Tribhanga – टेढ़ी मेढ़ी Crazy

निर्देशक – रेणुका शहाणे
कलाकार- तनवी आज़मी, काजोल, मिथिला पालकर, कुणाल रॉय कपूर
अवधि- 1 घंटा 35 मिनट
प्रस्तुतकर्ता- Netflix
⭐⭐⭐🌠 3.5/5
रेणुका शहाणे का नाम लेते ही जो छवि उभर कर आती है वह है नूरानी मुस्कान से दमकता हुआ उनका चेहरा और इसी दमकते हुए चेहरे ने एक उद्देश्य पूर्ण कहानी के साथ फिल्म निर्देशन में अपना कदम स्थापित किया है। फिल्म है त्रिभंग जो नेटफ्लिक्स (Netflix) पर प्रस्तुत की गई है।
त्रिभंग का यथाशब्द अर्थ तीन स्थानों से झुका हुआ अर्थात तीन स्थानों से टेढ़ा या बल खाया हुआ होता है और यह उड़ीसी नृत्य की एक मुद्रा भी है, जिसमें शरीर तीन स्थानों से झुका होता है। फिल्म भी ऐसी ही टेढ़ी-मेढ़ी अर्थात भावनाओं और रिश्तो के उतारचढ़ावों से परिपूर्ण है। त्रिभंग नारी सशक्तिकरण की अनोखी कहानी को आपके समक्ष प्रस्तुत करती है। फिल्म को कहने का तरीका काफी दिलचस्प हैै, भूत और भविष्य को एक साथ पर्दे पर दर्शाया जा रहा है। फिल्म देखते समय प्रतीत होता है कि आप किसी किताब को पढ़ रहे हैं क्योंकि बहुत ही बारीकी से किरदारों को और उनकी भावनाओं को पर्दे पर उभारा गया है। कुल मिलाकर स्त्रियों की उन भावनाओं और हाव-भावों को उन्मुक्त रुप में प्रस्तुत किया गया है जो शायद कोई महिला ही बखूबी समझ और निखार सकती थी। तो बहुत ही उम्दा निर्देशन देखने को मिलता है।
फिल्म की कहानी की बात करें तो यह तीन औरतों के इर्द-गिर्द घूमती है, जो तीन पीढ़ियों को प्रस्तुत करती हैं।जिसमें नयनतारा आप्टे (तनवी आज़मी) पहली पीढ़ी को दर्शाती है जो कि एक लेखिका है और जिसने अपनी पूरी जिंदगी को अपनी शर्तों पर जिया और कभी भी अपनी इच्छाओं को लेकर किसी भी प्रकार का समझौता नहीं किया, जिसके चलते वह अपनी ही बेटी की नजरों में सम्मान की पात्र नहीं रही है। उनकी बेटी और दूसरी पीढ़ी है अनुराधा आप्टे (काजोल), जो खुद भी अपनी जिंदगी को अपने ही ढंग में अपनाती है और पूरी जिंदगी अपनी बेटी को वह संरक्षण प्रदान करती हैं जिससे वह वंचित रह गई थी। तीसरी पीढ़ी में आती है माशा मेहता (मिथिला पालकर) जो इन दोनों पीढ़ीयों को देखकर अपनी जिंदगी अलग ढंग से निर्धारित करती हैं जो कि युवा पीढ़ी के स्वभाव से बिल्कुल भिन्न है।
फिल्म कुल मिलाकर स्त्रियों के ही दृष्टिकोण को स्त्रियों के प्रति दर्शाती है। समाज ने शुरू से ही स्त्रियों के लिए एक खांचा तैयार किया है और जब कभी भी, कोई भी स्त्री, किसीको भी, उस खांचे से अलग कुछ करती हुई दिखाई देती है तो वह आलोचना की शिकार हो ही जाती है। चाहे वह अपने आप को बेहतर स्तर दिलाना हो या फिर अपने आप को सक्षम सिद्ध करना ही क्यों ना हो। तब समाज यह नहीं देखता कि वह क्या क्या हासिल कर पाई है, वह अपना ध्यान केंद्रित करता है तो उसके अंदर की कमियों को उजागर करने पर। तो फिल्म यह भी बताती है कि कोई भी सर्वगुण संपन्न नहीं होता है किंतु अपनी क्षमताओं का पता होना ही सही मायने में जिंदगी की उड़ान को बताता है।
जो कार्य पसंद हो, आप को आगे ले जाए और समाज को नई दिशा भी दे तो उसे करने में कोई बुराई नहीं है। और इसमें गर जग हंसाई भी हो तो वह सही मायने में जग हंसाई नहीं है।
गुलाब के फूल के साथ कांटे आना तो स्वभाविक है।
हर किरदार पर्दे पर अपनी छाप छोड़ता है और अच्छे लेखन के चलते आपको समझ भी आएगा कि वह ऐसा व्यवहार क्यों करता है। सभी कलाकारों का अभिनय काफी उम्दा है और फिल्म को अवश्य ही देखा जाना चाहिए और इसी के साथ आप लोगों की प्रतिक्रिया का मुझे तो हमेशा इंतजार रहता ही है।
तो देखिए और बताइए भी… यहां कमेंट्स में या फिर मुझे priyankac1306@gmail.com पर email कर के।

कागज :- जंग कागज की…

निर्देशक – सतीश कौशिक
कलाकार – पंकज त्रिपाठी, मोनल गज्जर, सतीश कौशिक
अवधि – 1 घंटा 49 मिनट
प्रस्तुतकर्ता – Zee5

⭐⭐⭐

” कुछ नहीं है मगर है सब कुछ भी
क्या अजीब चीज है यह कागज भी
बारिशों में है नाव कागज की
सर्दियों में अलाव कागज की
आसमां में पतंग कागज की
सारी दुनिया में जंग कागज की ”

तो सतीश कौशिक निर्देशित फिल्म कागज में भी सारी जंग कागज की ही है। एक कागज जिसकी कोई बिसात नहीं होती है किंतु असल में तो सारी बाजी उसी कागज के हाथ में होती है। अगर किसी सरकारी कागज पर यह लिख गया है कि व्यक्ति ऊंट है तो उसको अपनी पूरी जिंदगी लगा देनी पड़ती है यह साबित करने में कि वह व्यक्ति ऊंट नहीं है, तो यह हैसियत रखता है एक सरकारी कागज।

कागज फिल्म की कहानी प्रेरित है लाल बिहारी मृतक की जिंदगी से जिन्होंने 18 साल के लंबे संघर्ष के बाद अपने आप को सरकारी कागजों में जीवित साबित कर पाया। उनके इस संघर्ष को पर्दे पर जीवंत किया है पंकज त्रिपाठी जी ने और जिस शिद्दत से उन्होंने इस किरदार को जिया है जो आपको आभास मात्र भी नहीं होने देगा कि वह अभिनय कर रहे हैं और शायद यही उनकी खासियत भी है, “एक सहज और सुलझी हुई अभिनय प्रणाली”।

