The Last Color : रंग गुलाबी…

निर्देशक – विकास खन्ना
कलाकार- नीना गुप्ता, अक्सा सद्दीकी,
रूद्राणी छेत्री, असलम शेख
अवधि- 90 मिनट
प्रस्तुतकर्ता- Amazon prime video
⭐⭐⭐🌠 3.5/5
“चांद तो सबके पास होता है लेकिन जिनके दिल खुले होते हैं उनको चांद नजर आते हैं, हाथों के”

है ना कितनी खूबसूरत सी बात और समझने वाली भी

Michelin star Chef विकास खन्ना की फिल्म The Last Colour उसी खूबसूरती के एहसास को आपके अंदर से निकालकर आपके सम्मुख लेकर आती हैै। शर्त यह है कि आप उसे समझने की ओर अग्रसर हो। सरल शब्दों में कहा जाए तो यह फिल्म व्यक्ति के उन मनोभावों को प्रस्तुत करती है जो वास्तविकता में उसकेे अपने होते हैंं या परिस्थिति वश वह जैसा बन गया है यानी उसके चरित्र के भाव… यहां व्यक्ति से मेरा तात्पर्य फ़िल्म के किरदारों से है।
फिल्म वाराणसी की विधवाओं को केंद्र में रखकर बनाई गई है जिसके चलते नूर ( नीना गुप्ता) फिल्म का केंद्र बिंदु है। Chef विकास खन्ना की फिल्म विधवाओं की जिंदगी को रंंगहिन कर उनको सिर्फ और सिर्फ प्रभु भक्ति में अपना बचा हुआ जीवन बिताने की प्राचीन परंपरा को प्रस्तुत करती है, जहां पर उनको होली खेलने तक का अधिकार नहीं था क्योंकि वह भी रंगों का त्योहार है।
फिल्म विधवाओं के साथ-साथ छुआछूत और किन्नरों की व्यथा को भी कुछ हद तक प्रस्तुत करती है। यहां फिल्म के निर्देशक विकास खन्ना की तारीफ सही मायनों में बनती है उन्होंने यह साबित किया है कि जिस प्रकार अच्छे व्यंजन के लिए सभी मसालों का सही अनुपात आवश्यक है, तो उसी प्रकार एक बेहतर फिल्म बनाने के लिए भी सभी तरह के भावों का सही अनुपात अनिवार्य है और वह इस फिल्म में आपको बेहतरीन रूप से देखने को मिलेगा। इसी के साथ फिल्म का हर एक फ्रेम अपने आप में खूबसूरत है, सिनेमैटोग्राफी कमाल की है जिस के चलते बनारस के घाटों और गलियों की सजीवता देखते ही बनती है।
अदाकारी की बात करें तो नीना गुप्ता नूर के किरदार में बड़ी ही सहज और ईमानदार लगी है और उनके चेहरे का नूर सच में देखते ही बनता है इसी के साथ छोटी के किरदार में अक्सा सिद्दीकी ने कमाल कर दिया है। दोनों की केमस्ट्री पर्दे पर काबिले तारीफ है, जिसकी वजह से आपको उनका आत्मीय रिश्ता बहुत ही पाक नजर आएगा। फिल्म में रुद्राणी छेत्री और असलम शेख भी अपनी उपस्थिति दर्ज करानेे में कामयााब रहे हैं।
फिल्म पितृसत्ता के मुद्दे को भी उजागर करती है और इसी के साथ शक्ति का प्रयोग कर लोग किस तरह कमजोर लोगों को दबाने का प्रयास करते हैं, का भी छोंक लगाती है।
यहां यह कहना कदापि अनुचित नहीं होगा कि जिस दिन हम एक इंसान के रूप में अपने दर्द और बाकी सभी प्राणियों के दर्द को समान समझने लग जाएंगे उसी दिन से इस तरह की अमानवीय परंपराएं जो कभी उपजा करती थी वो ना तो कभी उपजती और जो अमानवीय कृत्य होते आ रहे है वह भी कभी जन्म ना लेते किंतु “मेरा है तो ही मुझे दर्द है” इस प्रवृत्ति ने इंसानियत को हर बार अलग-अलग रूप में शर्मसार ही किया है। यह पूर्णतया मेरा दृष्टिकोण है।
फिल्म की बात करें तो वह आपके संवेदना के तारों को अपने सरल और सहज अंदाज में छेड़ती है। जोकि देखे जाने और सराहे जाने के लिए पूर्ण रूप से उपयुक्त है। तो कृपया जरूर देखिए और मुझे अपना पक्ष भी बताइए …😊।

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