अहसास….

कहने को तो जिंदगी बहुत छोटी सी है
लेकिन पीछे मुड़कर देखो तो लगता है जमाना गुजर गया है।कुछ रिश्ते मौसम की तरह बदल जाते हैं और कुछ पर कितने भी मौसम निकल जाए अहसास तक नहीं होता।
कभी-कभी अपने को अपने गांव के घर की मुंडेर पर पाती हूं…
आज भी मन में गुदगुदी सी हो जाती है, जब यह सोचती हूं कि मम्मी जब कुटी काटा करती थी तो मैं क्यों मना करती थी कि…“मेरी मम्मी कुटी नहीं काटेगी… “कुछ लगता होगा बाल मन को अलग सा ।
आज भी मुझे याद है कैसे हम सब गर्मी की छुट्टियों में जिया-दादी की चारपाई के नीचे घुसकर उसको अपने सर से उठा दिया करते थे और वह जोर जोर से चिल्लाने लगती थी
“मरे दूपहारी में हू, चैन नाहीं लेन देत हैं..”

उस समय हम सब बच्चों को वही खेल प्यारा था।

बाबा का वो हर बार नीम के पेड़ पर मेरे लिए झूला डालना और एक बार मेरे भाई ने इतनी तेज धक्का दिया था कि झूला काटें की झाड़ी के पास चला गया और मेरे पैर पर जरा सी खरोच आ गई और भाई हम तो हम है सबको दिखा दिखा कर पागल कर दिया, आखिर में बाबा ने बोला ही
” कितना खून निकल गया है उतना तो महीने भर में भी नहीं बना होगा …”
कहने को तो ये सब उस समय की छोटी-छोटी बातें हैं लेकिन है यादों में है और अब ये ही अनमोल लगती हैं।
जैसे जब कोई सभ्यता लुप्त हो जाती है तब उसके टूटे हुए बर्तन भी धरोहर कहलाते है। ये मेरी धरोहर है शायद…एक दादी हुए करती थी हमारे गाँव में, पापा मौसी बोला करते थे उनको, अभी जो लोग गाँव के होंगे उनको पता भी होगा कि वहां कितने ही अदभुत और निराकार रिश्ते होते है जिनको जो भी आकार आप अपने अनुसार दे सकते है..

“उनको बड़ा अरमान था मुझे मेरी शादी में देखने का, उनके अनुसार मैं बड़ी सुंदर थी और अपनी शादी में बड़ी ही सुंदर लगने वाली थी दुल्हन के रूप में..”

अभी भी ये किस्सा ज़हन में ताजा सा रहता है क्योंकि एक तो उनकी सोच के विपरीत मैं अपनी शादी में सुंदर नहीं लगी बल्कि बैंगनी रंग की लग रही थी (मेरे पति के अनुसार)। दूसरा मुझे अपनी तारीफ़ और बुराई याद रह ही जाती है…मुझे पता है काफी लोगों के साथ ऐसा होता है।
पता नहीं क्यों एक बात मेरे साथ बहुत अजीब सी है, मैं अपने विशेष अवसरों पर कभी अपेक्षित रूप में सुंदर नहीं लगी हूं ये विडंबना अभी तक है मेरे साथ… लोगों की अपेक्षाओं पर खरा ना उतार पाने का हुनर शायद शुरू से ही था मुझ में। हा हा…
एक बात तो है, आप अपने आपको जितनी अहमियत देते हो लोग भी उतनी ही देते है, चाहे देर से ही क्यों ना दे..उसके लिए ज़रूरी है तो की आप अपने आप को महत्वपूर्ण समझना बंद ना करे । हर स्तर पर आप अपने आपको आकार ही दे रहे होते हैं…. पूर्ण होने जैसा कुछ होता ही नहीं है मेरे हिसाब से तो…

हर पल हर लम्हा कोई ना कोई किस्सा बन ही रहा होता है।

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