कहने को तो एक लेखपाल ने लालच में आकर एक व्यक्ति को मृतक लिख दिया जिसको सुधारना इतना भी कठिन नहीं हो सकता था कि 18 साल का लंबा समय लग जाए किंतु किसी भी गलती को सुधारने के लिए उसको मानना आवश्यक है और यहां मुद्दा गलती ना मानना है। सरकारी प्रणाली के इसी दोष को उजागर कर प्रत्यक्ष रूप में प्रस्तुत किया गया है।
हर फिल्म हर व्यक्ति के लिए नहीं होती और ना ही हर व्यक्ति हर फिल्म के लिए। यह फिल्म भी कुछ इसी तरह की है, अच्छी है किंतु सबके लिए नहीं है।

अभिनय की बात करें तो एम मोनल गज्जर ने बहुत अविश्वसनीय अभिनय का प्रदर्शन किया है उन्होंने भरत लाल की पत्नी भूमिका की बड़ी ही सहजता के साथ निभााई है इसी के साथ मीता वशिष्ठठ, नेहा चौहान, अमर उपाध्याय, सतीश कौशिक सभी लोग अपने अपने स्थान पर उपयुक्त और असरदार हैै।

फिल्म एक अच्छे संदेश को सामने रखती है किंतु 2 घंटे की अवधि के लिए वह ज्यादा है और खींची हुई प्रतीत होती है। इसी के साथ अंत में किसी भी सीधे संदेश के ना होने की वजह से थोड़ी अधूरी अधूरी भी लग सकती हैं, किंतु फिर भी एक बार अवश्य ही देखी जा सकती है। और यदि आप पंकज त्रिपाठी के फैन हैं तो निस्संदेह देखनी ही चाहिए।

अहसास….

कहने को तो जिंदगी बहुत छोटी सी है
लेकिन पीछे मुड़कर देखो तो लगता है जमाना गुजर गया है।कुछ रिश्ते मौसम की तरह बदल जाते हैं और कुछ पर कितने भी मौसम निकल जाए अहसास तक नहीं होता।
कभी-कभी अपने को अपने गांव के घर की मुंडेर पर पाती हूं…
आज भी मन में गुदगुदी सी हो जाती है, जब यह सोचती हूं कि मम्मी जब कुटी काटा करती थी तो मैं क्यों मना करती थी कि…“मेरी मम्मी कुटी नहीं काटेगी… “कुछ लगता होगा बाल मन को अलग सा ।
आज भी मुझे याद है कैसे हम सब गर्मी की छुट्टियों में जिया-दादी की चारपाई के नीचे घुसकर उसको अपने सर से उठा दिया करते थे और वह जोर जोर से चिल्लाने लगती थी
“मरे दूपहारी में हू, चैन नाहीं लेन देत हैं..”

उस समय हम सब बच्चों को वही खेल प्यारा था।

बाबा का वो हर बार नीम के पेड़ पर मेरे लिए झूला डालना और एक बार मेरे भाई ने इतनी तेज धक्का दिया था कि झूला काटें की झाड़ी के पास चला गया और मेरे पैर पर जरा सी खरोच आ गई और भाई हम तो हम है सबको दिखा दिखा कर पागल कर दिया, आखिर में बाबा ने बोला ही
” कितना खून निकल गया है उतना तो महीने भर में भी नहीं बना होगा …”
कहने को तो ये सब उस समय की छोटी-छोटी बातें हैं लेकिन है यादों में है और अब ये ही अनमोल लगती हैं।
जैसे जब कोई सभ्यता लुप्त हो जाती है तब उसके टूटे हुए बर्तन भी धरोहर कहलाते है। ये मेरी धरोहर है शायद…एक दादी हुए करती थी हमारे गाँव में, पापा मौसी बोला करते थे उनको, अभी जो लोग गाँव के होंगे उनको पता भी होगा कि वहां कितने ही अदभुत और निराकार रिश्ते होते है जिनको जो भी आकार आप अपने अनुसार दे सकते है..

“उनको बड़ा अरमान था मुझे मेरी शादी में देखने का, उनके अनुसार मैं बड़ी सुंदर थी और अपनी शादी में बड़ी ही सुंदर लगने वाली थी दुल्हन के रूप में..”

अभी भी ये किस्सा ज़हन में ताजा सा रहता है क्योंकि एक तो उनकी सोच के विपरीत मैं अपनी शादी में सुंदर नहीं लगी बल्कि बैंगनी रंग की लग रही थी (मेरे पति के अनुसार)। दूसरा मुझे अपनी तारीफ़ और बुराई याद रह ही जाती है…मुझे पता है काफी लोगों के साथ ऐसा होता है।
पता नहीं क्यों एक बात मेरे साथ बहुत अजीब सी है, मैं अपने विशेष अवसरों पर कभी अपेक्षित रूप में सुंदर नहीं लगी हूं ये विडंबना अभी तक है मेरे साथ… लोगों की अपेक्षाओं पर खरा ना उतार पाने का हुनर शायद शुरू से ही था मुझ में। हा हा…
एक बात तो है, आप अपने आपको जितनी अहमियत देते हो लोग भी उतनी ही देते है, चाहे देर से ही क्यों ना दे..उसके लिए ज़रूरी है तो की आप अपने आप को महत्वपूर्ण समझना बंद ना करे । हर स्तर पर आप अपने आपको आकार ही दे रहे होते हैं…. पूर्ण होने जैसा कुछ होता ही नहीं है मेरे हिसाब से तो…

हर पल हर लम्हा कोई ना कोई किस्सा बन ही रहा होता है।

डॉली किट्टी और वो चमकते सितारे फिल्म समीक्षा Movie Review

  • निर्देशक – अलंकृता श्रीवास्तव
  • कलाकार – कोंकणा सेन शर्मा, भूमि पेडनेकर
  • अवधी – २ घंटे
  • प्रस्तुतकर्ता – नेटफ्लिक्स
  • ⭐⭐⭐
जब आपके दिमाग में बहुत सारे विचार हो और आप उन विचारों को एक-एक करके नहीं एक साथ ही शक्ल देने का प्रयास करते हैं तो जो अंत में जो परिणाम आता है, उसको हम डॉली किट्टी और वो चमकते सितारे भी कह सकते हैं। निर्देशक अलंकृता श्रीवास्तव ‘लिपस्टिक अंडर माय बुर्का’ के 3 साल बाद अपनी नई फिल्म के साथ फिर से महिला सशक्तिकरण के मुद्दे को उजागर कर रही हैं।
Why should boys have all the fun की तान पर बनी फ़िल्म, की हम औरतें क्या पीछे हैं। तो फ़िल्म की कहानी औरतों की अधूरी इच्छाओं की है लेकिन इसके लिए उनको कन्फ्यूज्ड दिखाना कहां तक सही है ??

