कुछ तो …

कुछ तो बदल रहा है, उम्र के साथ मुझ में
कुछ तो…

पहले जो कदम कहीं भी बेधड़क पड़ा करते थे उनको सोच समझ कर रखने लगी हूं मैं
अपने ही शब्दों के अर्थों में उलझने सी लगी हूं मैं…

अपने को, अपने को… समझदारी के एक लबादे में हमेशा ढकने की कोशिश में रहती हूं,
अपनी ही अलहड़ता से छुपने सी लगी हूं मैं…

मुझे नहीं पता कितना समझदार होने पर लोगों को समझदार की उपाधि दी जाती है या कितना ज्ञान प्राप्त कर वो ज्ञानी कहलाते हैं,
अपने आस-पास, अपने आस-पास..इन बुद्धिजीवियों की होड़ से विचलित सी होने लगी हूं मैं…

मुझे द्रौपदी का किरदार हमेशा से प्रभावित करता आया है।
उसके चेहरे की दृढ़ता हमेशा अपने अंदर महसूस कि है मैंने।किंतु अब इस बात को सबको बताने से भयभीत सी होने लगी हूं मैं…

बहुत संवेदनशील हूं मैं, बहुत संवेदनशील हूं मैं …और ये मेरा सब से बड़ा गुण है लेकिन इस गुण को भी गुण बताने से झिझकने सी लगी हूं मैं…

ये सब इस उम्र के साथ ही तो आया है।

तभी तो कुछ तो..कुछ तो बदल रहा है उम्र के साथ मुझ में…🙂

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