हेलीकॉप्टर ईला फ़िल्म समीक्षा ( Helicopter Eela Movie review)
3*/5*
“चंदा है तू,मेरा सूरज है तू
ओ मेरी आँखों का तारा है तू
जीती हूँ मैं बस तुझे देख कर…“
इस गाने को सुन कर जो बात दिमाग में आती है, वो है ‘माँ’ और उसकी पूरी दुनिया, उस का ‘बेटा’। प्रदीप सरकार की फ़िल्म हेलीकॉप्टर ईला भी माँ-बेटे के इसी रिश्ते की तर्ज पर बनी है। फ़िल्म की कहानी आंनद गांधी के गुजराती नाटक बेटा कगड़ो पर आधारित है। फ़िल्म की कहानी को आंनद गांधी ने मितेश शाह के साथ मिलकर लिखा है।
‘हेलीकॉप्टर ईला’ एक सिंगल माँ ‘ईला रायतुरकर‘(काजोल)जो कि एक सिंंगर हैै, उसकी कहानी है। जो अपने सभी सपनों को अपने दिल की किसी अलमारी में बंद करके चाबी कहीं भूल जाती है। अब उसकी पूरी दुनियां, उसके बेेेटे ‘विवान‘(ऋद्धि सेन) के आस-पास ही घूमती है। वो उसे ही जीवन का एकमात्र उद्देश्य बना लेती है। वह अपनी इस दुनियां में इतना खो जाती है कि उसको यह अहसास भी नहीं होता कि उसका भी कोई सपना था, उसेे भी अपनी जिंदगी में इन सब चीजों से ऊपर उठ कर कुछ करना था। जब विवान, जो कि अपनी माँ से बहुत प्यार करता है, को यह अहसास होता है तो वह ईला को भी यह अहसास कराता है। कभी-कभी माँँ-बाप अपने आप को खो कर अपने बच्चों को पाने में लग जाते है। यह किस हद तक सही है??, फ़िल्म उस ओर भी इशार करती है। कहीं तो रेखा खिंचनी होगी। कहने का मतलब है कि माँ होने की जिम्मेदारी के साथ -साथ आपकी खुद के लिये भी कोई जिम्मेदारी है। उन दोनों को साथ में लेकर चलना ही सफल तालमेल है
अभिनय की बात करे तो जहाँ काजोल होती है, वहाँ एक अलग तरह का चुलबुलापन होता हैै, जो यहाँ भी है। उनके बेटे के किरदार में ऋद्धि सेन ने यह बिल्कुल भी नहीं लगने दिया है कि यह उनकी पहली हिंदी फ़िल्म है। फ़िल्म में सबसे प्रभावशाली चीज़ है, काजोल की सास बनी “किम्मी खन्ना“, बहुत ही खरा अभिनय। इसी के साथ “नेहा धूपिया“, “तोता रॉय चोधरी“ भी फ़िल्म का हिस्सा हैं।

फ़िल्म की कमजोर कड़ी, फ़िल्म की कहानी है, जोकि निःसंदेह अच्छी हो सकती थी। फ़िल्म का अंत जो थोड़ा और अलग दिखाया जा सकता था और इसी के साथ अगर फ़िल्म की लंबाई, जो थोड़ी और कम होती तो फ़िल्म और भी असरदार लगती। लेकिन अगर आप काजोल फैन है, तो फिर ये फ़िल्म देखना तो बनता है और वो आप को १०० फिसदी निराश नहीं करेगी 😊😊।।