कहानी कहने का जो तरीका है वह भी कंफ्यूज है और डॉली और किट्टी दोनों के किरदार भी उलझे हुए हैं। दोनों किरदार चचेरी बहनों के रिश्ते में है कोंकणा और भूमि बहनों के किरदार में काफी सहज व विश्वसनीय हैं लेकिन उनके किरदारों को पता ही नहीं है कि उन्हें जिंदगी से क्या चाहिए है।

डॉली अपनी शादी में संतुष्ट नहीं है, लेकिन खुश दिखने का ढोंग करती रहती है और डिलीवरी ब्वॉय उस्मान के रूप में आंतरिक खुशी ढूंढती रहती है और वहीं दूसरी तरफ किट्टी कम पढ़ी-लिखी है और गांव से शहर आकर एडल्ट कॉल सेंटर में काम करने लगती हैं, और अपने आप को शहर के परिवेश में ढालने का पुरजोर प्रयास करती है।
फिल्में में बहुत कुछ एक साथ दिखाने का प्रयास किया जा रहा है। जिसके चलते बहुत सारी चीजें अधूरी लगती हैं और जब फिल्म समाप्त होती है तो संतुष्टि का अहसास नहीं देती और ना ही आपको यह लगता है कि आप कुछ अर्थपूर्ण देख रहे थे।
फिल्म की शुरुआत अच्छी है लेकिन अंत सभी प्रश्नों का उत्तर सफलतापूर्वक नहीं दे पाता है फिल्म में काफी कलाकार है और सभी अभिनय के लिहाज से काफी अच्छे साबित हुए हैं लेकिन सभी किरदारों को उनकी पूरी जगह सही से नहीं मिल पाई है। उसमें अमीर बशीर, विक्रांत मेसी अमोल पाराशर, करण कुंद्रा और कुब्रा सैत जैसे नाम शामिल हैं।
फिल्म को बिना शक एक बार जरूर देखा जा सकता है तो जाकर देखें और अपने विचार व्यक्त कीजिए।

अभिमान नहीं स्वाभिमान

जहां दिल खुश ना हो वहां से चले जाना

अभिमान नहीं स्वाभिमान होता है।”

हमनें सबको कहते हुए सुना है अभिमान और स्वाभिमान में बड़ा बारीक सा फर्क है और सब उस फर्क को अपनी-अपनी परिभाषा में परिभाषित करते हैं।

स्वाभिमान:- मेरा सम्मान हो यह मेरी अपेक्षा नहीं है लेकिन कोई मेरा अपमान ना करें यह मैं जरूर सुनिश्चित करता हूं/ करती हूं।

अभिमान:- मैं स्वयं सक्षम हूं और यह मुकाम मैंने हासिल कियाा है तो मेरा सम्मान होना चाहिए यह मेरा हक है।

अभिमान और स्वाभिमान की जंग बहुत पुरानी है और निरंतर चलती रही है लेकिन जब औरतों के स्वाभिमान की बात आती है तो यह और भी पेचीदा और उलझन भरी हो जाती है, यह उलझन अनादि काल से है। यहां महाभारत को ही उदाहरण के तौर पर ले लीजिए कितने ही लोगों को यह कहते और समझाते हुए सुना है कि महाभारत का युद्ध द्रोपदी के प्रतिशोध की वजह से हुआ है, वह एक अभिमानी स्त्री थी, वह चाहती तो यह युद्ध टाल सकता था । लेकिन अगर आपको सच में अभिमान और स्वाभिमान के बीच का अंतर ज्ञात है तो आप यही कहेंगे की यह उसके स्वाभिमान की लड़ाई थी, उसनेे अपने अपमान हो चुपचाप सहन नहीं किया और होना भी यही चाहिए। जब स्त्रियों के स्वाभिमान की बात आती है तो बहुत सारी भ्रांतियां, रीति-रिवाज, प्रथाएं आकर खड़ी हो जाती हैं जैसे कि समाज के इस खोखले ढांचे को चलाने की सारी जिम्मेदारी तो केवल स्त्रियों ने ही अपने कंधों पर उठा रखी है। अभी फिलहाल में एक फिल्म आई है थप्पड़। बहुत लोगों ने देखी भी होगी, सभी की अपनी-अपनी प्रतिक्रिया भी है उस फिल्म पर जैसे कि नाम से ही ज्ञात हो जाता है, मुद्दा एक थप्पड़ का है जो पति ने अपनी पत्नी को मारा है।

  • ” बस एक थप्पड़ ही तो है ! क्याा करूं ? हो गया ना…”
  • ” रिश्ते बनाने में इतनी effort नहीं लगती जितनी निभाने में लगती हैं।”
  • “थोड़ी बहुत मार-पीट तो expression of love ही है ना सर… “
  • “उसनेेे मुझे मारा ; पहली बार, नहीं मार सकता बस इतनी सी बात है।”
  • ” Just a slap पर मार नहीं सकता…”

ये सभी डायलॉग अपने आप में पूरी कहानी बयान करते हैं। हां, एक थप्पड़ ही तो है लेकिन मार नहीं सकता… यह पंक्ति अपने आप में सक्षम है यह बताने के लिए कि किसी भी रिश्ते में हाथ उठाना और मारना न्याय संगत नहीं है और यदि कोई व्यक्ति ऐसा करता है तो वह सामने वाले का अपमान कर रहा है और यह उसके स्वाभिमान पर चोट है।

भारतीय समाज पितृसत्ता(patriarchy)व पित्रतंत्र पर कार्य करता है, जिसके चलते विवाह के बाद स्त्री पति के घर का हिस्सा होती है और उसका उपनाम अपने नाम के साथ लगाती है, यह अनादि काल से होता आ रहा है, जिसके चलते हमारी जड़ों में समा चुका है और इसी के साथ यह धारणा भी समा चुकी है कि पति या पिता ही घर का मुखिया होता है उसी के हिसाब से चीजें चलनी चाहिए या चलती है।

थप्पड़ फिल्म उसी पित्रतंत्र के ऊपर एक प्रश्न चिन्ह लगाती है, यह प्रश्नचिन्ह लगती है रिश्तो में पुरुष श्रेष्ठता की हकदारी पर, यह प्रश्नन उठाती हैं उस लिंग भेदभाव(gender discrimination) केे ऊपर जो बचपन से पालन-पोषण(upbringing) में है और यह सिर्फ पुरुषों द्वारा नहीं है ये औरतों के द्वारा भी है क्योंकि शुरू से देेेखा ही वही है। जैसे “थोड़ा बर्दाश्त करना सीखना चाहिए औरतों को…” क्यों भाई क्यों सीखना चाहिए और अगर सीखना ही चाहिए तो फिर स्त्री-पुरुष दोनों को सीखना चाहिए, कोई नियम है तो दोनों के लिए समान क्यों नहीं।
मुद्दा यह ही है कि कितनी ही चीजें होती हैं रोजमर्रा कि जिंदगी में जहां पर लोग बिना सोचे समझे स्त्रियों पर टिप्पणियां कर देते हैं और उनको एहसास भी नहीं होता कि वह अपने आपको श्रेष्ठता का अधिकार दे रहे हैं।

“यार ! जब गाड़ी चलानी नहीं आती तो लेकर निकलती क्यों हैं…”

यह सबसे ज्यादा प्रयोग में आने वाली पंक्ति है क्योंकि दिमाग में कहीं ना कहीं यह बैठा हुआ है ‘औरतें अच्छी गाड़ी नहीं चलाती है।’

