ कर लाहौर आना पड़ता है तो अपने शहर को छोड़ने का गम और अपनें दोस्तों से बिछड़ने का दर्द भी बख़ूबी प्रदर्शित किया गया है। सआदत हसन मंटो के किरदार को नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने निभाया है और उन की इस किरदार के लिये की गई मेहनत उनके अभिनय में साफ झलकती है। इसी के साथ रसिका दुग्गल ने मंटो की पत्नी ‘रसिका का किरदार निभाया है। उनके अभिनय में आप किरदार की सादगी और संघर्ष दोनों को एक साथ महसूस कर सकते हैं। इन्हीं के साथ ताहिर राज भसीन, दिव्य दत्ता, रणवीर शोरी, शशांक अरोड़ा, विजय वर्ना, तिलोत्तमा शोम, परेश रावल, चंदन रॉय सान्याल, जावेद अख्तर, ऋषि कपूर, नीरज कानी, इला अरुण के किरदार भी कहानी की मांग के अनुसार जुड़ते गए व अलग आयाम देने में कामयाब भी रहे। नंदिता दास ने बड़ी ही चतुराई से मंटो की तीन बहुचर्चित कहानियां खोल दो, ठंडा गोश्त और टोबा टेक सिंहको फ़िल्म का हिस्सा बनाया है। फ़िल्म हर लिहाज से मंटो के जीवन को प्रस्तुत करने में कामयाब रही है। फ़िल्म का कमजोर पक्ष उस का एक वर्ग तक सीमित रहना है क्योंकि मंटो को जानने वालों, उन को समझने वालों और उनको पढ़ने वालों को ही यह फ़िल्म आकर्षित करती है। यह फ़िल्म इस तरह आप के जहन में उतरती है कि सआदत हसन मंटो को साथ लिए बिना आप सिनेमाघर से नहीं आ पाएंगे और फ़िल्म के अंत में फैज़ की गज़ल…
बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे
बोल ज़बाँ अब तक तेरी है
बोल ये थोड़ा वक़्त बहोत है
जिस्म-ओ-ज़बाँ की मौत से पहले…..
                      आप को सोचने पर मजबूर कर देती है।।।

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