Pihu…I am all alone!!!

पीहू फ़िल्म समीक्षा ( Pihu Movie Review)

3*/ 5*
निर्देशक विनोद कापड़ी की फ़िल्म पीहू एक 90 मिनट की थ्रिलर फ़िल्म है। जिसको अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोहों में काफी तारीफ मिल चुकी है।
पीहू एक 2 साल की बच्ची की कहाँनी है, जो एक सुबह उठती है तो पाती है कि उसकी माँ बग़ल में बेसुध पडी है। और वह एक बहुमंजिला इमारत केे एक फ्लैट में बिल्कुल अकेली है। पीहू का किरदार मायरा विश्वकर्मा ने निभाया है और ये ही एक किरदार 90 मिनट की इस फ़िल्म में है। कहाँनी शुुरू होती है, तो पिहू को नींद से जगते हुए दिखाया गया हैै और जैसे-जैसे कैमरा घुमता है आपको उसकी बेसुध पड़ी माँ दिखाई देती है और कमरे की सजावट से साफ पता चल जाता है कि बीती रात यहाँ कोई पार्टी हुुुई थी। फिल्म एक थ्रिलर है और जो चीजें हमारे घरों में आम होती है वो सब इस बच्ची के घर में अकेले होने की वजह से कितनी खतरनाक हो जाती है वो दिखाया गया है। कुछ दृश्यों को देख कर तो धड़कनें बढ़ने लगती है जैसे – प्रेस का खुला होना, पीहू का माइक्रोवेव में रोटी गरम करना और उसे बंद ना करना, इसी तरह गैस और गीजर को भी चालू कर देना, अपने दोस्तों को बुलाते हुए बालकनी में लटक जाना। कुछ दर्शय आप को भावुक भी करते है जिनमें पीहू का बार-बार अपनी माँ को बुलाना, बातें करना, रोते-रोते वहीं सो जाना शामिल है। फ़िल्म इस ओर भी इशारा करती है कि आजकल के एकल परिवार ( Nuclear Family) में ये सब होने की संभावना कितनी बढ़ गयी है। जहाँ आसपास के लोगों से हमारा कोई लेना-देना नहीं होता ना ही उनको हमारे बारे में कुछ पता होता है। यह जितना सही लगता है उतना ही भयभीत करने वाला भी है।
फ़िल्म की ख़ास बात इस 2 साल की बच्ची का अभिनय करना और निर्देशक का उस से अभिनय कराना है जो कि आपको अपने आपसे जोड़ कर रखती है। फ़िल्म का बैकग्राउंड स्कोर उतना अच्छा नहीं है जोकि एक थ्रिलर फ़िल्म की जान होता है। यहाँ फ़िल्म थोड़ी फीकी पड़ जाती है हालांकि फ़िल्म सिर्फ 90 मिनट की ही है, लेकिन इतनी देर तक एक ही किरदार को देखना आप को ऊबा भी सकता है। फ़िल्म सत्य घटना पर आधारित है तो आप पीहू के संघर्ष को देखने के लिये थियेटर का रूख कर सकते है। 😊😊

Helicopter Eela…..To Mothers and their Dreams !!

हेलीकॉप्टर ईला फ़िल्म समीक्षा ( Helicopter Eela Movie review)

3*/5*

“चंदा है तू,मेरा सूरज है तू

ओ मेरी आँखों का तारा है तू
जीती हूँ मैं बस तुझे देख कर…

इस गाने को सुन कर जो बात दिमाग में आती है, वो है ‘माँ’ और उसकी पूरी दुनिया, उस का ‘बेटा’। प्रदीप सरकार की फ़िल्म हेलीकॉप्टर ईला भी माँ-बेटे के इसी रिश्ते की तर्ज पर बनी है। फ़िल्म की कहानी आंनद गांधी के गुजराती नाटक बेटा कगड़ो पर आधारित है। फ़िल्म की कहानी को आंनद गांधी ने मितेश शाह के साथ मिलकर लिखा है।

हेलीकॉप्टर ईला’ एक सिंगल माँ ईला रायतुरकर‘(काजोल)जो कि एक सिंंगर हैै, उसकी कहानी है। जो अपने सभी सपनों को अपने दिल की किसी अलमारी में बंद करके चाबी कहीं भूल जाती है। अब उसकी पूरी दुनियां, उसके बेेेटे विवान(ऋद्धि सेन) के आस-पास ही घूमती है। वो उसे ही जीवन का एकमात्र उद्देश्य बना लेती है। वह अपनी इस दुनियां में इतना खो जाती है कि उसको यह अहसास भी नहीं होता कि उसका भी कोई सपना था, उसेे भी अपनी जिंदगी में इन सब चीजों से ऊपर उठ कर कुछ करना था। जब विवान, जो कि अपनी माँ से बहुत प्यार करता है, को यह अहसास होता है तो वह ईला को भी यह अहसास कराता है। कभी-कभी माँँ-बाप अपने आप को खो कर अपने बच्चों को पाने में लग जाते है। यह किस हद तक सही है??, फ़िल्म उस ओर भी इशार करती है। कहीं तो रेखा खिंचनी होगी। कहने का मतलब है कि माँ होने की जिम्मेदारी के साथ -साथ आपकी खुद के लिये भी कोई जिम्मेदारी है। उन दोनों को साथ में लेकर चलना ही सफल तालमेल है
अभिनय की बात करे तो जहाँ काजोल होती है, वहाँ एक अलग तरह का चुलबुलापन होता हैै, जो यहाँ भी है। उनके बेटे के किरदार में ऋद्धि सेन ने यह बिल्कुल भी नहीं लगने दिया है कि यह उनकी पहली हिंदी फ़िल्म है। फ़िल्म में सबसे प्रभावशाली चीज़ है, काजोल की सास बनी किम्मी खन्ना, बहुत ही खरा अभिनय। इसी के साथ नेहा धूपिया, तोता रॉय चोधरी भी फ़िल्म का हिस्सा हैं।

