Gold… Ghar layege gold gold !!!

गोल्ड समीक्षा (Gold Review)

4*/5*
निर्देशकरीमा कागती कुुुछ अलग तरह के सिनेमा के लिए जानी जाती है। इस बार उन्होंने स्वतंत्र भारत के पहले हॉकी गोल्ड पर आधारित फ़िल्म बनाई है। इस से पेेहले उन्होंने “तलाश” फ़िल्म बनाई थी। इस फ़िल्म के कलाकारों का चुनाव बहुत अच्छी तरह से किया गया है। अक्षय कुमार और मौनी रॉय अहम भूमिका में हैं। साथ मेंं कुणाल कपूर, विनीत कुमार सिंह, अमित शाद और सनी कौशल का शानदार अभिनय है।
फ़िल्म की कहानी शुरू होती है 1936 के बर्लिन ओलंपिक से जब इंडिया, इंडिया नहीं ब्रिटिश इंडिया हुआ करता था और उसी के नाम से हमारी हॉकी टीम हॉकी खेलती थी। ये फ़िल्म है उस सपनें की जो स्वतंत्र भारत के लिए गोल्ड लाने के लिए देखा गया था। ये सपना था टीम के जूनियर मैनेजर तपन दास (अक्षय कुमार) और उस समय टीम का नेतृत्व कर रहे टीम के कप्तान सम्राट (कुणाल कपूर) का। तपन दास ठान लेेता है कि हम हॉकी स्वतंत्र भारत के लिए खेलेेंगें और गोल्ड भी जीतेगें। कहानी के आगें बढ़ने पर राजकुुुमार रघुवेेेन्द्र प्रताप सिंह (अमित शाद) और पंजाब के हिम्मत सिंह (सनी कौशल) की एंट्री होती हैै। इन को साथ में लेकर एक नई टीम का गठन होता हैं लेकिन देेेश के विभाजान की वजह से टीम का बिखरना और तपन दास का दुबारा टीम बनाना काफी दिलचस्प है। ये टीम 1948 में स्वतंत्र भारत के लिए गोल्ड लाती है और ब्रिटिश टीम को हरा कर 200 साल की गुुलामी का बदला लेेती है।
फ़िल्म में हर किरदार ने बहुत अच्छा अभिनय किया है। सभी का रोल बहुत अच्छे से लिखा गया है। किसी एक किरदार को ही फ़ोकस कर के फ़िल्म नहीं बनाई गई है। कुणाल कपूर का किरदार “सम्राट” मेजर ध्यानचंद से प्रेरित लगता है। सनी कौशल भी अपने भाई विक्की कौशल की तरह ही अभिनय में माहिर दिखाई देते है। अमित शाद का किरदार “कुवंर रघुवेन्द्र प्रताप” पूरी तरह रॉयल दिखाई देता है। विनीत कुमार सिंह ने “मुकेबाज” के बाद इस फ़िल्म में भी अच्छे अभिनय का प्रदर्शन किया है। फ़िल्म देेेशभक्ति, जुनून और इमोशन से भरपूर है। देश के विभाजन केे दृश्य दिल को छूने वाले है। फ़िल्म मेंं कोई कमी सीधे तौर पर नहीं दिखाई देती है पर हां फ़िल्म की लंबाई थोड़ी कम की जा सकती थी और संगीत और अच्छा हो सकता था, इस के बावजूद फ़िल्म आप को बांधे रखती है।
फ़िल्म एक उपयुक्त समय पर आई है, जब देशभक्ति का जज्बा अपने चरम पर होता है । तो अपनी देशभक्ति पर थोड़ी मोहर इस फिल्म के साथ लगाइये और उस अवधि का रोमांच ‘गोल्ड’ के साथ महसूस कीजिए ।। 😊😊

Dhadak … Feeling of Love!

3* / 5*

धड़क समीक्षा ( Dhadak Review )
शशांक खेतान एक बार फिर अपनी बहु चर्चित फ़िल्म ‘धड़क’ के साथ बॉक्स ऑफिस पर है। इससे पहले वो अपनी दो फिल्मों ‘हम्प्टी शर्मा की दुल्हनियां’ और ‘बद्रीनाथ की दुल्हनियां’ के लिए तारीफ पा चुके हैं। इस फ़िल्म का इंतजार दर्शकों को बड़ी ही बेताबी से था। हो भी क्यों ना, इस फ़िल्म से दो बड़े नाम जो जुड़े हैं। जाह्नवी कपूर और ईशान खट्टर। ईशान अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन इससे पहले इंटरनेशनल फेम डायरेक्टर माजिद की फ़िल्म ‘बियॉन्ड द क्लाउड’ में कर चुके हैं। जिसके लिए क्रिटिक्स ने उनकी बहुत सरहाना की थी। इस फ़िल्म में भी उन्होंने सरहानीय प्रदर्शन ही किया हैं। दूसरी तरफ जाह्नवी भी अपने रोल में दमदार लगी है और साथ ही बहुत खूबसूरत भी दिख रही है।
अब हम आते है फ़िल्म की कहानी पर क्योंकि ये फ़िल्म मराठी फ़िल्म ‘सैराट’ का हिंदी रिमेक है तो कहानी वही हैं थोड़े फेर बदल के साथ, जैसे अंत थोड़ा अलग है। ‘धड़क’ उदयपुर से शुरू होती है, जहाँ के एक दबंग पॉलिटिशियन ठाकुर रतन सिंह (आशुतोष राणा) की बेटी पार्थवी सिंह (जाह्नवी कपूर) को अपने कॉलेज में पढ़ने वाले लड़के मधुकर बागला (ईशान खट्टर) से प्यार हो जाता है। जो कि रतन सिंह को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं होता क्योंकि वो राज घराने से होते हैैं। जिस तरह सैराट में वर्गभेद या जातिभेद की बात को खुले और साफ़ तरीके से दिखााया था ‘धड़क’ में उस पर उतने खुले तौर पर बात नहीं की गयी है। यहाँ भी मुद्दा ऑनर किलिंग का ही है। ऑनर के आगे कोई रिश्ता बड़ा नहीं होता इसी चीज को दिखाया गया हैं।
फ़िल्म का छायांकन सुंदर है। संगीत कानों को अच्छा लगता है। इस में भी अजय-अतुल का ही संगीत हैै। संगीत में मराठी टच साफ सुनायी देता हैं। एक बड़े बजट की फ़िल्म की पूरी छाप हैं जो सैराट से एकदम अलग हैं। अंकित बिष्ट और श्रीधर दोस्तों की भूमिका में अच्छे लगेें हैंं। फ़िल्म की कोरियोग्राफी फरहा खान और तुषार कालिया की है। मेरे हिसाब से अगर आप बहुत ज्यादा उमीदों के साथ नहीं जाते हैं तो आपको येे फ़िल्म निराश नहीं करेगी और इसी के साथ मैं इस फ़िल्म को 3 स्टार दे सकती हूँ। तो जाइए अपनी ‘धड़क’ का आनंद लीजिए और उस ज़वानी वाले प्यार की हल्की हल्की बारिश में भीगने का लुफ्त उठाइये😊।