मनमर्ज़ीयाँ समीक्षा (Manmarziyan Review)
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‘मनमर्ज़ीयाँ
‘ जैसा कि फ़िल्म के नाम से ही जाहिर है ‘मन की मर्ज़ीयाँ’ और मन की मर्जी गलत या सही नहीं होती, कहते हैं ना ‘दिल के पास दिमाग नहीं होता’। वो जो करता है उसे वो ही सही लगता है।निर्देशक
अनुराग कश्यप की यह फ़िल्म इसी बात को अपने ढंग से प्रस्तुत करती हैं।
अनुराग कश्यप की यह फ़िल्म उनकी पुरानी फिल्मों से काफी अलग है और निर्देशन क़ाबिले तारीफ़ है। वह अपने तरीक़े के निर्देशन के लिए ही जाने जाते है। जब दो अलग ढंग से काम करने वाले लोगों को एकसाथ मिलाया जाता है तो
‘मनमर्ज़ीयाँ
‘ जैसी फ़िल्म निकाल कर सामने आती है। यहाँ पर यह वाक्य मैं
अनुराग कश्यप और
अमित त्रिवेदी के लिए प्रयोग कर रही हूँ। उम्दा निर्देशन और बेहतरीन संगीत जो कि फ़िल्म के साथ इस कदर मिल जाता है कि उस के बिना आप कहानी की आत्मा को महसूस ही नहीं कर पायेंगे। इसी के साथ फ़िल्म की पटकथा और संवाद भी प्रशंसा योग्य हैं।
कहानी की बात करें तो यह एक प्रेम त्रिकोण (Love triangle) है। जो विकी(विकी कौशल),रुमी(तापसी पन्नू) और रॉबी(अभिषेक बच्चन)के मध्य दिखाया गया है। कहानी वैसी ही है जैसी की हम लोग प्रेम त्रिकोण(Love triangle)के बारे में सोचते हैं। अलग है तो कहानी कहने का तरीका, उस को प्रस्तुत करने का अनुठा ढंग। रूमी और विकी एकदूसरे के लिये पागल हैं वो एकदूसरे को पागलों की तरह ‘फ्यार’ करते हैं, जो कि इस पीढ़ी का प्यार है। जिनके लिए प्यार और फ्यार का अंतर खत्म हो चुका है। जब इनके इस फ्यार की खबर रुमी के घरवालों को लगती है तो फ़िल्म में किरदार जुडता है रॉबी का जो करता है, रुमी से प्यार। यह फ़िल्म प्यार और फ्यार का सफ़र है और अंतरात्मा की जंग।
फ़िल्म में अभिषेक बच्चन 2 साल बाद नज़र आए है और क्या नज़र आये है। अपने किरदार को सहजता के साथ बड़ी आसानी से जीया है उन्होंने। उनकी अभिनय की परिपक्वता साफ दिखाई देती है। इसी के साथ विकी कौशल अपने पिछले सभी किरदारों से अलग लगते हुए एक अलग तरह की जीवनशैली को प्रस्तुत करते हुए अनूठी छाप छोड़ते हैं। वह फ़िल्म में सटीक लगते है, कुछ किरदार ऐसे होते है जिस में आपको अपने अभिनय का सामंजस्य दिखाना पड़ता है। उसमें आप कुछ ऊपर-निचे, ज्यादा-कम नहीं कर सकते। इसी तरह का किरदार विकी का इस फ़िल्म में है।अब मैं बात करुँगी तापसी पन्नू की, उत्कृष्ट अभिनय जो कि पूरी परिपक्वता के साथ किया गया है। एक अभिनेता के तौर पर वो कितना निखरती जा रही है उस का अंदाजा आप इस फ़िल्म में उन का अभिनय देख कर बखूबी लगा सकते हैं। अनुराग कश्यप तीनों कलाकारों का उत्तम अभिनय दर्शाने में कामयाब रहे हैं। फ़िल्म की सहायक कास्ट भी उपयुक्त है। अमृतसर की खूबसूरती को बरकरार रखा गया है, जिस से कहानी को उचित आधार मिलता है।
फ़िल्म का पूर्वार्ध(first half) काफी तीव्र है जिसके चलते मध्यांतर(interval) के बाद फ़िल्म खिंची हुई लगती है। परंपरागत सोच वाले दर्शक वर्ग को एक झटका देने का दम ये फ़िल्म रखती है। पंजाबियों के wakhre swag को भी बरकरार रखा गया है।
अनुराग कश्यप के इस प्यार और फ्यार की रोलर कोस्टर यात्रा का मजा लेने के लिए थियेटर का रुख पूरी तरह से किया जा सकता है और इस ग्रे वाले शेड को अपनी जिंदगी में भी थोड़ा सा तो भरा ही जा सकता है। 😊😊