फ़िल्म की कमजोर कड़ी, फ़िल्म की कहानी है, जोकि निःसंदेह अच्छी हो सकती थी। फ़िल्म का अंत जो थोड़ा और अलग दिखाया जा सकता था और इसी के साथ अगर फ़िल्म की लंबाई, जो थोड़ी और कम होती तो फ़िल्म और भी असरदार लगती। लेकिन अगर आप काजोल फैन है, तो फिर ये फ़िल्म देखना तो बनता है और वो आप को १०० फिसदी निराश नहीं करेगी 😊😊।।

Andhadhun…A Thrilling Tale !!!

अंधाधुन फ़िल्म समीक्षा (Andhadhun Movie Review)

3.5*/5*

हर फ़िल्म का एक दर्शक वर्ग होता है, कहने का तात्पर्य यह है कि कुछ कॉमेडी फिल्मों को पसंद करते हैंं, तो कुुुछ रोमांटिक, तो कुछ थ्रिलर और अगर आप थ्रिलर फिल्मों के शौकीन है तो अंधाधुन आप के लिये बना बनाया पैकेज है। जोकि आपको थ्रिलर और सस्पेंस दोनों का पूरा मसाला प्रदान करती है। फ़िल्म का निर्देशन श्री राम राघवन ने किया है जोकि इस तरह की फिल्में बनाने में ख्याति प्राप्त कर चुके हैं। इस से पेेहले उनकी फ़िल्म बदलापुर(2015) एक क्राइम थ्रिलर थी। जिसे भी काफी पसंद किया गया था।

अंधे होने के प्रॉब्लम तो सबको पता है, फायदे मैं बताता हूँ
फिल्म शुरू होती है एक नेेत्रहीन पियानिस्ट आकाश(आयुष्मान खुराना) के इस संवाद के साथ, जो कि एक कलाकार हैं और कलाकारों की अपनी एक दुनिया होती है,जोकि आकाश की भी है। लेकिन वो कब अपनी ही इस दुनियां में फंस जाता हैै,उसेे खुद भी पता नहीं चलता। कहानी में ट्विस्ट तब आता हैै जब आकाश की मुलाकात प्रमोद सिन्हा(अनिल धवन)से होती है। फ़िल्म का मूड 70 के दशक का है। बैकग्राउंड का संगीत फ़िल्म के सस्पेंस और दर्शकों की धड़कनों को बढ़ाने में पूरी तरह सेे सफल है। पूजा लाडा सुरती ने कहानी को बड़ी ही समझदारी से बुना है और जिसे श्री राम राघवन का निर्देशन मिला है जोकि इस तरह की फिल्मों के महारथी है। यहाँ मैं तारीफ करना चाहूँगी के यू मोहनन के कैमरे की उन्होंने बेहतरीन छायांकन(cinematography) का प्रदर्शन किया जिस ने फ़िल्म का मजा दुगना कर दिया। फ़िल्म के सभी गाने अमित त्रिवेदी द्वारा गाये गए है व संगीत भी उन्हींं का है, जो फ़िल्म की ताल के साथ उपयुक्त लगता है।
अभिनय की बात करें तो यह आयुष्मान खुराना का अब तक का सब से उम्दा अभिनय है पूरी तरह से परिपक्व। तब्बू अपने किरदार में काफी दमदार और सटीक है। उनका किरदार इस में बहुत अलग तरह का है। इसी के साथ राधिका आप्टे भी फ़िल्म में है जो रोमांस का तड़का लगाती हैं और छोटे किरदार में भी अपनी उपस्थिति बखूबी दर्ज कराती हैं। फ़िल्म ऑलिवर ट्रीनर की फ्रेंच शॉर्ट फिल्म लैकोकरों(2010) से प्रेरित है। फ़िल्म आपको शुरू से अंत तक अपनी सीट से बाधें रखेगीं और उसके ट्विस्ट आप के रोमांच को कम नहीं होने देेंगे। अगर आप फ़िल्म देखनेे जाते है, तो पूरी तरह से वही रहे, कुछ भी छूटने ना दें क्योंकि हर चीज़ का कुछ ना कुछ मतलब है। जो एकदूसरे से जुुुडा हुआ हैै। तो फिर अगर थोड़ा दिमागी कसरत का मूूड है तो अंधाधुन सिनेमाघरों में आ चुुकी है 😉😊।

Sui Dhaaga… sapno ka bojh bhari raha,per dekhna to jari raha !!!