कहा तो यह जाता है, स्त्री और पुरुष बराबर हैं, एक गाड़ी के दो पहिए हैं, एक के बिना दूसरे का निर्वाह नहीं है। यदि यह सब बातें सही है तो पुरुषों को स्त्रियों पर हावी होने का अधिकार कहां से मिलता है और कौन देता है ?? यहां सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यह हक या अधिकार स्त्रियां स्वयं ही जाने – अनजाने देती रहती हैं और उनको इसका एहसास तक नहीं होता यदि किसी को एहसास हो जाए तो यह कहा जाता है,

“यार वह तो जरा सी बात का बतंगड़ बना देती है, ऐसा तो घर संसार में लगा ही रहता है…”

नहीं ! ऐसे घर संसार नहीं चलते हैं और यदि कोई स्त्री अपने स्वाभिमान के लिए खड़ी होती है तो वह गलत या अभिमानी नहींं है।बस वह वो सब देख कर चुपचाप सहन नहीं करना चाहती, वह सबको दृढ़ता से बताना चाहती है कि यह गलत है और यदि सामने वाले को अपनी गलती का एहसास नहीं है तो यह एहसास दिलाना मेरी नैतिक जिम्मेदारी है क्योंकि वह उस श्रंखला को तोड़ना चाहती है जो पितृसत्ता केे चलते पुरुषों के अंदर जड़ कर चुकी है कि…

उनको हाथ उठाकर अपना आक्रोश दिखाने का, अपनी बात को बलपूर्वक मनवाने का, अपनी मनचाही मांगों को पूरा कराने का अधिकार है। ऐसा कोई अधिकार होता ही नहीं है और यदि आप इस तरह के किसी भी रिश्ते के अंदर है तो अपनी सोच को जागृत कीजिए क्योंकि आप कहीं ना कहीं उस श्रंखला को पानी दे रहे हैं, जो हमारे समाज को खोखला कर रही है। आप एक लड़की को, जो आपके घर में हैं, अपना स्वाभिमान दबाना सिखा रहे हैं। अनजाने में ही आप अपने घर के लड़के को यह बता रहे हैं कि… यह तो आम बात है लड़के या आदमी ऐसे ही व्यवहार करते हैं। यह आपके लिए और हमारे समाज के लिए अच्छा नहीं है। जहां आपकी और आपके रिश्तो की कदर ना हो वहां खड़े होने से अकेले खड़े रहना अच्छा है, यह अभिमान नहीं स्वाभिमान है…।

लम्हें :- ना उम्र की सीमा हो…

अब आप चाहें आदतों को दोष दो या भारतीय परंपराओं की दुहाई लेकिन जब प्यार की बात आती है तो लोगों ने हदें निर्धारित की हुई हैं। प्यार करो लेकिन उसके बारे में बात नहीं और जब उसमें उम्र का अंतर अधिक हो तो वह और भी अधिक चर्चा का विषय बन जाता है।

“प्यार जो उम्र की हदों को नजर-अंदाज करता हो”…

“प्यार जो हर परंपरा से आगे हो”…

इन वाक्यों को बोलतेे ही या पढ़तेे ही एक फिल्म जो जेहन में दस्तक देती है वह है लम्हें….
लम्हें, एक ऐसी कहानी है जहां दो लोगों का प्यार शर्तों से आजाद है। यहां बताया गया है कि प्यार का परंपरागत होना आवश्यक नहीं है।
लम्हें, वीरेन की कहानी है जिसे पल्लवी से प्यार है जोकि उससे उम्र में बड़ी है और वह वीरेन से प्यार भी नहीं करती है, जिस वजह से उसकी यह प्रेम कहानी पूरी नहीं हो पाती। फिर कहनी कुछ इस कदर मोड़ लेती है कि पल्लवी की बेटी पूजा को वीरेन से प्यार हो जाता है और कहानी थोड़ी उलझ जाती है और हमारी परंपरागत सोच को टक्कर देती है । वीरेन पूजा से उम्र में बड़ा है, पिता समान है तो ये प्यार सही नहीं है, संभव नहीं है। इसी तरह की अनगिनत बातें, जिन का सही मायनों में प्यार से लेना-देना भी नहीं है आ जाती हैं। लम्हें एक प्रगतिशील सोच को प्रदर्शित करती है परंतु उस समय इस फिल्म पर कई सवाल उठाए गए। उस समय के हिसाब से यह एक निषिद्ध विषय था।
क्या वाकई यह एक निषिद्ध विषय था ??
क्या यह असली जीवन में नहीं होता है ??
असली जीवन की बात करें तो दिलीप कुमार – सायरा बानो इस बात की पुष्टि करने का उत्तम उदाहरण है। उनका उम्र का अंतर २२ वर्षों का है, जब उनका विवाह हुआ तब दिलीप कुमार साहब ५५ वर्ष और सायरा बानो जी २२ वर्ष की थी और उनका यह विवाह सफल विवाहों में से एक है। इसी श्रंखलाा को आगेेे बढ़ाते हुए धर्मेंद्र जी-हेमा मालिनी जी जिनका उम्र का अंतर १३ वर्षों का है, इसी के साथ संजय दत्त-मान्यता दत्त जहां अंतर १९ वर्षों का है आते हैं और अभी एक नई जोड़ी जो दिमाग में आती है वह है मिलिंद सोमन-अंकिता की यहां यह अंतर २६ वर्षों का है।
यहां पर जगजीत सिंह जी के गाने कि चंंद पंक्तियां यहां काफी उपयुक्त हैं।
ना उम्र की सीमा हो
ना जन्म का हो बंधन
जब प्यार करे कोई
तो देखे केवल मन…..
तो देखे केवल मन… हमने हम-उम्र लोगों में प्यार होते हुए देखा है और उसको अपनाना भी हमारे लिए काफी सहज है लेकिन यहां सवाल यह है कि, क्या प्यार को उम्र का पता होता है। उसे यह एहसास भी होता है कि यह भी एक शर्त है, जो उसेे पूरी करनी पड़ेगी।
प्यार एक एहसास है, जो किसी को, कभी भी, किसी के लिए भी, कहीं भी महसूस हो सकता है। हमें इसको उम्र, जात-पात, रीति रिवाज और परंपराओं की बेड़ियों से दूर रखते हुए निष्काम और निष्छल ही रहने देना होगा जैसे कि किसी ने क्या सही कहा है…
पनाह मिल जाए रूह को जिसका हाथ छूकर,
उसी हथेली को घर बना लो…..

