Category: Movie Reviews
कागज :- जंग कागज की…
निर्देशक – सतीश कौशिक
कलाकार – पंकज त्रिपाठी, मोनल गज्जर, सतीश कौशिक
अवधि – 1 घंटा 49 मिनट
प्रस्तुतकर्ता – Zee5
⭐⭐⭐
” कुछ नहीं है मगर है सब कुछ भी
क्या अजीब चीज है यह कागज भी
बारिशों में है नाव कागज की
सर्दियों में अलाव कागज की
आसमां में पतंग कागज की
सारी दुनिया में जंग कागज की ”
तो सतीश कौशिक निर्देशित फिल्म कागज में भी सारी जंग कागज की ही है। एक कागज जिसकी कोई बिसात नहीं होती है किंतु असल में तो सारी बाजी उसी कागज के हाथ में होती है। अगर किसी सरकारी कागज पर यह लिख गया है कि व्यक्ति ऊंट है तो उसको अपनी पूरी जिंदगी लगा देनी पड़ती है यह साबित करने में कि वह व्यक्ति ऊंट नहीं है, तो यह हैसियत रखता है एक सरकारी कागज।
कागज फिल्म की कहानी प्रेरित है लाल बिहारी मृतक की जिंदगी से जिन्होंने 18 साल के लंबे संघर्ष के बाद अपने आप को सरकारी कागजों में जीवित साबित कर पाया। उनके इस संघर्ष को पर्दे पर जीवंत किया है पंकज त्रिपाठी जी ने और जिस शिद्दत से उन्होंने इस किरदार को जिया है जो आपको आभास मात्र भी नहीं होने देगा कि वह अभिनय कर रहे हैं और शायद यही उनकी खासियत भी है, “एक सहज और सुलझी हुई अभिनय प्रणाली”।
कहने को तो एक लेखपाल ने लालच में आकर एक व्यक्ति को मृतक लिख दिया जिसको सुधारना इतना भी कठिन नहीं हो सकता था कि 18 साल का लंबा समय लग जाए किंतु किसी भी गलती को सुधारने के लिए उसको मानना आवश्यक है और यहां मुद्दा गलती ना मानना है। सरकारी प्रणाली के इसी दोष को उजागर कर प्रत्यक्ष रूप में प्रस्तुत किया गया है।
हर फिल्म हर व्यक्ति के लिए नहीं होती और ना ही हर व्यक्ति हर फिल्म के लिए। यह फिल्म भी कुछ इसी तरह की है, अच्छी है किंतु सबके लिए नहीं है।
अभिनय की बात करें तो एम मोनल गज्जर ने बहुत अविश्वसनीय अभिनय का प्रदर्शन किया है उन्होंने भरत लाल की पत्नी भूमिका की बड़ी ही सहजता के साथ निभााई है इसी के साथ मीता वशिष्ठठ, नेहा चौहान, अमर उपाध्याय, सतीश कौशिक सभी लोग अपने अपने स्थान पर उपयुक्त और असरदार हैै।
फिल्म एक अच्छे संदेश को सामने रखती है किंतु 2 घंटे की अवधि के लिए वह ज्यादा है और खींची हुई प्रतीत होती है। इसी के साथ अंत में किसी भी सीधे संदेश के ना होने की वजह से थोड़ी अधूरी अधूरी भी लग सकती हैं, किंतु फिर भी एक बार अवश्य ही देखी जा सकती है। और यदि आप पंकज त्रिपाठी के फैन हैं तो निस्संदेह देखनी ही चाहिए।
अहसास….
उस समय हम सब बच्चों को वही खेल प्यारा था।
“उनको बड़ा अरमान था मुझे मेरी शादी में देखने का, उनके अनुसार मैं बड़ी सुंदर थी और अपनी शादी में बड़ी ही सुंदर लगने वाली थी दुल्हन के रूप में..”