सुई धागा समीक्षा (Sui dhaaga Review)
3.5*/5*
‘सब बढ़िया है’ कि तर्ज पर बनी निर्देशक शरत कटारिया की यह फ़िल्म एक आम आदमी की कहानी है। जिसके कुछ सपने तो होते है, पर पारिवारिक जिम्मेदारियों के बोझ से कहीं दब से जाते है और ऐसे दबते है कि उस को खुद ही उन सपनों का अहसास होना समाप्त हो जाता है। शरत कटारिया की इस से पहले आयी फ़िल्म दम लगा के हईशा की तरह ही यह भी एक हल्की-फुल्की पारिवारिक फ़िल्म है। निर्देशक ने तान तो सही छेड़ी है लेकिन जरूरी नहीं है कि गाना हर बार सुपरहिट ही हो कहने का तात्पर्य है कि इस फ़िल्म में सब बढ़िया है होने के बावजूद भी एक पैनेपन की कमी लगती है।

फ़िल्म की कहानी एक मध्यम वर्गीय अभावग्रस्त परिवार की कहानी है। जैसा किसी भी आम आदमी का होता है। वरुण धवन ‘मौजीके अहम किरदार में है जो कि अपनी जीविका और पारिवारिक जिम्मेदारीयों के वहन के लिए एक दुकान पर नौकरी करते है लेकिन दुकान के मालिकों का व्यहवार उनके प्रति उपयुक्त नहीं होता है। जो कि मौजी की पत्नी ममता(अनुष्का शर्मा)

को हरगिज बर्दाश्त नहीं होता और वह मौजी को अपना हुनर इस्तेमाल करने के लिये प्रेरित करती है। जिस तरह रामायण में हनुमान जी को अपनी शक्तियों का अहसास जामवंत के याद दिलाने पर होता है, उसी तरह मौजी को भी ममता के प्रेरित करने पर अपने हुनर का अहसास होता है। रघुवीर यादव मौजी के पिता के किरदार में प्रशंसनीय है उसी के साथ यामिनी दास को माँ के किरदार में देखना सुखद लगता है, और दोनों किरदार आप का मन जीत लेेते है। फ़िल्म के सभी सहायक किरदार बहुत ही जबरदस्त है और फ़िल्म को मजबूत आधार प्रदान करते है। वरूण और अनुष्का ने भी अपने तड़क-भड़क और आकर्षित करने वाले किरदारों से अलग, आम आदमी की तरह अपने आप को प्रदर्शित किया है, और कामयाब भी रहे हैं। अभिनय की बात करें तो सब ने अच्छा अभिनय किया हैै। फ़िल्म की कहानी बहुत ही सरल है जो कि उस का मजबूत और कामजोर पक्ष दोनों ही हैै। फिल्म के संवाद अच्छे हैं लेेेकिन करारेेेपन का अभाव लगता है। एक सीधी- सादी पारिवारिक फ़िल्म है, अच्छे अभिनय के साथ जिसे बहुत सादगी से प्रस्तुत किया गया है। बहुत ही साफ़ तौर पर कोई संदेश तो यह फ़िल्म नहीं देती है लेकिन हाँ यह जरूर कहती है…सपनें पूरे करने का अगर एक मौका मिले तो उस बारिश में छाता लेकर जाने की जरूरत नहीं है थोड़ा सा तो भीगना बनता है 😊 ‘बाकी सब बढ़िया है’ ।।।

Manto… Bol ke lab azaad hai tere !!!

मंटो समीक्षा (Manto Review)