अभिमान

अभिमान उन कुछ फिल्मों में से एक है जो कभी भी देखी जा सकती हैं। यह ऋषिकेश मुखर्जी की प्रगतिशील सोच को प्रदर्शित करता है कि उन्होंने उस समय (1973) के हिसाब से एक उन्नतिशील फिल्म बनाई।
यह Patriarchy पर प्रशनचिन्ह लाती है।
यह प्रश्न चिन्ह लगती है पुरुषों की सत्ता पर, उनके श्रेष्ठता के अधिकार पर।
तो यह श्रेष्ठता का अधिकार कुछ लोगों को पहले ही खटकने लगा था और इस पर आवाज भी उठाई गई, जिसे आजकल हमारा समाज feminism का नाम देता है।
दरअसल यह आवाज उठाने लायक मुद्दा था भी और है भी।
इसकी वजह से ना जाने कितनी ही औरतों की प्रतिभा, उनकी योग्यता समाज के सामने नहीं आ पाई और सबसे ज्यादा अफसोस की बात यह है कि कितनी ही औरतों को यह ज्ञात भी नहीं हुआ कि उनमें कोई योग्यता भी थी।
अभिमान फिल्म में एक संवाद है.. जहां अमित जी किसी नामी गायक से यह जिक्र करतेे हैं कि ” मैं और मेरी पत्नी अब साथ में गाना गाया करेंगे।” यह सुनकर वह गायक अपने साथी से बोलता है “यह व्यक्ति इतना समझदार हो कर भी इतनी बड़ी गलती कैसे कर सकता है। इसकी पत्नी इससे ज्यादा प्रतिभाशाली है और इतिहास ने सिखाया है कि पुरूष नारी से श्रेष्ठ है। अब इसकी पत्नी, इससे आगे बढ़ जाएगी तो क्या यह बर्दाश्त कर पाायेगा ???”
इस पर साथी का उत्तर आता है कि “अरे! शादी हो गई है सारा संगीत रसोई घर में ही खत्म हो जाएगा।” और इस पर उस गायक का निराशा हो कर यह कहना कि “यह तो और भी बुरा होगा।”
यह पूरी बातचीत इशारा करती है कि जिस तरह से इतिहास में पुरुषों को श्रेष्ठा का अधिकार दिया है, वह चाह कर भी स्त्री को आगे निकलते हुए नहीं देख पाता है और यदि किसी भी कारणवश कोई भी प्रतिभा अपने सही मुकाम पर नहीं पहुंच पाती है तो यह उस समाज के लिए निसंदेह अच्छा नहीं है।
अभिमान एक आसान और सुलझे हुए तरीके से एक पेचीदा और जटिल समस्या को प्रस्तुत करती है वह हिम्मत दिखाती है उस सोच को 1973 में पर्दे पर उतारने की जिसका दंश 2020 में भी देखनेे को मिलता है। इस पीड़ा सेे हमारा समाज निरंतर लड़ता चला आ रहा है।
अभिमान फिल्म की कुछ मुख्य बातें जो प्रभावित करती हैं।
  • एक प्रगतिशील सोच को प्रदर्शित करती है।
  • जटिल मुद्दे को बड़ी ही बेबाकी से पर्दे पर उतारती है।
  • पुरुषों के श्रेष्ठता के अधिकार पर प्रश्नचिन्ह लगाती है।
  • स्त्री व पुरुष की समानता पर ध्यान केंद्रित करती है।
  • प्रतिभा को श्रेष्ठाता का अधिकार दिलाने का प्रयत्न करती है ना की किसी स्त्री और पुरुष को।
तो सही मायनों में feminism 1973 में भी Bollywood में दस्तक दे चुका था। 🙂🙂

ख़्वाब …

ख़्वाबों का भी कोई ख़ुद का वजूद होता है,
उनका भी क्या कोई अपना रूप होता है।

तेरी आंखों में सजे तो तुझ से लगते हैं,
मेरी आंखों में आकर मेरी शख्सियत से मिलते हैं।

हर शख्स का ख़्वाब एक नहीं होता,
हर वक्त वो पाक और नेक नहीं होता।

तेरे दम से वह दम भरता है, तू जब इठला कर इतरा कर पूरा जोर लगाता है तब वह भी तेरे साथ ही बल खाता है।
जब हार कर तू उसे झटक देता है, तो वह भी छटपटा कर कोने में सिसकियां भरता है।

मुश्किल ख्वाबों को बुनना नहीं सही ख्वाब चुनना होता है।ख़्वाबों का चुनाव अनिवार्य है, उनको स्वयं का आकार देना अपरिहार्य है।

मेरे ख़्वाबों में मेरी ही झलक होनी चाहिए।
तभी तो वह मेरे वजूद से मेल खाएगें और भविष्य के दर्पण में हम दोनों एक ही रूप में झिलमिलाएगें ।

बस शर्त ये है कि .. मेरे ख्वाब मेरे द्वारा ही चुने जाएंगे …

Shakuntala Devi : Amazing Woman !!!

शकुंतला देवी फ़िल्म समीक्षा (Movie Review)
3*/5*
” मैं बड़ी होकर एक बहुत बड़ी औरत बनूंगी ।”
कुछ लोगों का जन्म चर्चा में रहने के लिए ही होता है और वे जहां भी जाते है प्रसिद्धि उनके साथ साथ चलती है और वह सब उनकी प्रतिभा की वज़ह से। अब चाहे वो प्रतिभा कड़ी मेहनत कर के प्राप्त की गई हो या फिर भगवान कि देन यानी की God Gifted हो।
शकुंतला देवी भी उन्ही लोगों मेंं से एक थी और प्रतिभा की धनी भी। उनकी गणित के कठिन सवालोंं को पलक झपकते ही हल कर देने की प्रतिभा अतुलनीय थी और उनकी इस क्षमता का पता उनके पिता को बचपन में ही चल गया था, जिसे उन्होंने अभ्यास से निरंतर सुधारा। शकुंतला देवी का जन्म 4 नवंबर 1929 में बेंगलुरु में हुआ था। वे बचपन से ही बहुत निडर थी और अपनी बात को बिना किसी झिझक सबकेे सामने स्पष्ट रूप से रखती थी। उनकी कहानी और शख्सियत नारीवाद ( Feminism) शब्द का सही उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। वह एक  आत्मनिर्भर महिला थी जो किसी भी कार्य में अपने आप को किसी से भी पीछे नहीं समझती थी। 
फिल्म को शकुंतला देवी की बेटी अनुपमा बनर्जी के नजरिए से प्रस्तुत किया गया है जिसके चलते उनका विश्व प्रसिद्ध गणितज्ञ होने के साथ साथ उनके पारिवारिक रिश्तों को भी बखूबी प्रस्तुत किया गया है। फिल्म में 1950 और 1960 के दशक को प्रभावित ढंग से पर्दे पर उतारा गया है और शकुंतलाा देवी के गौरवपूर्ण क्षणों को भी पूर्ण ईमानदारी से दर्शाया गया है। फिल्म की नींव विद्या बालन की मजबूत और सुलझी हुई अभिनय क्षमता है, वह किसी भी किरदार में इतनी सरलता से समा जाती हैं कि आप उस किरदार में किसी भी अन्य कलाकार को रख ही नहीं सकते और यहां भी उन्होंने अपनी वही छाप बरकरार रखी है। उनके अलावा अमित साध का अभिनय भी काफी परिपक्व है और छोटा किरदार होने केे बावजूद अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है। जिशु सेनगुप्ता ने शकुंतला देवी केे पति का किरदार निभाया है और किरदार के साथ पूर्ण न्याय किया है। सान्या मल्होत्रा बेटी के किरदार में इतनी प्रभावी नहीं लगी है और थोड़ी over acting करती प्रतीत होती हैं। कहानी कहने का ढंग काफी असरदार नहीं है  और कमज़ोर कड़ी साबित होता है। इशिता मोइत्रा के हिंदी संंवाद भी उतने दमदार नहीं है किंतु इसको दक्षिण भारतीय झलक के चलते अनदेखा किया जा सकता है। कुल मिला कर निर्देशक अनु मेनन की फिल्म को एक बार अवश्य देखा जा सकता है और अपना नाम Guinness Book of Records में दर्ज कराने वाली महिला शकुंतला देवी जिनको Human Computer की उपाधि से सम्मानित किया गया था को करीब से जाना जा सकता है।
इसी के साथ फिल्म ये भी बताती है कि
” अपने सपनों को पहचान कर उन पर पूर्ण ईमानदारी से कार्य करना चाहिए। “

