निर्देशक – रेणुका शहाणे
कलाकार- तनवी आज़मी, काजोल, मिथिला पालकर, कुणाल रॉय कपूर
अवधि- 1 घंटा 35 मिनट
प्रस्तुतकर्ता- Netflix
⭐⭐⭐🌠 3.5/5
रेणुका शहाणे का नाम लेते ही जो छवि उभर कर आती है वह है नूरानी मुस्कान से दमकता हुआ उनका चेहरा और इसी दमकते हुए चेहरे ने एक उद्देश्य पूर्ण कहानी के साथ फिल्म निर्देशन में अपना कदम स्थापित किया है। फिल्म है त्रिभंग जो नेटफ्लिक्स (Netflix) पर प्रस्तुत की गई है।
त्रिभंग का यथाशब्द अर्थ तीन स्थानों से झुका हुआ अर्थात तीन स्थानों से टेढ़ा या बल खाया हुआ होता है और यह उड़ीसी नृत्य की एक मुद्रा भी है, जिसमें शरीर तीन स्थानों से झुका होता है। फिल्म भी ऐसी ही टेढ़ी-मेढ़ी अर्थात भावनाओं और रिश्तो के उतार–चढ़ावों से परिपूर्ण है। त्रिभंग नारी सशक्तिकरण की अनोखी कहानी को आपके समक्ष प्रस्तुत करती है। फिल्म को कहने का तरीका काफी दिलचस्प हैै, भूत और भविष्य को एक साथ पर्दे पर दर्शाया जा रहा है। फिल्म देखते समय प्रतीत होता है कि आप किसी किताब को पढ़ रहे हैं क्योंकि बहुत ही बारीकी से किरदारों को और उनकी भावनाओं को पर्दे पर उभारा गया है। कुल मिलाकर स्त्रियों की उन भावनाओं और हाव-भावों को उन्मुक्त रुप में प्रस्तुत किया गया है जो शायद कोई महिला ही बखूबी समझ और निखार सकती थी। तो बहुत ही उम्दा निर्देशन देखने को मिलता है।
फिल्म की कहानी की बात करें तो यह तीन औरतों के इर्द-गिर्द घूमती है, जो तीन पीढ़ियों को प्रस्तुत करती हैं।जिसमें नयनतारा आप्टे (तनवी आज़मी) पहली पीढ़ी को दर्शाती है जो कि एक लेखिका है और जिसने अपनी पूरी जिंदगी को अपनी शर्तों पर जिया और कभी भी अपनी इच्छाओं को लेकर किसी भी प्रकार का समझौता नहीं किया, जिसके चलते वह अपनी ही बेटी की नजरों में सम्मान की पात्र नहीं रही है। उनकी बेटी और दूसरी पीढ़ी है अनुराधा आप्टे (काजोल), जो खुद भी अपनी जिंदगी को अपने ही ढंग में अपनाती है और पूरी जिंदगी अपनी बेटी को वह संरक्षण प्रदान करती हैं जिससे वह वंचित रह गई थी। तीसरी पीढ़ी में आती है माशा मेहता (मिथिला पालकर) जो इन दोनों पीढ़ीयों को देखकर अपनी जिंदगी अलग ढंग से निर्धारित करती हैं जो कि युवा पीढ़ी के स्वभाव से बिल्कुल भिन्न है।
फिल्म कुल मिलाकर स्त्रियों के ही दृष्टिकोण को स्त्रियों के प्रति दर्शाती है। समाज ने शुरू से ही स्त्रियों के लिए एक खांचा तैयार किया है और जब कभी भी, कोई भी स्त्री, किसीको भी, उस खांचे से अलग कुछ करती हुई दिखाई देती है तो वह आलोचना की शिकार हो ही जाती है। चाहे वह अपने आप को बेहतर स्तर दिलाना हो या फिर अपने आप को सक्षम सिद्ध करना ही क्यों ना हो। तब समाज यह नहीं देखता कि वह क्या क्या हासिल कर पाई है, वह अपना ध्यान केंद्रित करता है तो उसके अंदर की कमियों को उजागर करने पर। तो फिल्म यह भी बताती है कि कोई भी सर्वगुण संपन्न नहीं होता है किंतु अपनी क्षमताओं का पता होना ही सही मायने में जिंदगी की उड़ान को बताता है।
जो कार्य पसंद हो, आप को आगे ले जाए और समाज को नई दिशा भी दे तो उसे करने में कोई बुराई नहीं है। और इसमें गर जग हंसाई भी हो तो वह सही मायने में जग हंसाई नहीं है।
गुलाब के फूल के साथ कांटे आना तो स्वभाविक है।
हर किरदार पर्दे पर अपनी छाप छोड़ता है और अच्छे लेखन के चलते आपको समझ भी आएगा कि वह ऐसा व्यवहार क्यों करता है। सभी कलाकारों का अभिनय काफी उम्दा है और फिल्म को अवश्य ही देखा जाना चाहिए और इसी के साथ आप लोगों की प्रतिक्रिया का मुझे तो हमेशा इंतजार रहता ही है।
तो देखिए और बताइए भी… यहां कमेंट्स में या फिर मुझे priyankac1306@gmail.com पर email कर के।