4*/5*
“नीम के पत्ते कड़वे सही पर खून तो साफ करते है।”
“अगर आप मेरे अफसानों को बर्दाश्त नहीं कर सकते तो जमाना ही नाक़ाबिले बर्दाश्त है।”
इन जुमलों से आप इन को कहने वाले कि बेबाक़ी का अंदाजा तो साफ तौर पर लगा सकते है। बेबाक़ी एक हुनर है जो सब में नहीं होता और जिसमें होता है वो नाक़ाबिले बर्दाश्त होता है। नंदिता दास के निर्देशन में बनी फ़िल्म मंटो, पाकिस्तान के मशहूर अफ़साना निगार सआदत हसन मंटो की बायोपिक है। जिन के अफसानों पर ताउम्र अश्लीलता का इल्जाम लगता रहा। कुछ शख्सियतें ऐसी होती है, जिन को अपने होने का सही कारण पता होता है। ऐसी ही शख्सियत के धनी थे मंटो। उन की कहानियां हकीकत के क़रीब और समाज का स्पष्ट दर्पण हुआ करती थी।
कुछ फिल्में ऐसी होती है जो हमारें क़ाबिल नहीं होती और कुछ फिल्मों के क़ाबिल हम नहीं होते। मंटो एक ऐसी फ़िल्म है जिस के क़ाबिल आपको बनना पड़ेगा। अगर आप सआदत हसन मंटो को जानते है तो उनको महसूस करने के लिए यह एक बेहतरीन फ़िल्म है, और अगर जानना चाहते है तो उनके बारे में जिज्ञासा को बढ़ाने के लिए भी उपयुक्त फ़िल्म है।
नंदिता दास ने इस फ़िल्म में मंटो के जीवन के चार सालों को प्रदर्शित किया है जो 1946 के बॉम्बे से शुरू होते है। चालीस के दशक को कार्तिक विजय(सिनेमाटोग्राफर) और रीता घोष(प्रोडक्शन डिज़ाइनर) ने बहुत ही बख़ूबी और सभी बारीकियों के साथ पर्दे पर उतारा है। मंटो का बॉम्बे में फिल्मों से जुड़े होने और उनका उस समय के नामचीन लोगों (अशोक कुमार, जद्दनबाई, नौशाद अली, इस्मत चुगताई) से सम्बन्धों को भी खूबसूरती से पिरोया गया है। विभाजन के चलते जब मंटो को बॉम्बे छोड़ कर लाहौर आना पड़ता है तो अपने शहर को छोड़ने का गम और अपनें दोस्तों से बिछड़ने का दर्द भी बख़ूबी प्रदर्शित किया गया है। सआदत हसन मंटो के किरदार को नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने निभाया है और उन की इस किरदार के लिये की गई मेहनत उनके अभिनय में साफ झलकती है। इसी के साथ रसिका दुग्गल ने मंटो की पत्नी ‘रसिका का किरदार निभाया है। उनके अभिनय में आप किरदार की सादगी और संघर्ष दोनों को एक साथ महसूस कर सकते हैं। इन्हीं के साथ ताहिर राज भसीन, दिव्य दत्ता, रणवीर शोरी, शशांक अरोड़ा, विजय वर्ना, तिलोत्तमा शोम, परेश रावल, चंदन रॉय सान्याल, जावेद अख्तर, ऋषि कपूर, नीरज कानी, इला अरुण के किरदार भी कहानी की मांग के अनुसार जुड़ते गए व अलग आयाम देने में कामयाब भी रहे। नंदिता दास ने बड़ी ही चतुराई से मंटो की तीन बहुचर्चित कहानियां खोल दो, ठंडा गोश्त और टोबा टेक सिंहको फ़िल्म का हिस्सा बनाया है। फ़िल्म हर लिहाज से मंटो के जीवन को प्रस्तुत करने में कामयाब रही है। फ़िल्म का कमजोर पक्ष उस का एक वर्ग तक सीमित रहना है क्योंकि मंटो को जानने वालों, उन को समझने वालों और उनको पढ़ने वालों को ही यह फ़िल्म आकर्षित करती है। यह फ़िल्म इस तरह आप के जहन में उतरती है कि सआदत हसन मंटो को साथ लिए बिना आप सिनेमाघर से नहीं आ पाएंगे और फ़िल्म के अंत में फैज़ की गज़ल…
बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे
बोल ज़बाँ अब तक तेरी है
बोल ये थोड़ा वक़्त बहोत है
जिस्म-ओ-ज़बाँ की मौत से पहले…..
                      आप को सोचने पर मजबूर कर देती है।।।

Manmarziyan:- Pyar ya Fyar…

मनमर्ज़ीयाँ समीक्षा (Manmarziyan Review)

*4/*5
मनमर्ज़ीयाँजैसा कि फ़िल्म के नाम से ही जाहिर है ‘मन की मर्ज़ीयाँ’ और मन की मर्जी गलत या सही नहीं होती, कहते हैं ना ‘दिल के पास दिमाग नहीं होता’। वो जो करता है उसे वो ही सही लगता है।निर्देशक अनुराग कश्यप की यह फ़िल्म इसी बात को अपने ढंग से प्रस्तुत करती हैं। अनुराग कश्यप की यह फ़िल्म उनकी पुरानी फिल्मों से काफी अलग है और निर्देशन क़ाबिले तारीफ़ है। वह अपने तरीक़े के निर्देशन के लिए ही जाने जाते है। जब दो अलग ढंग से काम करने वाले लोगों को एकसाथ मिलाया जाता है तो मनमर्ज़ीयाँजैसी फ़िल्म निकाल कर सामने आती है। यहाँ पर यह वाक्य मैं अनुराग कश्यप और अमित त्रिवेदी के लिए प्रयोग कर रही हूँ। उम्दा निर्देशन और बेहतरीन संगीत जो कि फ़िल्म के साथ इस कदर मिल जाता है कि उस के बिना आप कहानी की आत्मा को महसूस ही नहीं कर पायेंगे। इसी के साथ फ़िल्म की पटकथा और संवाद भी प्रशंसा योग्य हैं।

कहानी की बात करें तो यह एक प्रेम त्रिकोण (Love triangle) है। जो विकी(विकी कौशल),रुमी(तापसी पन्नू) और रॉबी(अभिषेक बच्चन)के मध्य दिखाया गया है। कहानी वैसी ही है जैसी की हम लोग प्रेम त्रिकोण(Love triangle)के बारे में सोचते हैं। अलग है तो कहानी कहने का तरीका, उस को प्रस्तुत करने का अनुठा ढंग। रूमी और विकी एकदूसरे के लिये पागल हैं वो एकदूसरे को पागलों की तरह फ्यार’ करते हैं, जो कि इस पीढ़ी का प्यार है। जिनके लिए प्यार और फ्यार का अंतर खत्म हो चुका है। जब इनके इस फ्यार की खबर रुमी के घरवालों को लगती है तो फ़िल्म में किरदार जुडता है रॉबी का जो करता है, रुमी से प्यार। यह फ़िल्म प्यार और फ्यार का सफ़र है और अंतरात्मा की जंग।