हर पल हर लम्हा कोई ना कोई किस्सा बन ही रहा होता है।
डॉली किट्टी और वो चमकते सितारे फिल्म समीक्षा Movie Review
- निर्देशक – अलंकृता श्रीवास्तव
- कलाकार – कोंकणा सेन शर्मा, भूमि पेडनेकर
- अवधी – २ घंटे
- प्रस्तुतकर्ता – नेटफ्लिक्स
- ⭐⭐⭐
कहानी कहने का जो तरीका है वह भी कंफ्यूज है और डॉली और किट्टी दोनों के किरदार भी उलझे हुए हैं। दोनों किरदार चचेरी बहनों के रिश्ते में है कोंकणा और भूमि बहनों के किरदार में काफी सहज व विश्वसनीय हैं लेकिन उनके किरदारों को पता ही नहीं है कि उन्हें जिंदगी से क्या चाहिए है।
अभिमान नहीं स्वाभिमान
“जहां दिल खुश ना हो वहां से चले जाना
अभिमान नहीं स्वाभिमान होता है।”
हमनें सबको कहते हुए सुना है अभिमान और स्वाभिमान में बड़ा बारीक सा फर्क है और सब उस फर्क को अपनी-अपनी परिभाषा में परिभाषित करते हैं।
स्वाभिमान:- मेरा सम्मान हो यह मेरी अपेक्षा नहीं है लेकिन कोई मेरा अपमान ना करें यह मैं जरूर सुनिश्चित करता हूं/ करती हूं।
अभिमान:- मैं स्वयं सक्षम हूं और यह मुकाम मैंने हासिल कियाा है तो मेरा सम्मान होना चाहिए यह मेरा हक है।
अभिमान और स्वाभिमान की जंग बहुत पुरानी है और निरंतर चलती रही है लेकिन जब औरतों के स्वाभिमान की बात आती है तो यह और भी पेचीदा और उलझन भरी हो जाती है, यह उलझन अनादि काल से है। यहां महाभारत को ही उदाहरण के तौर पर ले लीजिए कितने ही लोगों को यह कहते और समझाते हुए सुना है कि महाभारत का युद्ध द्रोपदी के प्रतिशोध की वजह से हुआ है, वह एक अभिमानी स्त्री थी, वह चाहती तो यह युद्ध टाल सकता था । लेकिन अगर आपको सच में अभिमान और स्वाभिमान के बीच का अंतर ज्ञात है तो आप यही कहेंगे की यह उसके स्वाभिमान की लड़ाई थी, उसनेे अपने अपमान हो चुपचाप सहन नहीं किया और होना भी यही चाहिए। जब स्त्रियों के स्वाभिमान की बात आती है तो बहुत सारी भ्रांतियां, रीति-रिवाज, प्रथाएं आकर खड़ी हो जाती हैं जैसे कि समाज के इस खोखले ढांचे को चलाने की सारी जिम्मेदारी तो केवल स्त्रियों ने ही अपने कंधों पर उठा रखी है। अभी फिलहाल में एक फिल्म आई है थप्पड़। बहुत लोगों ने देखी भी होगी, सभी की अपनी-अपनी प्रतिक्रिया भी है उस फिल्म पर जैसे कि नाम से ही ज्ञात हो जाता है, मुद्दा एक थप्पड़ का है जो पति ने अपनी पत्नी को मारा है।
- ” बस एक थप्पड़ ही तो है ! क्याा करूं ? हो गया ना…”
- ” रिश्ते बनाने में इतनी effort नहीं लगती जितनी निभाने में लगती हैं।”
- “थोड़ी बहुत मार-पीट तो expression of love ही है ना सर… “
- “उसनेेे मुझे मारा ; पहली बार, नहीं मार सकता बस इतनी सी बात है।”
- ” Just a slap पर मार नहीं सकता…”
ये सभी डायलॉग अपने आप में पूरी कहानी बयान करते हैं। हां, एक थप्पड़ ही तो है लेकिन मार नहीं सकता… यह पंक्ति अपने आप में सक्षम है यह बताने के लिए कि किसी भी रिश्ते में हाथ उठाना और मारना न्याय संगत नहीं है और यदि कोई व्यक्ति ऐसा करता है तो वह सामने वाले का अपमान कर रहा है और यह उसके स्वाभिमान पर चोट है।
