
केदारनाथ की खूबसूरत वादियों के साथ, इन दोनों का असर साथ में कुछ ऐसा है कि आप एक अदभुत रोमांच(goosebumps) का अनुुुभव करते है। लेकिन जैसे-जैसे फ़िल्म आगे बढ़ती है वो रोमांच थोड़ा-थोड़ा कम होने लगता है। केदारनाथ एक काल्पनिक प्रेम कहानी(fictional love story) हैै जिसको 2013 की उत्तराखंड की तबाही के साथ प्रस्तुत किया गया है। फ़िल्म को ना तो मैं बहुत उम्दा कह सकती हूँ ना ही बहुत साधारण लेकिन हाँ फ़िल्म में दिखाने जैसा काफ़ी कुछ था जिसकी वजह से फ़िल्म की कड़ियाँ अधूरी सी लगती हैं। केदारनाथ में सुशांत सिंह राजपूत एक मुस्लिम पिठू मंसूर बने है जो श्रद्धालुओं को अपने कंधों पर लाद कर केदारनाथ की 18km की यात्रा करता है और इसी फ़िल्म सेे डेब्यू कर रही सारा अली खान एक उच्चकोटि के ब्राह्मण की कन्या का किरदार निभा रही है। दोनोंं ही अपने किरदार में अचूक हैैं। सारा अली खान को डेब्यू के लिये इस से बेहतर फ़िल्म नहीं मिल सकती थी। वह एक दबंग लड़की दिखी है जो बहुत ही स्पष्ट हैै अपनी इच्छाओं को लेेकर। इसी के साथ उनको सुशांत सिंह राजपूत जैसे सक्षम अभिनेता का साथ मिला है।फ़िल्म के सहायक कलाकारों में नीतीश भारद्धाज, पूजा गोर, निशांत दहिया भी असरदार हैं। फिल्म की कमजोर कड़ी उसकी कहानी है जिसमें ईमानदारी की कमी साफ दिखाई देती है। तुषार कांति की सिनेमाटोग्राफी केदारनाथ को सुंदर बनाती है और पूरा असर भी छोड़ती हैं। फिल्म की जान उसका climax है जिसमें 2013 में आये उत्तराखंड के सैलाब को परदे पर उतारा गया है और वो आप को पर्दे(screen) से नजर नहीं हटाने देगा। किन्तु उस सैलाब के दर्द को दर्शकों को महसूस कराने में फ़िल्म फिर चूक जाती है। फ़िल्म काफी भावनााओं को छेड़ती जरूर है लेकिन पूरी तरह अनुभूत(feel) करानेे से पहले ही आगे बढ़ जाती है। अमित त्रिवेदी के संगीत की बात करें तो ‘नमो नमो’ जैसा प्रभाव किसी और गीत में नहीं है बस कहानी के साथ सही लगते हैं। तो सबकुछ मिलाकर एक अच्छी फ़िल्म निकल कर आयी है, जिसको जाकर निःसंदेह देखा जा सकता है।😊😊