फ़िल्म में अभिषेक बच्चन 2 साल बाद नज़र आए है और क्या नज़र आये है। अपने किरदार को सहजता के साथ बड़ी आसानी से जीया है उन्होंने। उनकी अभिनय की परिपक्वता साफ दिखाई देती है। इसी के साथ विकी कौशल अपने पिछले सभी किरदारों से अलग लगते हुए एक अलग तरह की जीवनशैली को प्रस्तुत करते हुए अनूठी छाप छोड़ते हैं। वह फ़िल्म में सटीक लगते है, कुछ किरदार ऐसे होते है जिस में आपको अपने अभिनय का सामंजस्य दिखाना पड़ता है। उसमें आप कुछ ऊपर-निचे, ज्यादा-कम नहीं कर सकते। इसी तरह का किरदार विकी का इस फ़िल्म में है।अब मैं बात करुँगी तापसी पन्नू की, उत्कृष्ट अभिनय जो कि पूरी परिपक्वता के साथ किया गया है। एक अभिनेता के तौर पर वो कितना निखरती जा रही है उस का अंदाजा आप इस फ़िल्म में उन का अभिनय देख कर बखूबी लगा सकते हैं। अनुराग कश्यप तीनों कलाकारों का उत्तम अभिनय दर्शाने में कामयाब रहे हैं। फ़िल्म की सहायक कास्ट भी उपयुक्त है। अमृतसर की खूबसूरती को बरकरार रखा गया है, जिस से कहानी को उचित आधार मिलता है।
फ़िल्म का पूर्वार्ध(first half) काफी तीव्र है जिसके चलते मध्यांतर(interval) के बाद फ़िल्म खिंची हुई लगती है। परंपरागत सोच वाले दर्शक वर्ग को एक झटका देने का दम ये फ़िल्म रखती है। पंजाबियों के wakhre swag को भी बरकरार रखा गया है।

अनुराग कश्यप के इस प्यार और फ्यार की रोलर कोस्टर यात्रा का मजा लेने के लिए थियेटर का रुख पूरी तरह से किया जा सकता है और इस ग्रे वाले शेड को अपनी जिंदगी में भी थोड़ा सा तो भरा ही जा सकता है। 😊😊

Stree….O stree kal aana !

स्त्री समीक्षा (Stree Review)

3.5*/5*

निर्देशक ‘अमर कौशिक’ ने इस फ़िल्म के साथ निर्देशन में अपना प्रथम क़दम रख दिया हैं। इस से पहले वह सहायक निर्देशक के तौर पर काफी फिल्मों में काम कर चुके हैं। इस फ़िल्म से पहले फ़िल्म अब्बा(2017) प्रमुख निर्देशक के तौर पर उनकी प्रथम फ़िल्म थी लेकिन वह एक शॉर्ट फ़िल्म थी जिसे टोरंटो इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टिवल में काफी सराहना मिली थी।

‘स्त्री’ एक हॉरर कॉमेडी हैं। जो सच में हॉरर और कॉमेडी दोनों का अहसास साथ में देती हैं। यही फ़िल्म का मजबूत पक्ष भी है। इसी वजह से यह दोनों वर्गों के दर्शकों को अपनी तरफ आकर्षित करती है। जिस तरह इस फ़िल्म का नाम ‘स्त्री’ थोड़ा अलग लगता है उसी प्रकार कहानी भी थोड़ा हट कर हैं। फिल्म शुरू होती है, ओ स्त्री कल आनाइस लाइन से जो कि मध्यप्रदेश के एक छोटे से कस्बे चंदेरी के सभी घरों की दीवारों पर लिखा जा रहा होता हैं। इस कस्बे में साल में चार दिन कोई पूजा होती है और इसी बीच एक स्त्री की रूह पुरुषों को अपना शिकार बनाती है। वह पुरुषों को अपने साथ ले जाती हैं और उनके वस्त्र छोड़ जाती हैं। इसी डर से उस कस्बे का हर मर्द सहमा हुआ है। फ़िल्म में ‘राजकुमार राव’ की अहम भूमिका है और वह एक सटीक चयन भी है, उन्होंने एक आम आदमी के किरदार को जिस सहजता के साथ पकड़ा है कि वह कही भी अभिनय करते हुए प्रतित नहीं होते। इसी के साथ उनके दोस्तों की भूमिका में ‘अपारशक्ति खुराना’ और ‘अभिषेक बेनर्जी’ आप को हँसने का एक भी मौका नहीं छोड़ते है। फ़िल्म में ‘पंकज त्रिपाठी’ भी छोटी सी भूमिका में हैं लेकिन इस थोड़े से समय में वो जिस तरह का अभिनय कर जाते है, वह आप के दिमाग में रह जाता है और देशी किरदारों में कोई उनका हाथ नहीं पकड़ सकता हैं यह बात उनका अभिनय देख कर साफ दिखाई पड़ती है। ‘श्रद्धा कपूर’ ने भी फ़िल्म की मांग के अनुसार अनुरूप अभिनय का प्रदर्शन किया हैं।
फ़िल्म की जान ‘सुमित अरोरा’ के लिखें हुए डायलॉग हैं जो कॉमेडी की पकड़ को कमजोर नहीं होने देते। फ़िल्म आप को डराती है, और अगले ही पल हँसा कर माहौल को हल्का कर देती है। ‘स्त्री’ को बेहतर अभिनय, अच्छे निर्देशन और एक अलग तरह की कहानी जो कि ताजगी का अहसास कराती है, देखा जा सकता है। फ़िल्म के क्लाइमेक्स पर और काम किया जा सकता था। संगीत में कोई ख़ास बात नहीं है। फ़िल्म जिस मोड़ पर खत्म होती है, वहाँ से उसका सीक्वल आसानी से बनाया जा सकता हैं। इसी के साथ फ़िल्म आप को स्त्री का आदर करने का संकेत भी देती है। मेरी तरफ से यह ‘स्त्री’ 3.5* की हकदार हैं और आप को हँसने और डराने दोनों का दम एकसाथ रखती है। 😊😊