भारतीय समाज पितृसत्ता(patriarchy)व पित्रतंत्र पर कार्य करता है, जिसके चलते विवाह के बाद स्त्री पति के घर का हिस्सा होती है और उसका उपनाम अपने नाम के साथ लगाती है, यह अनादि काल से होता आ रहा है, जिसके चलते हमारी जड़ों में समा चुका है और इसी के साथ यह धारणा भी समा चुकी है कि पति या पिता ही घर का मुखिया होता है उसी के हिसाब से चीजें चलनी चाहिए या चलती है।
थप्पड़ फिल्म उसी पित्रतंत्र के ऊपर एक प्रश्न चिन्ह लगाती है, यह प्रश्नचिन्ह लगती है रिश्तो में पुरुष श्रेष्ठता की हकदारी पर, यह प्रश्नन उठाती हैं उस लिंग भेदभाव(gender discrimination) केे ऊपर जो बचपन से पालन-पोषण(upbringing) में है और यह सिर्फ पुरुषों द्वारा नहीं है ये औरतों के द्वारा भी है क्योंकि शुरू से देेेखा ही वही है। जैसे “थोड़ा बर्दाश्त करना सीखना चाहिए औरतों को…” क्यों भाई क्यों सीखना चाहिए और अगर सीखना ही चाहिए तो फिर स्त्री-पुरुष दोनों को सीखना चाहिए, कोई नियम है तो दोनों के लिए समान क्यों नहीं।
मुद्दा यह ही है कि कितनी ही चीजें होती हैं रोजमर्रा कि जिंदगी में जहां पर लोग बिना सोचे समझे स्त्रियों पर टिप्पणियां कर देते हैं और उनको एहसास भी नहीं होता कि वह अपने आपको श्रेष्ठता का अधिकार दे रहे हैं।
“यार ! जब गाड़ी चलानी नहीं आती तो लेकर निकलती क्यों हैं…”
यह सबसे ज्यादा प्रयोग में आने वाली पंक्ति है क्योंकि दिमाग में कहीं ना कहीं यह बैठा हुआ है ‘औरतें अच्छी गाड़ी नहीं चलाती है।’
कहा तो यह जाता है, स्त्री और पुरुष बराबर हैं, एक गाड़ी के दो पहिए हैं, एक के बिना दूसरे का निर्वाह नहीं है। यदि यह सब बातें सही है तो पुरुषों को स्त्रियों पर हावी होने का अधिकार कहां से मिलता है और कौन देता है ?? यहां सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यह हक या अधिकार स्त्रियां स्वयं ही जाने – अनजाने देती रहती हैं और उनको इसका एहसास तक नहीं होता यदि किसी को एहसास हो जाए तो यह कहा जाता है,
“यार वह तो जरा सी बात का बतंगड़ बना देती है, ऐसा तो घर संसार में लगा ही रहता है…”
नहीं ! ऐसे घर संसार नहीं चलते हैं और यदि कोई स्त्री अपने स्वाभिमान के लिए खड़ी होती है तो वह गलत या अभिमानी नहींं है।बस वह वो सब देख कर चुपचाप सहन नहीं करना चाहती, वह सबको दृढ़ता से बताना चाहती है कि यह गलत है और यदि सामने वाले को अपनी गलती का एहसास नहीं है तो यह एहसास दिलाना मेरी नैतिक जिम्मेदारी है क्योंकि वह उस श्रंखला को तोड़ना चाहती है जो पितृसत्ता केे चलते पुरुषों के अंदर जड़ कर चुकी है कि…
