ख़्वाब …

ख़्वाबों का भी कोई ख़ुद का वजूद होता है,
उनका भी क्या कोई अपना रूप होता है।

तेरी आंखों में सजे तो तुझ से लगते हैं,
मेरी आंखों में आकर मेरी शख्सियत से मिलते हैं।

हर शख्स का ख़्वाब एक नहीं होता,
हर वक्त वो पाक और नेक नहीं होता।

तेरे दम से वह दम भरता है, तू जब इठला कर इतरा कर पूरा जोर लगाता है तब वह भी तेरे साथ ही बल खाता है।
जब हार कर तू उसे झटक देता है, तो वह भी छटपटा कर कोने में सिसकियां भरता है।

मुश्किल ख्वाबों को बुनना नहीं सही ख्वाब चुनना होता है।ख़्वाबों का चुनाव अनिवार्य है, उनको स्वयं का आकार देना अपरिहार्य है।

मेरे ख़्वाबों में मेरी ही झलक होनी चाहिए।
तभी तो वह मेरे वजूद से मेल खाएगें और भविष्य के दर्पण में हम दोनों एक ही रूप में झिलमिलाएगें ।

बस शर्त ये है कि .. मेरे ख्वाब मेरे द्वारा ही चुने जाएंगे …

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