Mission Mangal – पूरी दुनिया से कहो Copy That !!!


मिशन मंगल फ़िल्म समीक्षा (Movie Review)
3.5 / 5
मिशन मंगल… निर्देेेशक जगन शक्ति अपनी प्रथम फ़िल्म के साथ थियेटर पर क़दम रख चुके हैं, और उनका ये क़दम मंगलकारी भी प्रतीत  होता नजर आ रहा है। जिस प्रकार भारत अपने मार्स प्रोजेक्ट में प्रथम प्रयास में ही सफल हुआ था, उसी तरह से जगन शक्ति भी अपनी पहली ही फ़िल्म से दर्शकों के दिलों पर छाप छोड़ने में सफल हुए हैं। उस पर 15 अगस्त का तड़का, जब देश-प्रेम के जज्बात पूरे चरम पर होते हैं।
फ़िल्म की कहानी को आर.बाल्की, निधि सिंह धर्मा और साकेत कोडिंपर्थी ने लिखा है। फ़िल्म इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन(इसरो) के मार्स ऑर्बिटर मिशन पर आधारित है।
यह मिशन सबसे सस्ते interplanetary missions में से एक है जो कि 4.5बिलियन की लागत में सम्पूर्ण हुआ था।
फ़िल्म की बात करे तो, फ़िल्म में सभी तत्वों का समावेश है। सच्ची घटना में बॉलीवुड का तड़का है लेकिन वह आप को मूल उद्देश्य से भटकता नहीं है बल्कि थोड़ा दिलचस्प ही बना देता है, आखिरकार आये तो फ़िल्म देखने ही है ना..😊।
फ़िल्म में अक्षय कुमार(साइंटिस्ट राकेश धवन) और विद्या बालन(प्रोजेक्ट डायरेक्ट तारा शिंदे) मुख्य भूमिका में हैै जोकि अपने एक मिशन के फेल होने पर दंड-स्वरूप मिशन मंगल पर लगा दिए जाते हैं। दोनों ही कलाकार अपने अपने किरदार मेंं बहुुुत सहज है और बड़े ही वास्तविक लगते हैं। इसी के साथ सोनाक्षी सिन्हा, तापसी पन्नू, कीर्ति कुल्हरी, शरमन जोशी, नित्या मेनन, संजय कपूर, जीशान आयूब..इन सभी का किरदार भी कहानी की मांग के अनुसार इस तरह से बिठाया गया है कि आप देखते देखते उन से खुद-ब-खुद जुडतेे चले जाते हैं। फ़िल्म का स्क्रीन प्ले, बैकग्राउंड स्कोर, डायरेक्शन सराहनीय है। वी एफ एक्स इफेक्टस फिल्म का कमजोर पक्ष है, जिसकी वजह से space केे दृश्य उतने वास्तविक नही लग पाते हैं, लेकिन emotion quiescent एकदम बराबर है।
फ़िल्म जो बताना चहाती है, जो दिखाना चहाती है, उसमें वो कहीं भी नहीं चूकती है। इस स्वंत्रता दिवस के अवसर पर मिशन मंगल के साथ फिर उस गौरवमय क्षण को महसूस किया जा सकता है, “जब हम विशव में मंगल पर पहुुँचने वाला प्रथम देेेश बने थे।”

GULLY BOY : Apna time aayega !!!


Gully Boy फ़िल्म समीक्षा (Movie Review)
4*/5*
Gully Boy, जोया अख्तर निर्देशित यह फ़िल्म यह बताती है कि सपनें पूरे करने केे लिए ही देखेें जाते हैैं, चाहें वो आपकी सच्चाई से मेल खाएं या नहीं। कहने का ताात्पर्य यह है कि अपने सपनों को पूरा करने की एक ईमानदार कोशिश तो करनी ही चाहिए फिर चाहे उनको पूरा करना नामुमकिन सा क्यों ना प्रतित हो। जोया अख्तर और रीमा कागती की लिखी यह फ़िल्म उन लोगों की तरफ इशारा करती है जो अपने सपनों को पूरा करने में पागलों की तरह लगें रहते हैं, जिनको कुछ भी थाली में सजा हुआ नहीं मिलता है, जिनको हर शख्स शक से देखता है, जिनमेें लोगों को कुुुछ अलग सा नजर नहीं आता है, जो शहर की भीड़ का हिस्सा होते हैैं। कैसें कोयले से हीरा बनता है, ये वो कहानी है।
फ़िल्म में काफी किरदार हैं लेकिन सभी अपने आप में इतने उम्दा हैं कि किसी एक कि तारीफ नहीं कर सकते वो आपस में इस कदर जुड़ें हैं कि वो एक-दूसरे को निखार कर पर्दे पर लाते हैं।
Gully Boy, मुराद (रणवीर सिंह) की कहानी है। जो एक डरा, सहमा, दबा- कुुुचला सा लड़का हैै, वो ऐसा क्यों है इसके लिये आपको उसके परिवार, वो जहाँ रहता है वहाँ का माहौल क्या है सब जानना पड़ेगा। मुराद के परिवार में उसके पिता (विजय राज), उसकी माँ (अमृता सुभाष), भाई, दादी और उसकी नई माँ है। नई माँ के आने से घर का परिवेश नकारात्मक हैं जो मुराद को सुकूून नहीं देता। दूसरी तरफ एक लड़की है सैफीना (अलिया भट्ट) जिससे मुराद बहुत प्यार करता हैै। सैफीना की अपनी एक जंग है, उसे Medical की पढ़ाई पूरी करनी हैं, घर की बंदिशों से आजाद होंना है और मुराद से शादी भी करनी है। फ़िल्म में हर किरदार की अपनी एक वज़ह है वैसा होनेे की, सबकी अपनी-अपनी एक जंग है। मुराद की जिंदगी में मोड़ रैपर एमसी शेर (सिद्धांत चतुर्वेदी) से मिलने के बाद आता है, उसे अपने सपनों को जीने की वजह मिलती हैं। जय ओझा की सिनेमेटोग्राफी ने धारावी की गलियों को जीवित कर दिया है, वे खुद ही अपनी कहानी कहती हुई प्रतित होती हैं। फ़िल्म का संगीत रैप संस्कृति के लिए उपहार स्वरूप है।
फ़िल्म कहीं- कहीं पर खिंची हुई लगती है किंतु वह कहानी की ही मांग है किरदारों का दर्द पर्दे पर लाने के लिये। कुल मिलाकर एक कड़क फ़िल्म, बेहतरीन अभिनय, बेमिसाल निर्देशन और खूबसूरत संगीत के साथ प्रस्तुत की गई हैं। जिसको देख कर दिल को सुकून महसूस कराया जा सकता है। 😊😊

Ek Ladki Ko Dekha To Aisa Laga…… Thoughtful !!!


