तांडव :- एक सियासी खेल ।।।

निर्देशक – अली अब्बास ज़फ़र
कलाकार- सैफ अली खान, डिंपल कपाड़िया, मोहम्मद जीशान अयूब, सुनील ग्रोवर, कृतिका कामरा, कुमुद मिश्रा, तिग्मांशु धूलिया, सारा जेन डायस, गौहर खान
एपिसोड संख्या – 9 (35 to 40mis/-)
प्रस्तुतकर्ता- Amazon prime video

⭐⭐⭐ / 5

“सही और गलत के बीच में जो चीज आकर खड़ी हो जाती है उसे राजनीति कहते हैं”
उसी तरह अच्छी और बहुत अच्छी के बीच के फर्क को साफ तौर पर जो दर्शाती है उसे कहते हैं तांडव सीरीज..
तांडव सीरीज जब शुरू होती है तो आपको ऐसा लगेगा कि एक बहुत ही बेहतरीन और बारीकी सेेेे बुना हुआ राजनीतिक थ्रिलर आपके समक्ष प्रस्तुत किया जाा रहा है जो अपनी पकड़़ आपके मस्तिष्क पर धीरे धीरे मजबूत करता जाएगा, क्योंकि किरदारों का चयन काफी दिलचस्प है और हर एक किरदार एक दूसरे से जिस प्रकार से जुड़ा हुआ है वह आपकी जिज्ञासा को हवा देनेे के ढंग से ही रचा गया है।

तांडव में आपको वह सभी घटक उपस्थित मिलेंगे जो आपको किसी भी बेहतरीन रचनात्मक सृजन के लिए चाहिए होते हैं किंतु किसी भी उत्तम व्यंजन के लिए सभी मसालों को सही अनुपात में प्रयोग मेंं लाना ही एक अभिष्ट कला होती है और इसी कला का सही उपयोग करने से निर्देशक अली अब्बास ज़फ़र थोड़ा सा चूक गए हैैं।

तो यहां यह कहना कदापि गलत नहीं होगा कि
” नाम बड़े और दर्शन छोटे”
तांडव एक सियासी ड्रामा है। जिसमें यह दिखाया गया है कि अपनी सत्ता को बनाए रखने के लिए आपका कुछ भी कर जाना या किसी भी हद तक चले जाना नाजायज नहीं है। झूठ को किस तरह से झाड़ पोछ़ कर सफेद लबादे में जनता के सामने प्रस्तुत किया जा सकता है, वह तांडव आपको बताएगा। साम दाम दंड भेद की राजनीति और यही है असली राजनीति भी शायद।
कहानी की बात करें तो एक राजनीतिक पार्टी और परिवार की कहानी है। जो देवकी नंदन (तिग्मांशु धूलिया) से शुरू होती है। जिसकी पार्टी जनता लोक दल देश की सबसे मजबूत पार्टी है। और इस बार भी चुनाव में सफलता प्राप्त करने वाली है। जिसके चलते देवकी नंदन एक बार फिर प्रधानमंत्री बनने वाले हैं किंतु नतीजों से पूर्व ही उनकी मृत्यु हो जाती है। और फिर शुरू होता है राजनीतिक दांवपेच का खेल… कि अगला पी एम कौन बनेगा, पुत्र समर प्रताप (सैफ अली खान), पार्टी प्रमुख अनुराधा किशोर(डिंपल कपाड़िया) या फिर पार्टी के वरिष्ठ नेता गोपाल दास मुंशी(कुमुद मिश्रा)। इसी के साथ प्रवेश होता है छात्र राजनीति का जिसके चलते छात्र नेता शिव शेखर(मोहम्मद जीशान अयूब) और छात्र राजनीती का मुख्यधारा की राजनीति से जुड़ाव का। यह सब देखना काफी दिलचस्प भी है। सीरीज में छात्र राजनीति, मुख्यधारा की राजनीति, किसान आंदोलन, मीडिया की भूमिका मौजूदा राजनीति में, सब कुछ है और यह सब किस तरह से कार्य करता है उसकी भी झलक है किंतु सीरीज का climax उस की कमजोर कड़ी है। जिसके चलते अंत में एक अधूरेपन का स्वाद आता है।
अभिनय की बात करें तो सुनील ग्रोवर और सैफ अली खान के किरदारों ने पूर्ण अधिपत्य स्थापित किया हुआ है और वह आपको अपने अभिनय से पूर्ण रूप से विस्मित भी करेंगे और इसी कड़ी को आगे बढ़ाने का कार्य मोहम्मद जीशान अयूब ने भी किया है। किरदारों का चित्रण, लेखन और उनका चयन ही सीरीज की सबसे मजबूत कड़ी है और जिसके चलते आप सभी को यह सीरीज अवश्य देखनी चाहिए और अपनी प्रतिक्रिया को मुझ तक पहुंचाना भी चाहिए।

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