Toba Tek Singh…..By Manto’s Pen

टोबा टेक सिंह समीक्षा (Toba Tek Singh Review)
प्रसारण मंच – ZEE5 (streaming platform -ZEE5)
3.5*/5*

टोबा टेक सिंहफ़िल्म ‘मंटो’ की लघु कथाओं(short stories) में से एक कथा टोबा टेक सिंह पर आधारित हैं। यहाँ मैं एक बात और जोड़ना चाहूँगी अगर आप भारत या फिर पाकिस्तान से हैं और आप ‘सआदत हसन मंटो’ को नहीं जानते तो आप एक बहुत ही निर्भीक और बेबाक़ शख्सियत को नहीं जानते जो कि अपने बेबाक़ और स्पष्ट लेखन के लिए दोनो देशों में जानी जाती है। ‘मंटो’ का जन्म ब्रिटिश इंडिया में हुआ था और विभाजन के बाद वो पाकिस्तान का हिस्सा थे।

टोबा टेक सिंह, केतन मेहता द्वारा बनाई गई एक 75 मिनट की शॉर्ट फ़िल्म है। जो अपने अंदर एक गंभीर तथ्य को छुपाये हुए है। यह फिल्म विभाजन के समय की लोगों की मानसिक स्थिति को अपने अंदाज में प्रदर्शित करती है। फ़िल्म की मूल कथावस्तु मंटो की कहानी ही है। यह फ़िल्म शुरू होती है विभाजन से पूर्व लाहौर में स्थित एक पागलखाने से और इसकी कहानी घूमती है वहाँ के एक कैदी बिशेन सिंह(पंकज कपूर) के आस- पास जिसे वहाँ सब टोबा टेक सिंह के नाम से जानते हैं, जो कि उसके गाँव का नाम हैं। बिशेन सिंह के बारे में कहा जाता है कि वह पिछले 10 सालों से सोया नहीं हैं और लगातार चलता रहता है, अगर थक जाता हैं तो दीवार का सहारा ले लेता है लेकिन बैठता नहीं हैं। उसी पागलखाने में वार्डर के तौर पर और कहानी की खोज में सआदत हसन मंटो‘(विनय पाठक) आते है।
इस फ़िल्म में विभाजन के उस दर्द को दिखाया गया है जो कि उस समय लोगों के दिलोदिमाग में था, कि हम अपनी जगह से हिले भी नहीं तो हम भारत या पाकिस्तान में कैसे पहुंच गए। विभाजन के समय औरतों की दशा का अंदाज़ा देने के लिए ‘मंटो’ की एक और लघु कथा ‘खोल दो’ के कुछ अंशों को शामिल किया गया हैं। यह फ़िल्म पूरी तरह से विभाजन के दर्द को अपने अंदर समेटने की कोशिश करती है, जिसके चलते बिशेन सिंहको विभाजन के बाद एक ही प्रशन करते दिखाया गया हैं,टोबा टेक सिंह किथे हैं???वो जानना चाहता है कि अब उसका गाँव कहाँ है,भारत में या पाकिस्तान में।
केतन मेहता को यह फ़िल्म बनाने के बारे में सोचने के लिए पूरे 5 स्टार मिलने चाहिए लेकिन अगर फिल्म को ‘मंटो’ की कहानी के साथ रखा जाए तो फ़िल्म ख़री नहीं उतर पाती। पंकज कपूर और विनय पाठक दोनों ही बेहतरीन कलाकार है और किसी की भी तारीफ के मोहताज़ नहीं है। दोनों ही अपने-अपने किरदार में बख़ूबी अच्छे हैं। यह फ़िल्म ZEE5 पर उपलब्ध है और अगर आप ऑर्ट सिनेमा के कद्रदान हैं तो आप इस फ़िल्म को जरूर पसंद करेंगे और आप को एक बार देखनी भी चाहिए । 😊

Happy phirr bhag jayegi…A laughter dose

हैप्पी फिर भाग जाएगी समीक्षा ( Review )

