लेखक, निर्देशक – अबन भरुचा देवहंस
कलाकार- मनोज बाजपेयी, प्राची देसाई, अर्जुन माथुर
अवधि- 2 घंटा 16 मिनट
प्रस्तुतकर्ता- ZEE 5
⭐⭐⭐🌠 3.5/5
“बुलबुल को सैयाद का इंतजार है”
चलो केस सॉल्व करते हैं …
अबन भरुचा देवहंस जिनको हम एक अभिनेत्री के रूप में उनके अभिनय के लिए जानते हैं, वह निर्देशक केेे तौर पर अपनी दूसरी फिल्म
Silence… can you you hear it के साथ एक बार फिर हमारे दिमाग को काम पर लगाने के लिए तैयार है। यह एक मर्डर मिस्ट्री हैै, जिसको आप zee5 पर देख सकते हैं। फिल्म के मुख्य कलाकार, हम सबके चहेते मनोज वाजपेयी जी हैं और उन्हीं के कंधों पर है इस फिल्म की सारी जिम्मेदारी। जैसा कि हम जानते हैं कि एक खाकी वर्दी के अंदर उनका रुतबा देखते ही बनता है और एक पुलिस वाले के तौर पर उनके तेवर हमेशा काबिले तारीफ होते हैं। यहां भी उन्होंने अपने उसी उम्दा अभिनय का प्रदर्शन किया है और फिल्म के साथ पूर्ण न्याय भी किया है।
फिल्म की कहानी की बात करें तो वह काफी सरल सी है लेकिन उसको प्रस्तुत करने का ढंग उसको आकर्षक बनाता है और दर्शकों पर अपनी पकड़ बनाए रखता है कहने का तात्पर्य यह है कि फिल्म आपको बोर नहीं होने देगी और आप भी एसीपी अविनाश के साथ केस को सुलझाने में व्यस्त हो जाएंगे। आजकल जिस तरह से थ्रिलर फिल्मों की बाढ़ आई हुई है जिसके चलते हम सभी केस को सुलझाने में और कातिल तक पहुंचने में महारथ हासिल कर चुके हैं, तो वहां पर यह काफी हद तक महत्वपूर्ण हो जाता है कि आपको कोई ऐसी फिल्म ला कर दे जो निष्कर्ष तक आपको आसानी से ना पहुंचने दे और अपने में थोड़ा उलझा कर रखें। इस फिल्म में भी निर्देशन और अभिनय जिस प्रकार का है वह कहानी के सरल होने के बावजूद भी आपको कातिल तक इतनी आसानी से नहीं पहुंचने देता है।
फिल्म में एक चीज जो खटकती है वह है, पुलिस अपना कार्य पुलिसनुमा तरीके से नहीं करके केस को बातों के जरिए सुलझाती हुई नजर आती है जोकि अटपटा और थोड़ा अधकचरा लगता है। जहाँ ऐसी ऐसी फिल्में और सीरीज आपके सामने प्रस्तुत की जाती हैं जहां आपको पुलिस की कार्यप्रणाली का पूर्ण बारीकी से ज्ञान दिया जाता है, वहाँ पुलिस को बातों से केस को सुलझाने हुए देखना होमवर्क की कमी को उजागर करता है। फिल्म का सारा का सारा दारोमदार मनोज बाजपेयी पर है, जिसके चलते किसी भी और किरदार को उतनी अच्छी तरीके से उभरा नहीं गया दूसरी तरफ प्राची देसाई इस तरह के किरदार में उतनी प्रभावी नहीं लगती है कहने का तात्पर्य है कि पुलिस वालों की कठोरता उनके चेहरे पर नजर नहीं आती है जो थोड़ा अस्वभाविक सा लगता हैै।
एक और चीज जिसका OTT पर फिल्मों को प्रसारित करने वाले सभी निर्देशकों को ध्यान देना चाहिए वह है, फिल्म की अवधि। OTT के लिए फिल्मों की अवधि का कम होना देखने वालों के लिए फिल्म को दिलचस्प रखता है। Silence… can you hear it ? भी अगर थोड़ी और छोटी होती तो ज्यादा असरदार रहती। कुल मिलाकर फिल्म को देखा जा सकता है और देखना भी चाहिए उसकी मुख्य और अहम वजह हैं, मनोज बाजपेयी जी (जिया हो बिहार के लाला)…