उनको हाथ उठाकर अपना आक्रोश दिखाने का, अपनी बात को बलपूर्वक मनवाने का, अपनी मनचाही मांगों को पूरा कराने का अधिकार है। ऐसा कोई अधिकार होता ही नहीं है और यदि आप इस तरह के किसी भी रिश्ते के अंदर है तो अपनी सोच को जागृत कीजिए क्योंकि आप कहीं ना कहीं उस श्रंखला को पानी दे रहे हैं, जो हमारे समाज को खोखला कर रही है। आप एक लड़की को, जो आपके घर में हैं, अपना स्वाभिमान दबाना सिखा रहे हैं। अनजाने में ही आप अपने घर के लड़के को यह बता रहे हैं कि… यह तो आम बात है लड़के या आदमी ऐसे ही व्यवहार करते हैं। यह आपके लिए और हमारे समाज के लिए अच्छा नहीं है। जहां आपकी और आपके रिश्तो की कदर ना हो वहां खड़े होने से अकेले खड़े रहना अच्छा है, यह अभिमान नहीं स्वाभिमान है…।
लम्हें :- ना उम्र की सीमा हो…
अब आप चाहें आदतों को दोष दो या भारतीय परंपराओं की दुहाई लेकिन जब प्यार की बात आती है तो लोगों ने हदें निर्धारित की हुई हैं। प्यार करो लेकिन उसके बारे में बात नहीं और जब उसमें उम्र का अंतर अधिक हो तो वह और भी अधिक चर्चा का विषय बन जाता है।
“प्यार जो हर परंपरा से आगे हो”…
अभिमान
-
एक प्रगतिशील सोच को प्रदर्शित करती है।
-
जटिल मुद्दे को बड़ी ही बेबाकी से पर्दे पर उतारती है।
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पुरुषों के श्रेष्ठता के अधिकार पर प्रश्नचिन्ह लगाती है।
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स्त्री व पुरुष की समानता पर ध्यान केंद्रित करती है।
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प्रतिभा को श्रेष्ठाता का अधिकार दिलाने का प्रयत्न करती है ना की किसी स्त्री और पुरुष को।
ख़्वाब …
उनका भी क्या कोई अपना रूप होता है।
तेरी आंखों में सजे तो तुझ से लगते हैं,
मेरी आंखों में आकर मेरी शख्सियत से मिलते हैं।
हर शख्स का ख़्वाब एक नहीं होता,
हर वक्त वो पाक और नेक नहीं होता।
तेरे दम से वह दम भरता है, तू जब इठला कर इतरा कर पूरा जोर लगाता है तब वह भी तेरे साथ ही बल खाता है।
जब हार कर तू उसे झटक देता है, तो वह भी छटपटा कर कोने में सिसकियां भरता है।
मुश्किल ख्वाबों को बुनना नहीं सही ख्वाब चुनना होता है।ख़्वाबों का चुनाव अनिवार्य है, उनको स्वयं का आकार देना अपरिहार्य है।
मेरे ख़्वाबों में मेरी ही झलक होनी चाहिए।
तभी तो वह मेरे वजूद से मेल खाएगें और भविष्य के दर्पण में हम दोनों एक ही रूप में झिलमिलाएगें ।
बस शर्त ये है कि .. मेरे ख्वाब मेरे द्वारा ही चुने जाएंगे …
Shakuntala Devi : Amazing Woman !!!
Mission Mangal – पूरी दुनिया से कहो Copy That !!!

मिशन मंगल फ़िल्म समीक्षा (Movie Review)
GULLY BOY : Apna time aayega !!!

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Ek Ladki Ko Dekha To Aisa Laga…… Thoughtful !!!

‘एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा’ फ़िल्म समीक्षा (Movie Review)
Uri: The Surgical Strike !!!

उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक फ़िल्म समीक्षा ( Movie Review)
Kedarnath :- Namo Namo Ji Shankara !!!