‘एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा’ फ़िल्म समीक्षा (Movie Review)
3*/5*
यह फ़िल्म एक महत्वपूर्ण विषय(subject) की तरफ हमारा ध्यान केंद्रित करती है ‘समलैंगिक रिशते’। ऐसा नहीं है की इस विषय पर इससे पहले फिल्में नहीं बनी है, ‘अनफ्रीडम’ ‘फ़ायर’ ‘आई एम’ आदि फिल्में इस विषय पर बन चुकी है किंतु सितम्बर 2018 में कानून द्वारा ‘समलैंगिकता’ को अपराध की श्रेणी से हटाने के बाद आयी यह प्रथम फ़िल्म है।
निर्देशक शैली चोपड़ा धर की यह प्रथम फ़िल्म है, अपनी पहली ही फ़िल्म में इतने संवेदनशील विषय को चुनना काबिले तारीफ़ है किन्तु सिर्फ विषय चुनने के अंक नहीं मिलते है, कहने का अर्थ यह है कि फ़िल्म जिस मुद्दे को दिखाना चाहती थी वो पुख़्ता तौर पर उस पर नहीं बोलती है। कानून द्वारा मान्यता मिलने के बाद यह फिल्म ‘LGBT’ समुदाय केे लिए एक अहम फ़िल्म साबित हो सकती है क्योंकि समाज द्वारा ‘समलैंगिकता’ को स्वीकारा जाना अभी भी एक मुद्दा है। फ़िल्म इसी तरफ इशारा भी करती है “प्यार,प्यार होता है और वह किसी को भी किसी से भी हो इस से प्यार का अस्तित्व नहीं बदलता वो तब भी प्यार ही रहता है।” अब यह बात समझने में समाज कितना समय लेगा वो तो एक प्रशन ही है।
कहानी की बात करें तो यह एक आम पंजाबी परिवार है। जिसमें एक दिलचस्प पिता बलबीर चोधरी(अनिल कपूर) उनकी एक डरी सहमी सी बेेटी स्वीटी(सोनम कपूर) और अपनी बहन पर जान देंनेे वाला बेटा (अभिषेक दुहान) है जिसे अपनी बहन का औरों से अलग होना एक बीमारी लगता है और वह उसे निरन्तर समझाता रहता है। फ़िल्म के सहायक किरदारों में जूही चावला, मधुमालती, सीमा पाहवा, बृजेंद्र कला और रेजिना कैसेंडरा बहुत सहज है। अब बात करते है साहिल मिर्जा(राजकुमार राव) की वह इस कहानी के धागों को फिल्म के विषय से बांधने का काम करते है और एक अनोखे रूप में फ़िल्म पर छाए रहते हैं। कहानी को गजल धलीवाल और शैली चोपड़ा धर ने मिल कर लिखा जिसमें थोड़े पैनेपन की और व्यंग्य की कमी दिखाई देेती है। रोचक कोहली का संगीत फ़िल्म के साथ-साथ सुचारु रूप से(smoothly) चलता है। फिल्म एक प्रयास है कि कुुुछ चीजें जैसी है उसे वैसा ही स्वीकार करना चाहिए। कुुुछ लोग हम से उतने ही अलग हैं जितने कि हम उनसे लेेकिन यहां विडंबना यह है कि अलग होने के पैमाने भी समाज ने पहले से ही निधार्रित किये हुए हैं। सोचिएगा जरूर ……🤔🤔

Uri: The Surgical Strike !!!


उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक फ़िल्म समीक्षा ( Movie Review)
3.5*/ 5*
कुुछ प्रसंग ऐसे होते है जिनके बारे मेंं याद करके, सुुुन कर हमेशा गर्व का अनुभव होता है। उनमें से एक है सितंबर 2016 में हुई सर्जिकल स्ट्राइक, जिसको भारतीय जवानों ने उरी में हुए हमलें के जवाब स्वरूप किया था। निर्देशक ‘आदित्य धर’ की ये फ़िल्म उसी शौर्य की याद आप के जहन में ताजा कर देती है, की किस तरह हमारे जवानों ने पाकिस्तान में घुस कर आतंकवादियों को मारा था। फ़िल्म की पकड़ काफी मजबूत है, निर्देशक को पता है कि उनको फिल्म में क्या प्रस्तुत करना है और वह उसको बड़े ही कारगर तरीके से पर्दे पर उतारते भी हैं। फ़िल्म का लेेखन भी आदित्य धर ने ही किया है और किरदारों को संंवादों से ज्यादा कार्य में सशक्त दिखाया है। जिसका असर यह है कि किरदार कहीं भी फ़िल्मी या फर्जी नहीं लगते, ये ही फिल्म का मजबूत पक्ष है।
फिल्म की कहानी मेजर विहान शेरगिल (विकी कौशल) के आस-पास बुनी गयी है, जो आगे जाकर सर्जिकल स्ट्राइक की पूरी जिम्मेदारी निभातेे है। फिल्म का तकनीकी पक्ष बहुत बढ़िया है। मितेश मीरचंदानी की सिनेमाटोग्राफी काबिले तारीफ है, उन्होंने रात के दृश्यों में जान डाल दी है बहुत ही बेहतरीन तरीके से रोशनी का ताल-मेल बिठाया गया है, इसी के साथ शिवकुमार पैनिकर की एडिटिंग फ़िल्म की रफ़्तार को बखूबी बनााये रखती है। कुल मिला कर फ़िल्म के सभी पक्ष मजबूत हैंं। संगीत परिस्थितियों पर आधारित (Situational based) है। जिसको शाश्वत सचदेव ने दिया है। फ़िल्म देेशभक्ति से भरपूर है और मेरी तरह से 3 स्टार की हक़दार है किन्तु मैंने फ़िल्म को 3.5 स्टार दिए हैैं। .5 स्टार अतिरिक्त दिया है विकी कौशल के लिए, उनके दमदार अभिनय के लिए, उनकी गर्व से भरी आँखों केे लिए, उनके कुुछ कर गुजरने वाले जज़्बे के लिये। विकी कौशल कुछ समय में ही एक ऐसे अभिनेता के तौर पर निकल कर सामने आए है जिस पर कोई भी निर्देशक आँखे बंद करके दााँव लगा सकता है। फ़िल्म के अन्य कलाकारों का काम भी असरदार है, जिनमें परेश रावल, मोहित रैना, यामी गौतम आदि नाम शामिल हैं। अंत में अपनी बात को इस पंक्ति से विराम दूँगी कि इस शौर्य-गाथा का आंनद सिनेमााघरों में जाकर ही ले😊😊।

Kedarnath :- Namo Namo Ji Shankara !!!