3*/5*
निर्देशक मुदस्सर अजीज इस बार अपनी हिट फिल्म ‘हैप्पी भाग जाएगी'(2016) के सीक्वल के साथ बॉक्स ऑफिस पर हैं। उनकी पहली ‘हैप्पी’ को दर्शकोंं और आलोचकों (critics) दोनों सेे काफी प्रशंसा मिली थी। इस बार फ़िल्म में सोनाक्षी सिन्हा, जस्सी गिल और अपारशक्ति खुराना को शामिल किया गया हैं और डायना पेंटी, अली फजल, जिम्मी शेरगिल और पीयूष मिश्रा पहले की तरह ही फ़िल्म मेंं मौजूद है।
जैसे कि यह फ़िल्म एक सीक्वल है तो यहां ‘हैप्पी’ भी दो-दो हैं। यह फ़िल्म दूसरी हैप्पी (सोनाक्षी सिन्हा) के आस-पास घूमती है।सोनाक्षी सिन्हा इस फिल्म का अहम किरदार हैंं। फ़िल्म की कहानी एक गलतफहमी से शुरू होती है और इस बार ‘हैप्पी’ पाकिस्तान में नहीं चीन में भाग रही होती है। गलतफहमी यह है कि चीन में ‘पुरानी हैप्पी’ (डायना पेंटी) की जगह ‘नई हैप्पी’ (सोनाक्षी सिन्हा) को अगवा कर लिया जाता है। इसी के चलते इंडिया से दमन सिंह बग्गा(जिम्मी शेरगिल) और पाकिस्तान से पुलिस अफसर उस्मान अफरीदी(पीयूष मिश्रा) को भी अगवा कर लिया जाता है। फ़िल्म में पंजाबी अभिनेता और गायक जस्सी गिल को भी शामिल किया है। यह उनकी पहली हिंदी फ़िल्म है। उन का किरदार ‘खुुुशवंत गिल’ और अपारशक्ति खुराना का किरदार ‘अमन’ भी फ़िल्म को रोचक बनाये रखते हैं। कहानी में कहानी जैसा कहने के लिए कुछ ख़ास नहीं है। फ़िल्म का मजबूत पक्ष उसके डायलॉग है। जो कही-कही पर इंडिया, पाकिस्तान और चीन की तनातनी पर व्यंग्य करते रहते है। जिम्मी शेरगिल और पीयूष मिश्रा की जुगलबंदी फिल्म की जान है और उसको देखने योग्य बनाती है।
अगर आपने ‘हैप्पी भाग जाएगी’ नहीं भी देखी है तो भी आप को इस फ़िल्म को समझने में कोई परेशानी नहीं होगी। फ़िल्म का संगीत बिलकुल भी दिलचस्प नहीं है, हां फ़िल्म के साथ-साथ ठीक ही लगता है। यह एक सिचुएशनल कॉमेडी है जो कि कही-कही पर काफी हँसाती है। लेकिन अगर आप कॉमेडी को पसंद नहीं करते है और आपके पास एक ऐसा दिमाग हैं जो कभी चलना बंद नहीं होता हैं तो फिर ये फ़िल्म आप के लिये बिल्कुल भी नहीं हैं। इसके बाद भी अगर आप को अपनेआप को गुदगुदाने और ‘हैप्पी’ के साथ चीन सफ़र पे जाने का मन है तो आप सिनेमाघर का रुख जरूर कर सकते है।😊

Gold… Ghar layege gold gold !!!

गोल्ड समीक्षा (Gold Review)

4*/5*
निर्देशकरीमा कागती कुुुछ अलग तरह के सिनेमा के लिए जानी जाती है। इस बार उन्होंने स्वतंत्र भारत के पहले हॉकी गोल्ड पर आधारित फ़िल्म बनाई है। इस से पेेहले उन्होंने “तलाश” फ़िल्म बनाई थी। इस फ़िल्म के कलाकारों का चुनाव बहुत अच्छी तरह से किया गया है। अक्षय कुमार और मौनी रॉय अहम भूमिका में हैं। साथ मेंं कुणाल कपूर, विनीत कुमार सिंह, अमित शाद और सनी कौशल का शानदार अभिनय है।
फ़िल्म की कहानी शुरू होती है 1936 के बर्लिन ओलंपिक से जब इंडिया, इंडिया नहीं ब्रिटिश इंडिया हुआ करता था और उसी के नाम से हमारी हॉकी टीम हॉकी खेलती थी। ये फ़िल्म है उस सपनें की जो स्वतंत्र भारत के लिए गोल्ड लाने के लिए देखा गया था। ये सपना था टीम के जूनियर मैनेजर तपन दास (अक्षय कुमार) और उस समय टीम का नेतृत्व कर रहे टीम के कप्तान सम्राट (कुणाल कपूर) का। तपन दास ठान लेेता है कि हम हॉकी स्वतंत्र भारत के लिए खेलेेंगें और गोल्ड भी जीतेगें। कहानी के आगें बढ़ने पर राजकुुुमार रघुवेेेन्द्र प्रताप सिंह (अमित शाद) और पंजाब के हिम्मत सिंह (सनी कौशल) की एंट्री होती हैै। इन को साथ में लेकर एक नई टीम का गठन होता हैं लेकिन देेेश के विभाजान की वजह से टीम का बिखरना और तपन दास का दुबारा टीम बनाना काफी दिलचस्प है। ये टीम 1948 में स्वतंत्र भारत के लिए गोल्ड लाती है और ब्रिटिश टीम को हरा कर 200 साल की गुुलामी का बदला लेेती है।
फ़िल्म में हर किरदार ने बहुत अच्छा अभिनय किया है। सभी का रोल बहुत अच्छे से लिखा गया है। किसी एक किरदार को ही फ़ोकस कर के फ़िल्म नहीं बनाई गई है। कुणाल कपूर का किरदार “सम्राट” मेजर ध्यानचंद से प्रेरित लगता है। सनी कौशल भी अपने भाई विक्की कौशल की तरह ही अभिनय में माहिर दिखाई देते है। अमित शाद का किरदार “कुवंर रघुवेन्द्र प्रताप” पूरी तरह रॉयल दिखाई देता है। विनीत कुमार सिंह ने “मुकेबाज” के बाद इस फ़िल्म में भी अच्छे अभिनय का प्रदर्शन किया है। फ़िल्म देेेशभक्ति, जुनून और इमोशन से भरपूर है। देश के विभाजन केे दृश्य दिल को छूने वाले है। फ़िल्म मेंं कोई कमी सीधे तौर पर नहीं दिखाई देती है पर हां फ़िल्म की लंबाई थोड़ी कम की जा सकती थी और संगीत और अच्छा हो सकता था, इस के बावजूद फ़िल्म आप को बांधे रखती है।
फ़िल्म एक उपयुक्त समय पर आई है, जब देशभक्ति का जज्बा अपने चरम पर होता है । तो अपनी देशभक्ति पर थोड़ी मोहर इस फिल्म के साथ लगाइये और उस अवधि का रोमांच ‘गोल्ड’ के साथ महसूस कीजिए ।। 😊😊

