Stree….O stree kal aana !

स्त्री समीक्षा (Stree Review)

3.5*/5*

निर्देशक ‘अमर कौशिक’ ने इस फ़िल्म के साथ निर्देशन में अपना प्रथम क़दम रख दिया हैं। इस से पहले वह सहायक निर्देशक के तौर पर काफी फिल्मों में काम कर चुके हैं। इस फ़िल्म से पहले फ़िल्म अब्बा(2017) प्रमुख निर्देशक के तौर पर उनकी प्रथम फ़िल्म थी लेकिन वह एक शॉर्ट फ़िल्म थी जिसे टोरंटो इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टिवल में काफी सराहना मिली थी।

‘स्त्री’ एक हॉरर कॉमेडी हैं। जो सच में हॉरर और कॉमेडी दोनों का अहसास साथ में देती हैं। यही फ़िल्म का मजबूत पक्ष भी है। इसी वजह से यह दोनों वर्गों के दर्शकों को अपनी तरफ आकर्षित करती है। जिस तरह इस फ़िल्म का नाम ‘स्त्री’ थोड़ा अलग लगता है उसी प्रकार कहानी भी थोड़ा हट कर हैं। फिल्म शुरू होती है, ओ स्त्री कल आनाइस लाइन से जो कि मध्यप्रदेश के एक छोटे से कस्बे चंदेरी के सभी घरों की दीवारों पर लिखा जा रहा होता हैं। इस कस्बे में साल में चार दिन कोई पूजा होती है और इसी बीच एक स्त्री की रूह पुरुषों को अपना शिकार बनाती है। वह पुरुषों को अपने साथ ले जाती हैं और उनके वस्त्र छोड़ जाती हैं। इसी डर से उस कस्बे का हर मर्द सहमा हुआ है। फ़िल्म में ‘राजकुमार राव’ की अहम भूमिका है और वह एक सटीक चयन भी है, उन्होंने एक आम आदमी के किरदार को जिस सहजता के साथ पकड़ा है कि वह कही भी अभिनय करते हुए प्रतित नहीं होते। इसी के साथ उनके दोस्तों की भूमिका में ‘अपारशक्ति खुराना’ और ‘अभिषेक बेनर्जी’ आप को हँसने का एक भी मौका नहीं छोड़ते है। फ़िल्म में ‘पंकज त्रिपाठी’ भी छोटी सी भूमिका में हैं लेकिन इस थोड़े से समय में वो जिस तरह का अभिनय कर जाते है, वह आप के दिमाग में रह जाता है और देशी किरदारों में कोई उनका हाथ नहीं पकड़ सकता हैं यह बात उनका अभिनय देख कर साफ दिखाई पड़ती है। ‘श्रद्धा कपूर’ ने भी फ़िल्म की मांग के अनुसार अनुरूप अभिनय का प्रदर्शन किया हैं।
फ़िल्म की जान ‘सुमित अरोरा’ के लिखें हुए डायलॉग हैं जो कॉमेडी की पकड़ को कमजोर नहीं होने देते। फ़िल्म आप को डराती है, और अगले ही पल हँसा कर माहौल को हल्का कर देती है। ‘स्त्री’ को बेहतर अभिनय, अच्छे निर्देशन और एक अलग तरह की कहानी जो कि ताजगी का अहसास कराती है, देखा जा सकता है। फ़िल्म के क्लाइमेक्स पर और काम किया जा सकता था। संगीत में कोई ख़ास बात नहीं है। फ़िल्म जिस मोड़ पर खत्म होती है, वहाँ से उसका सीक्वल आसानी से बनाया जा सकता हैं। इसी के साथ फ़िल्म आप को स्त्री का आदर करने का संकेत भी देती है। मेरी तरफ से यह ‘स्त्री’ 3.5* की हकदार हैं और आप को हँसने और डराने दोनों का दम एकसाथ रखती है। 😊😊