केदारनाथ की खूबसूरत वादियों के साथ, इन दोनों का असर साथ में कुछ ऐसा है कि आप एक अदभुत रोमांच(goosebumps) का अनुुुभव करते है। लेकिन जैसे-जैसे फ़िल्म आगे बढ़ती है वो रोमांच थोड़ा-थोड़ा कम होने लगता है। केदारनाथ एक काल्पनिक प्रेम कहानी(fictional love story) हैै जिसको 2013 की उत्तराखंड की तबाही के साथ प्रस्तुत किया गया है। फ़िल्म को ना तो मैं बहुत उम्दा कह सकती हूँ ना ही बहुत साधारण लेकिन हाँ फ़िल्म में दिखाने जैसा काफ़ी कुछ था जिसकी वजह से फ़िल्म की कड़ियाँ अधूरी सी लगती हैं। केदारनाथ में सुशांत सिंह राजपूत एक मुस्लिम पिठू मंसूर बने है जो श्रद्धालुओं को अपने कंधों पर लाद कर केदारनाथ की 18km की यात्रा करता है और इसी फ़िल्म सेे डेब्यू कर रही सारा अली खान एक उच्चकोटि के ब्राह्मण की कन्या का किरदार निभा रही है। दोनोंं ही अपने किरदार में अचूक हैैं। सारा अली खान को डेब्यू के लिये इस से बेहतर फ़िल्म नहीं मिल सकती थी। वह एक दबंग लड़की दिखी है जो बहुत ही स्पष्ट हैै अपनी इच्छाओं को लेेकर। इसी के साथ उनको सुशांत सिंह राजपूत जैसे सक्षम अभिनेता का साथ मिला है।फ़िल्म के सहायक कलाकारों में नीतीश भारद्धाज, पूजा गोर, निशांत दहिया भी असरदार हैं। फिल्म की कमजोर कड़ी उसकी कहानी है जिसमें ईमानदारी की कमी साफ दिखाई देती है। तुषार कांति की सिनेमाटोग्राफी केदारनाथ को सुंदर बनाती है और पूरा असर भी छोड़ती हैं। फिल्म की जान उसका climax है जिसमें 2013 में आये उत्तराखंड के सैलाब को परदे पर उतारा गया है और वो आप को पर्दे(screen) से नजर नहीं हटाने देगा। किन्तु उस सैलाब के दर्द को दर्शकों को महसूस कराने में फ़िल्म फिर चूक जाती है। फ़िल्म काफी भावनााओं को छेड़ती जरूर है लेकिन पूरी तरह अनुभूत(feel) करानेे से पहले ही आगे बढ़ जाती है। अमित त्रिवेदी के संगीत की बात करें तो ‘नमो नमो’ जैसा प्रभाव किसी और गीत में नहीं है बस कहानी के साथ सही लगते हैं। तो सबकुछ मिलाकर एक अच्छी फ़िल्म निकल कर आयी है, जिसको जाकर निःसंदेह देखा जा सकता है।😊😊
2.0…. Ace Direction !!!
2.0 फ़िल्म समीक्षा (2.0 Movie Review )
अब ये फ़िल्म “रजनीकांत“ की है और जिस फ़िल्म में वो होते है वहाँ कोई और कहाँ नजर आता है, ये तो हम रोबोट फ़िल्म मेंं भी देेेख चुके है और उनके अभिनय के बारे में कुछ बोलना मतलब ” सूरज को दीपक दिखाना ” वाली बात हो जायेगी 😊। अब बात करते है फ़िल्म के विलन “अक्षय कुमार“ की, मुझे फ़िल्म में वो कहीं नजर नहीं आये, नजर आया तो एक सशक्त विलन जो पूरी ईमानदारी से हीरो को हर तरह से टक्कर देता हुआ दिखा और ये एक अभिनेता के रूप में “अक्षय” की जीत है। फ़िल्म का बैकग्राउंड स्कोर अच्छा है जो “ए.आर. रहमान“ द्वारा दिया गया है। इसी के साथ “एमी जैक्सन“ भी नजर आती है और अपने रोल को अच्छे से अदा करती दिखी हैै। “2.0“ एक मनोरंजक फ़िल्म हैै और आप बिना किसी शंका के देखने जा सकते है और आप बोर नहीं होंगे ये मुझे पूरा यकीन है😊।