अभिमान

अभिमान उन कुछ फिल्मों में से एक है जो कभी भी देखी जा सकती हैं। यह ऋषिकेश मुखर्जी की प्रगतिशील सोच को प्रदर्शित करता है कि उन्होंने उस समय (1973) के हिसाब से एक उन्नतिशील फिल्म बनाई।
यह Patriarchy पर प्रशनचिन्ह लाती है।
यह प्रश्न चिन्ह लगती है पुरुषों की सत्ता पर, उनके श्रेष्ठता के अधिकार पर।
तो यह श्रेष्ठता का अधिकार कुछ लोगों को पहले ही खटकने लगा था और इस पर आवाज भी उठाई गई, जिसे आजकल हमारा समाज feminism का नाम देता है।
दरअसल यह आवाज उठाने लायक मुद्दा था भी और है भी।
इसकी वजह से ना जाने कितनी ही औरतों की प्रतिभा, उनकी योग्यता समाज के सामने नहीं आ पाई और सबसे ज्यादा अफसोस की बात यह है कि कितनी ही औरतों को यह ज्ञात भी नहीं हुआ कि उनमें कोई योग्यता भी थी।
अभिमान फिल्म में एक संवाद है.. जहां अमित जी किसी नामी गायक से यह जिक्र करतेे हैं कि ” मैं और मेरी पत्नी अब साथ में गाना गाया करेंगे।” यह सुनकर वह गायक अपने साथी से बोलता है “यह व्यक्ति इतना समझदार हो कर भी इतनी बड़ी गलती कैसे कर सकता है। इसकी पत्नी इससे ज्यादा प्रतिभाशाली है और इतिहास ने सिखाया है कि पुरूष नारी से श्रेष्ठ है। अब इसकी पत्नी, इससे आगे बढ़ जाएगी तो क्या यह बर्दाश्त कर पाायेगा ???”
इस पर साथी का उत्तर आता है कि “अरे! शादी हो गई है सारा संगीत रसोई घर में ही खत्म हो जाएगा।” और इस पर उस गायक का निराशा हो कर यह कहना कि “यह तो और भी बुरा होगा।”
यह पूरी बातचीत इशारा करती है कि जिस तरह से इतिहास में पुरुषों को श्रेष्ठा का अधिकार दिया है, वह चाह कर भी स्त्री को आगे निकलते हुए नहीं देख पाता है और यदि किसी भी कारणवश कोई भी प्रतिभा अपने सही मुकाम पर नहीं पहुंच पाती है तो यह उस समाज के लिए निसंदेह अच्छा नहीं है।
अभिमान एक आसान और सुलझे हुए तरीके से एक पेचीदा और जटिल समस्या को प्रस्तुत करती है वह हिम्मत दिखाती है उस सोच को 1973 में पर्दे पर उतारने की जिसका दंश 2020 में भी देखनेे को मिलता है। इस पीड़ा सेे हमारा समाज निरंतर लड़ता चला आ रहा है।
अभिमान फिल्म की कुछ मुख्य बातें जो प्रभावित करती हैं।
  • एक प्रगतिशील सोच को प्रदर्शित करती है।
  • जटिल मुद्दे को बड़ी ही बेबाकी से पर्दे पर उतारती है।
  • पुरुषों के श्रेष्ठता के अधिकार पर प्रश्नचिन्ह लगाती है।
  • स्त्री व पुरुष की समानता पर ध्यान केंद्रित करती है।
  • प्रतिभा को श्रेष्ठाता का अधिकार दिलाने का प्रयत्न करती है ना की किसी स्त्री और पुरुष को।
तो सही मायनों में feminism 1973 में भी Bollywood में दस्तक दे चुका था। 🙂🙂