लेखक :- आस्था टीकू, यशस्वी मिश्रा, अमित मसुरकर।
निर्देशक :- अमित मसुरकर
अवधि :- 2 घंटा 10 मिनट
OTT :- Amazon Prime video
⭐⭐⭐💫 3.5 / 5
किसी भी निर्देशक को सर्वप्रथम यह पता होना बहुत अनिवार्य होता है कि वह फिल्म किस प्रकार के दर्शकों के लिए बना रहा है।या उसका दर्शक वर्ग क्या देखना चाहता है और यही प्रश्न किसी भी फिल्म का भविष्य काफी हद तक निर्धारित करता है। क्योंकि,
हर फिल्म हर व्यक्ति के लिए नहीं होती,उसी प्रकार हर व्यक्ति हर फिल्म के लिए।
निर्देशक अमित मसुरकर ने भी अपनी फिल्म उसी तरह के दर्शक वर्ग के लिए बनाई है, जो उनके सिनेमा को समझने का हुनर रखते हैं। जब आप किसी व्यक्ति को समझदार मानते हो तो यह आशा करते हो कि वह कम शब्दों में भी आपकी बात को पूर्ण रूप से समझ जाएगा और अमित मसुरकर भी कम शब्दों में अपनी बात को पुख्ता तौर पर रखने में माहिर हैं, जो कि हम लोग न्यूटन में भी देख चुके हैं।
फिल्म में एक संवाद है, जो नीरज कबि के द्वारा बोला गया है और यह फिल्म के मर्म को काफी हद तक बयां कर देता है।
अगर विकास के साथ जीना है तो पर्यावरण को बचा नहीं सकते और अगर पर्यावरण को बचाने जाओ तो विकास बेचारा उदास हो जाता है।
कहने का तात्पर्य है कि विकास और पर्यावरण दोनों अनिवार्य हैं और दोनों के बीच में सामंजस्य बिठाना ही आज की सबसे बड़ी चुनौती है। शेरनी का मुद्दा आदमी वर्सेस जानवर की कहानी को बिना किसी चांदी का बर्क पहनाए आप लोगों के सामने जैसे का तैसा प्रस्तुत कर देना है। कहने को तो कहानी एक शेरनी को बचाने की है जो आदमखोर हो चुकी है, लेकिन कोई शेरनी को सच में बचाना भी चाहता है कि नहीं यह सोचने योग्य विषय है। वहीं एक ईमानदार और अपने काम को लगन से करने में विश्वास रखने वाली वन विभाग की प्रमुख विद्या विन्सेंट(विद्या बालन) हैं, जो सच में शेरनी को सुरक्षित उसके सही स्थान पर पहुंचाना चाहती हैं और उसमें उनका साथ देते हैं प्रोफेसर हसन(विजय राज) और गांव के कुछ लोग। इसी के विपरीत उनके कार्य में बाधा बन रहे हैं … गांव की राजनीति, विभागीय राजनीति,कुछ प्राइवेट शिकारी और काफी हद तक पितृसत्ता जहां उनका अकेला आदमियों के बीच में कार्य करना आता है। फिल्म की कहानी में ऐसा कुछ नहीं है जो पहले देखा या सुना ना गया हो, बस इसको प्रस्तुत करने का ढंग अमित मसुरकर का है जो इसे बाकी फिल्मों से भिन्न करता है।
फिल्म एक फिल्म ना लग कर डॉक्यूमेंट्री ज्यादा लगती है, जो फिल्म के पक्ष में भी है और विपक्ष में भी। यहां किसी भी फिल्मी मसाले का प्रयोग नहीं किया गया है। फिल्म बड़ी सादगी से अपनी बात कहती है और आपके दिमाग में एक छाप और कई सवालों को जन्म देती है। जैसे कि पहले भी कहा है कि यह वाला सिनेमा सबके लिए नहीं है और यदि आपको चकाचौंध, मसाला और सब कुछ सुंदर-सुंदर चाहिए होता है तो यह फिल्म आपके लिए बिल्कुल भी नहीं है।
फिल्म की जान विद्या बालन का अभिनय है। वह जो भी सोच रही हैं, जी रही हैं, महसूस कर रही हैं… वह सब, वह आप तक बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के बड़ी सहजता से पहुंचा देती हैं। उनका यही सादगी से भरा हुआ अभिनय उनका कद फिल्म दर फिल्म बढ़ाता जा रहा है।यदि आप विद्या बालन के फैन हैं तो भी यह फिल्म आपके लिए है। 😊