Ek Ladki Ko Dekha To Aisa Laga…… Thoughtful !!!


‘एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा’ फ़िल्म समीक्षा (Movie Review)
3*/5*
यह फ़िल्म एक महत्वपूर्ण विषय(subject) की तरफ हमारा ध्यान केंद्रित करती है ‘समलैंगिक रिशते’। ऐसा नहीं है की इस विषय पर इससे पहले फिल्में नहीं बनी है, ‘अनफ्रीडम’ ‘फ़ायर’ ‘आई एम’ आदि फिल्में इस विषय पर बन चुकी है किंतु सितम्बर 2018 में कानून द्वारा ‘समलैंगिकता’ को अपराध की श्रेणी से हटाने के बाद आयी यह प्रथम फ़िल्म है।
निर्देशक शैली चोपड़ा धर की यह प्रथम फ़िल्म है, अपनी पहली ही फ़िल्म में इतने संवेदनशील विषय को चुनना काबिले तारीफ़ है किन्तु सिर्फ विषय चुनने के अंक नहीं मिलते है, कहने का अर्थ यह है कि फ़िल्म जिस मुद्दे को दिखाना चाहती थी वो पुख़्ता तौर पर उस पर नहीं बोलती है। कानून द्वारा मान्यता मिलने के बाद यह फिल्म ‘LGBT’ समुदाय केे लिए एक अहम फ़िल्म साबित हो सकती है क्योंकि समाज द्वारा ‘समलैंगिकता’ को स्वीकारा जाना अभी भी एक मुद्दा है। फ़िल्म इसी तरफ इशारा भी करती है “प्यार,प्यार होता है और वह किसी को भी किसी से भी हो इस से प्यार का अस्तित्व नहीं बदलता वो तब भी प्यार ही रहता है।” अब यह बात समझने में समाज कितना समय लेगा वो तो एक प्रशन ही है।
कहानी की बात करें तो यह एक आम पंजाबी परिवार है। जिसमें एक दिलचस्प पिता बलबीर चोधरी(अनिल कपूर) उनकी एक डरी सहमी सी बेेटी स्वीटी(सोनम कपूर) और अपनी बहन पर जान देंनेे वाला बेटा (अभिषेक दुहान) है जिसे अपनी बहन का औरों से अलग होना एक बीमारी लगता है और वह उसे निरन्तर समझाता रहता है। फ़िल्म के सहायक किरदारों में जूही चावला, मधुमालती, सीमा पाहवा, बृजेंद्र कला और रेजिना कैसेंडरा बहुत सहज है। अब बात करते है साहिल मिर्जा(राजकुमार राव) की वह इस कहानी के धागों को फिल्म के विषय से बांधने का काम करते है और एक अनोखे रूप में फ़िल्म पर छाए रहते हैं। कहानी को गजल धलीवाल और शैली चोपड़ा धर ने मिल कर लिखा जिसमें थोड़े पैनेपन की और व्यंग्य की कमी दिखाई देेती है। रोचक कोहली का संगीत फ़िल्म के साथ-साथ सुचारु रूप से(smoothly) चलता है। फिल्म एक प्रयास है कि कुुुछ चीजें जैसी है उसे वैसा ही स्वीकार करना चाहिए। कुुुछ लोग हम से उतने ही अलग हैं जितने कि हम उनसे लेेकिन यहां विडंबना यह है कि अलग होने के पैमाने भी समाज ने पहले से ही निधार्रित किये हुए हैं। सोचिएगा जरूर ……🤔🤔

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