कभी कभी…

कभी-कभी लगता है मन शांत नहीं है,
शायद होने की कोई बात ही नहीं है ।

कभी-कभी लगता है सबकुछ बुझा-बुझा सा है,
शायद कुछ अच्छा इसे सुझा ही नहीं है ।

कभी-कभी लगता है सब उजड़ सा गया है,
शायद मरम्मत का समय आया ही नहीं है ।

कभी-कभी लगता है सब रुका-रुका सा है,
शायद थकान अभी उतरी ही नहीं है ।

कभी-कभी लगता है सब पर चढ़ा कोई कर्ज सा है,
शायद किस्तें सही से चुकाई ही नहीं हैं ।

कभी-कभी लगता है जीने का कोई मतलब सा नहीं है,
शायद कभी सही से मतलब समझा ही नहीं है ।

कभी-कभी लगता है हर रिश्ता कितना ख़ास है,
शायद कभी इतने गौर से देखा ही नहीं है ।

कभी-कभी लगता है हर सांस कितनी कीमती है,
शायद कभी सही क़ीमत लगाई ही नहीं है ।

कभी-कभी लगता है सुकून कितना सस्ता है,
मिले तो चार दिवारी में वरना पूरी दुनियाँ में सुनवाई ही नहीं है ।

#pcscrawls

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