Dhadak … Feeling of Love!

3* / 5*

धड़क समीक्षा ( Dhadak Review )
शशांक खेतान एक बार फिर अपनी बहु चर्चित फ़िल्म ‘धड़क’ के साथ बॉक्स ऑफिस पर है। इससे पहले वो अपनी दो फिल्मों ‘हम्प्टी शर्मा की दुल्हनियां’ और ‘बद्रीनाथ की दुल्हनियां’ के लिए तारीफ पा चुके हैं। इस फ़िल्म का इंतजार दर्शकों को बड़ी ही बेताबी से था। हो भी क्यों ना, इस फ़िल्म से दो बड़े नाम जो जुड़े हैं। जाह्नवी कपूर और ईशान खट्टर। ईशान अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन इससे पहले इंटरनेशनल फेम डायरेक्टर माजिद की फ़िल्म ‘बियॉन्ड द क्लाउड’ में कर चुके हैं। जिसके लिए क्रिटिक्स ने उनकी बहुत सरहाना की थी। इस फ़िल्म में भी उन्होंने सरहानीय प्रदर्शन ही किया हैं। दूसरी तरफ जाह्नवी भी अपने रोल में दमदार लगी है और साथ ही बहुत खूबसूरत भी दिख रही है।
अब हम आते है फ़िल्म की कहानी पर क्योंकि ये फ़िल्म मराठी फ़िल्म ‘सैराट’ का हिंदी रिमेक है तो कहानी वही हैं थोड़े फेर बदल के साथ, जैसे अंत थोड़ा अलग है। ‘धड़क’ उदयपुर से शुरू होती है, जहाँ के एक दबंग पॉलिटिशियन ठाकुर रतन सिंह (आशुतोष राणा) की बेटी पार्थवी सिंह (जाह्नवी कपूर) को अपने कॉलेज में पढ़ने वाले लड़के मधुकर बागला (ईशान खट्टर) से प्यार हो जाता है। जो कि रतन सिंह को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं होता क्योंकि वो राज घराने से होते हैैं। जिस तरह सैराट में वर्गभेद या जातिभेद की बात को खुले और साफ़ तरीके से दिखााया था ‘धड़क’ में उस पर उतने खुले तौर पर बात नहीं की गयी है। यहाँ भी मुद्दा ऑनर किलिंग का ही है। ऑनर के आगे कोई रिश्ता बड़ा नहीं होता इसी चीज को दिखाया गया हैं।
फ़िल्म का छायांकन सुंदर है। संगीत कानों को अच्छा लगता है। इस में भी अजय-अतुल का ही संगीत हैै। संगीत में मराठी टच साफ सुनायी देता हैं। एक बड़े बजट की फ़िल्म की पूरी छाप हैं जो सैराट से एकदम अलग हैं। अंकित बिष्ट और श्रीधर दोस्तों की भूमिका में अच्छे लगेें हैंं। फ़िल्म की कोरियोग्राफी फरहा खान और तुषार कालिया की है। मेरे हिसाब से अगर आप बहुत ज्यादा उमीदों के साथ नहीं जाते हैं तो आपको येे फ़िल्म निराश नहीं करेगी और इसी के साथ मैं इस फ़िल्म को 3 स्टार दे सकती हूँ। तो जाइए अपनी ‘धड़क’ का आनंद लीजिए और उस ज़वानी वाले प्यार की हल्की हल्की बारिश में भीगने का लुफ्त उठाइये😊।