ANEK REVIEW!

निर्देशक :- अनुभव सिन्हा
कलाकार :- आयुष्मान खुराना, एंड्रिया केवेचुसा, मनोज पाहवा कुमुद मिश्रा आदि
⭐⭐⭐ 3 / 5



सरल शब्दों में अपनी बात को कह देना, किसी भी कला से कम नहीं है क्योंकि जो सरल है वह सुंदर है और यदि वह सरलता ही आपकी पहचान बन जाए तो हर बार कुछ सुंदर प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी आपके कंधों पर आज ही जाती है और हर बार अपनी दक्षता आपको प्रकट करनी भी पड़ती है।

निर्देशक अनुभव सिन्हा भी अपनी इसी प्रतिभा का रुक्का फिल्म जगत में मनवा चुके हैं। अभी तक उनकी जो भी फिल्में रही हैं वह एक ऐसे पहलू को उजागर करती रही हैं जिसके बारे में लोग जान कर भी कुछ भी सही तौर पर नहीं जानते थे। जिनमें से मुल्क, आर्टिकल 15 और थप्पड़ जैसी फिल्में प्रख्यात हैं।

आयुष्मान खुराना और अनुभव सिन्हा इससे पहले आर्टिकल 15 में कमाल का काम कर चुके हैं। कैसे और किस प्रकार सही जगह पर चोट करनी है उसका उदाहरण यह फिल्म बखूबी स्थापित कर पाई थी।
अब जब यही दोनों लोग, जिनको आप उनके द्वारा किए गए उम्दा कार्य के लिए सौ फ़ीसदी अंक दे चुके हैं, साथ आए तो आप फिर से अपने विचार में उनकी अंकतालिका पर सौ का आंकड़ा लगा कर बैठ जाते हैं और फिर आपको वह ना मिल पाए जिसके लिए आप सौ अंक देने आए हैं तो वहां से शुरू होता है अंकों का न्यून होना।

Anek को देखते समय आपको एक बार को संदेह होने लगता है कि आप सच में अनुभव सिन्हा की ही फिल्म देख रहे हैं या किसी और की, क्योंकि फिल्म अपनी बात को उतनी सरलता से नहीं कहती जिसके लिए निर्देशक मशहूर हैं। कहानी अपने आप को पुख्ता तौर पर स्थापित नहीं कर पाती हैं जिसकी वजह से नॉर्थ-ईस्ट के लोगों के लिए वो दर्द महसूस नहीं होता है। आपको उनके लिए बुरा लगता है किंतु उनके दर्द को महसूस करके आपकी आंखें नहीं झलकती जोकि अमूमन इस तरह की फिल्म को देखकर होता है। पर्दे पर इतना कुछ हो रहा होता है कि आपकी उत्सुकता तो बढ़ती है किंतु आप किसी भी दृश्य से पूर्ण रूप से जुड़ नहीं पाते हैं।
फिल्म आपको नॉर्थ ईस्ट का वह पक्ष दिखाती है जिससे कितने ही लोग अनभिज्ञ हैं या जान कर भी अनजान है या जानते हैं किंतु पूर्ण रूप से नहीं। कैसे हमारे द्वारा कहे गए मजाक के शब्द भी उन लोगों को नश्तर की तरह चुप सकते हैं क्योंकि उसके पीछे उनका ना जाने कब समाप्त होने वाला संघर्ष है। उन लोगों को वह हक चाहिए जो हमारे लिए सामान्य सी बात है क्योंकि हम नॉर्थ इससे नहीं है, और उनके लिए वही जंग का मुद्दा है। हर एक का अपना पक्ष होता है और सही नतीजे के लिए हर पक्ष पर बात होना और विचार होना अति आवश्यक है।

नार्थ ईस्ट की आवाज बनने के लिए अनुभव सिन्हा को पूरे अंक दिए जा सकते हैं किंतु हां यह आवाज और भी बेहतर और और भी पुख्ता हो सकती थी उनकी बाकी फिल्मों की तरह इस में भी मुझे कोई संशय नहीं है।
कुछ डायलॉग जरुर उल्लेखित करना चाहूंगी जो सच में नॉर्थ ईस्ट की एक तस्वीर प्रस्तुत करते हैं, जो सच में विचारणीय है।

North east मतलब West Bengal के पूर्वी side वाला इंडिया…
– Peace is a subjective hypothesis…
– Parlour वाली है या नेपालन है…
– Aido को team में ले लेते हैं तो ये team इंडियन बनेगी या Chinese…
– Pepole’s voice, 5 साल में एक बार सुनी जा सकती है रोज-रोज नहीं सुनी जाएगी…
– अगर इंडिया की मैप से state के नाम छुपा दो तो कितनी इंडियंस हर state के नाम पर उंगली रख सकते हैं…
– हिंदी डिसाइड करती है कि कौन नॉर्थ से है कौन साउथ से…
– सिर्फ इंडियन कैसे होता है आदमी…
– कहीं ऐसा तो नहीं है यह peace किसी को चाहिए ही नहीं वरना इतने सालों से छोटी सी problem solve नहीं हुई…

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