कलाकार :- जोया हुसैन, अंशुमान पुष्कर, वामीका गब्बी, सहीदुर रहमान और पवन मल्होत्रा आदि ।
निर्देशक :- रंजन चंदेल
प्रस्तुतकर्ता :- Disney Plus Hotstar ⭐⭐⭐⭐
इस कदर मैंने सुलगते हुए घर देखे हैं । अब तो चुभने लगे आंखों में उजाले मुझको ।। “कामिल बहज़दी”
कुछ लोगों ने ऐसी जिंदगी जी और ऐसी दास्तानें देखी होती हैं जिनके सिर्फ कल्पना मात्र से हमारा शरीर नम हो जाता है। उसी तरह की एक भयानक दास्तान को डिज्नी प्लस हॉटस्टार की सीरीज अपने अंदर समेटे हुए आपके समक्ष प्रस्तुत करती है।
“ग्रहण”, सत्य व्यास जी के उपन्यास “चौरासी” पर आधारित है और 1984 में हुए सिख दंगों की कहानी को अपने तरीके से बयां करती है।
मनुष्य सबसे ज्यादा घातक और खतरनाक तब होता है जब वह किसी भी तरह की कुंठा से ग्रस्त होता है,चाहे वो उसका गरीब होना हो, किसी से ईर्ष्या या द्वेष की भावना हो या फिर अपने आप को किसी भी तरह से निम्न समझना हो। किसी भी कुंठा से ग्रस्त होने पर आप नकारात्मकता की तरफ आसानी से चले जाते हैं और किसी के भड़काने पर कुछ भी कर जाते हो, अपने आपको उस कुंठा से मुक्त करने के लिए। और यही इस तरह के सांप्रदायिक दंगों की मुख्य नींव होती है। 1984 में जो सिख दंगे हुए वह इसका मुख्य उदाहरण है।
निर्देशक रंजन चंदेल की ग्रहण की कहानी शुरू होती है एक जर्नलिस्ट की हत्या से, 2016 में किंतु उसके तार 1984 के सिख दंगों से जुड़े होते हैं। ग्रहण 2016 और 1984 को एक साथ लेकर चलती है और इन दोनों को एक साथ जोड़ने का सूत्र पिरोती हैं सीरीज की नायिका अमृता सिंह (जोया हुसैन) । अमृता सिंह रांची की एसपी हैं और दो राजनीतिक दलों के बीच में मुख्यमंत्री बनने और चुनाव जीतने की जंग के चलते बोकारो में हुए 1984 के सिख दंगों की जांच का कार्य शुरू होता है और उसकी बागडोर अमृता सिंह के हाथ में आती है। जब कहानी आगे की तरफ रुख करती है तो इन दंगों से अमृता सिंह के खुद के भी निजी तार जुड़े होते हैं, उन्हीं को सुलझाना और सच को सबके सामने लाना ही अमृता सिंह का उद्देश्य है।
अगर आपने पुराने जमाने वाला प्यार कभी भी जिया है या सच में देखना चाहते हैं तो आपको सीरीज के एक प्रेमी जोड़े से सच में प्यार हो जाएगा, वह है लेखक सत्य व्यास जी के बुने दो किरदार ऋषि (अंशुमन पुष्कर) और मनु(वामीका गब्बी)। आपको उनकी कहानी को सच में जीने का मन करेगा और वह आपको अपनी उस दुनिया का हिस्सा बना लेंगे। इन दोनों किरदारों को देखकर आपको सत्य व्यास जी की चौरासी पढ़ने की उत्सुकता और भी बलवती हो जाएगी क्योंकि मेरे साथ यही हुआ है।
ग्रहण की कहानी 2016 और 1984 को एक साथ लेकर चलती है और सही निर्देशन और कमलजीत सिंह के सधे हुए कैमरा वर्क के चलते दोनों वक्त बखूबी निखर कर पर्दे पर आए हैं और आपको वह अंतर साफ तौर पर नजर आएगा। इस दंगे भरे माहौल में जो एक ठंडी बयार का काम करता है, वह है अमित त्रिवेदी का संगीत जब ऋषि और मनु पर्दे पर होते हैं और पीछे का संगीत, मानो ऐसा लगता है वक्त कुछ समय के लिए वहीं थम सा गया है। बड़ा ही सुकून देता है।
ग्रहण में देखने योग्य बहुत कुछ है …
- एक अच्छा विषय जो ताजगी से भरा हुआ लगता है।
- एक मजबूत कहानी जो उस वक्त को जीवित करती है।
- अव्वल दर्जे का अभिनय जो सब कुछ सहज बना देता है।
- कलाकारों का चयन जो किरदारों के अनुरूप है।
- बेहतरीन निर्देशन और कैमरा वर्क।
ग्रहण के कमजोर पक्ष पर आए तो थोड़ा अवधि खटक जाती है। जिसकी वजह से कहानी थोड़ी खींची खींची और कमजोर लगने लगती है। यहां मेकर्स को यह ध्यान देना आवश्यक था की कहानी उतनी ही बढ़ाई जाए जितनी उसकी कसावट आपको इजाजत दे। बाकी एक अच्छा विषय है और यह सीरीज हिंदी लेखकों का OTT के मंच पर स्वागत करती है और यह दर्शाती है कि अच्छे विषय और अच्छा साहित्य आपके आसपास ही होता है और है भी, बस जरूरत है तो सही और पारखी नजरों की।
My Take
- सत्य व्यास जी के उपन्यास चौरासी को पढ़ना आवश्यक हो जाता है।
- जोया हुसैन, अंशुमन पुष्कर, और वामीका गब्बी अतिरिक्त प्रशंसा के हकदार हैं।