पीहू फ़िल्म समीक्षा ( Pihu Movie Review)
3*/ 5*
निर्देशक विनोद कापड़ी की फ़िल्म पीहू एक 90 मिनट की थ्रिलर फ़िल्म है। जिसको अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोहों में काफी तारीफ मिल चुकी है।
पीहू एक 2 साल की बच्ची की कहाँनी है, जो एक सुबह उठती है तो पाती है कि उसकी माँ बग़ल में बेसुध पडी है। और वह एक बहुमंजिला इमारत केे एक फ्लैट में बिल्कुल अकेली है। पीहू का किरदार मायरा विश्वकर्मा ने निभाया है और ये ही एक किरदार 90 मिनट की इस फ़िल्म में है। कहाँनी शुुरू होती है, तो पिहू को नींद से जगते हुए दिखाया गया हैै और जैसे-जैसे कैमरा घुमता है आपको उसकी बेसुध पड़ी माँ दिखाई देती है और कमरे की सजावट से साफ पता चल जाता है कि बीती रात यहाँ कोई पार्टी हुुुई थी। फिल्म एक थ्रिलर है और जो चीजें हमारे घरों में आम होती है वो सब इस बच्ची के घर में अकेले होने की वजह से कितनी खतरनाक हो जाती है वो दिखाया गया है। कुछ दृश्यों को देख कर तो धड़कनें बढ़ने लगती है जैसे – प्रेस का खुला होना, पीहू का माइक्रोवेव में रोटी गरम करना और उसे बंद ना करना, इसी तरह गैस और गीजर को भी चालू कर देना, अपने दोस्तों को बुलाते हुए बालकनी में लटक जाना। कुछ दर्शय आप को भावुक भी करते है जिनमें पीहू का बार-बार अपनी माँ को बुलाना, बातें करना, रोते-रोते वहीं सो जाना शामिल है। फ़िल्म इस ओर भी इशारा करती है कि आजकल के एकल परिवार ( Nuclear Family) में ये सब होने की संभावना कितनी बढ़ गयी है। जहाँ आसपास के लोगों से हमारा कोई लेना-देना नहीं होता ना ही उनको हमारे बारे में कुछ पता होता है। यह जितना सही लगता है उतना ही भयभीत करने वाला भी है।
फ़िल्म की ख़ास बात इस 2 साल की बच्ची का अभिनय करना और निर्देशक का उस से अभिनय कराना है जो कि आपको अपने आपसे जोड़ कर रखती है। फ़िल्म का बैकग्राउंड स्कोर उतना अच्छा नहीं है जोकि एक थ्रिलर फ़िल्म की जान होता है। यहाँ फ़िल्म थोड़ी फीकी पड़ जाती है हालांकि फ़िल्म सिर्फ 90 मिनट की ही है, लेकिन इतनी देर तक एक ही किरदार को देखना आप को ऊबा भी सकता है। फ़िल्म सत्य घटना पर आधारित है तो आप पीहू के संघर्ष को देखने के लिये थियेटर का रूख कर सकते है। 😊😊
Thanks for your review…. Look forward for a genuine review from the day started following your page
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Thanx 😊😊
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