केदारनाथ फ़िल्म समीक्षा (Kedarnath Movie Review)
3*/5*
निर्देशक अभिषेक कपूर की बहुचर्चित फ़िल्म केदारनाथ काफी जोखिमों के बाद आखिरकार सिनेमाघरों में आ ही गयी। केदारनाथ की कहानी अभिषेक कपूर और कनिका ढिल्लों के द्वारा लिखी गयी है। तो फ़िल्म शुुरू होती है नमो नमो के आध्यात्मिक गानेें और

केदारनाथ की खूबसूरत वादियों के साथ, इन दोनों का असर साथ में कुछ ऐसा है कि आप एक अदभुत रोमांच(goosebumps) का अनुुुभव करते है। लेकिन जैसे-जैसे फ़िल्म आगे बढ़ती है वो रोमांच थोड़ा-थोड़ा कम होने लगता है। केदारनाथ एक काल्पनिक प्रेम कहानी(fictional love story) हैै जिसको 2013 की उत्तराखंड की तबाही के साथ प्रस्तुत किया गया है। फ़िल्म को ना तो मैं बहुत उम्दा कह सकती हूँ ना ही बहुत साधारण लेकिन हाँ फ़िल्म में दिखाने जैसा काफ़ी कुछ था जिसकी वजह से फ़िल्म की कड़ियाँ अधूरी सी लगती हैं। केदारनाथ में सुशांत सिंह राजपूत एक मुस्लिम पिठू मंसूर बने है जो श्रद्धालुओं को अपने कंधों पर लाद कर केदारनाथ की 18km की यात्रा करता है और इसी फ़िल्म सेे डेब्यू कर रही सारा अली खान एक उच्चकोटि के ब्राह्मण की कन्या का किरदार निभा रही है। दोनोंं ही अपने किरदार में अचूक हैैं। सारा अली खान को डेब्यू के लिये इस से बेहतर फ़िल्म नहीं मिल सकती थी। वह एक दबंग लड़की दिखी है जो बहुत ही स्पष्ट हैै अपनी इच्छाओं को लेेकर। इसी के साथ उनको सुशांत सिंह राजपूत जैसे सक्षम अभिनेता का साथ मिला है।फ़िल्म के सहायक कलाकारों में नीतीश भारद्धाज, पूजा गोर, निशांत दहिया भी असरदार हैं। फिल्म की कमजोर कड़ी उसकी कहानी है जिसमें ईमानदारी की कमी साफ दिखाई देती है। तुषार कांति की सिनेमाटोग्राफी केदारनाथ को सुंदर बनाती है और पूरा असर भी छोड़ती हैं। फिल्म की जान उसका climax है जिसमें 2013 में आये उत्तराखंड के सैलाब को परदे पर उतारा गया है और वो आप को पर्दे(screen) से नजर नहीं हटाने देगा। किन्तु उस सैलाब के दर्द को दर्शकों को महसूस कराने में फ़िल्म फिर चूक जाती है। फ़िल्म काफी भावनााओं को छेड़ती जरूर है लेकिन पूरी तरह अनुभूत(feel) करानेे से पहले ही आगे बढ़ जाती है। अमित त्रिवेदी के संगीत की बात करें तो ‘नमो नमो’ जैसा प्रभाव किसी और गीत में नहीं है बस कहानी के साथ सही लगते हैं। तो सबकुछ मिलाकर एक अच्छी फ़िल्म निकल कर आयी है, जिसको जाकर निःसंदेह देखा जा सकता है।😊😊

2.0…. Ace Direction !!!

2.0 फ़िल्म समीक्षा (2.0 Movie Review )

3.5*/5*
निर्देशक शंकर की फ़िल्म 2.0 एक साइंस-फिक्शन है। 2010 में आयी रोबोट भी शंकर के द्वारा ही बनाई गयी थी और वह भी एक साइंस-फिक्शन ही थी। 2.0 को बहुत ही उम्दा तरीके से बनाया गया है। निर्देशक एक बात को लेकर काफी स्पष्ट (clear) थे कि उन को क्या दिखाना है। फ़िल्म का 3D बहुत ही बेहतरीन है। यहाँ मैं ये कह सकती हूँ कि अब तक की बनी भारतीय 3D फिल्मों में से यहाँ इस तकनीक का इस्तेमाल सबसे सर्वश्रेष्ठ तरीके से किया गया है। फ़िल्म के ग्राफिक्स कमाल के है। 2.0 में 300 तकनीशियनों ने काम किया हैै और वह फ़िल्म देख कर समझ आ जाता है। 2.0″ की अवधि 147 मिनट है लेकिन यह लंबी और बोर करती हुई नहीं लगती है। फिल्म देखते हुए कई बार एक हॉलीवुड फ़िल्म देेेखने का एहसास होता है वो इसलिए क्योंकि तकनीकी करामात उसी दर्जे की दिखाई गयी है। फ़िल्म में आपको VFX, स्पेशल इफ़ेक्ट एकदम उत्तम(perfect) मिलेंगे लेकिन अगर आप कहानी ढूढ़ने बैठोगे तो थोड़ी निराशा हाथ लगेगी, वहाँ फ़िल्म थोडी चूक जाती है। फ़िल्म यह दिखाने की कोशिश करती है कि Technology जिस तरह से हमारे लिये सबकुछ हो गई है वो कहीं न कहीं हमारे पर्यावरण के लिए सही नहीं है और यह बात हम जितना जल्दी समझ जायेंगे हमारे लिए अच्छा होगा।

अब ये फ़िल्म रजनीकांत की है और जिस फ़िल्म में वो होते है वहाँ कोई और कहाँ नजर आता है, ये तो हम रोबोट फ़िल्म मेंं भी देेेख चुके है और उनके अभिनय के बारे में कुछ बोलना मतलब सूरज को दीपक दिखाना वाली बात हो जायेगी 😊। अब बात करते है फ़िल्म के विलन अक्षय कुमार की, मुझे फ़िल्म में वो कहीं नजर नहीं आये, नजर आया तो एक सशक्त विलन जो पूरी ईमानदारी से हीरो को हर तरह से टक्कर देता हुआ दिखा और ये एक अभिनेता के रूप में अक्षय” की जीत है। फ़िल्म का बैकग्राउंड स्कोर अच्छा है जो ए.आर. रहमान द्वारा दिया गया है। इसी के साथ एमी जैक्सन भी नजर आती है और अपने रोल को अच्छे से अदा करती दिखी हैै। 2.0 एक मनोरंजक फ़िल्म हैै और आप बिना किसी शंका के देखने जा सकते है और आप बोर नहीं होंगे ये मुझे पूरा यकीन है😊।