किस्सा चाय का …

किस्सा चाय का…
जो लोग मुझे सही में जानते हैं,
वो चाय से मेरे रिश्ते को भी मानते है।
चाय.. चाय नहीं अहसास है,
आम हो कर भी बहुत ख़ास है।
मेरा प्यार भी इससे धीरे धीरे पनपा है..
हुआ कुछ यूं कि मेरी मम्मी के हिसाब से मेरा गोरा होना मेरे चाय पीने से ज्यादा जरूरी था और भाई हमारे जमाने में चाय पीने से काले हुआ करते थे 😉🤗
अब मम्मी का ख़ुद का चाय प्रेम इतना प्रगाढ़ है कि हर मर्ज का इलाज़ मानों उसी के पास है।
▪️थक गई हूं तो चाय
▪️मन सही नहीं है तो चाय
▪️कहीं से आते ही… कहीं जाने से पहले…
▪️गर्मी हो या सर्दी …
हर बात बस चाय का बहाना…
अब ये जज़्बा लाज़मी था मुझमें आना ।
मेरा जुड़ाव तो कुछ ऐसे शुरू हुआ

वो कहते है ना कुछ रिश्तों का नमक ही दूरी होता है

तो दूरी ही नज़दीकी का सबब हुई🤗

तो अब आप बताओ अपनी चाय का किस्सा…
कैसे बनी वो आपके जीवन का हिस्सा … 🙂

जिक्र किताबों का

कोई किताब पढ़ना कुछ ऐसा है जैसे कि किसी हज़ारों साल पहले रही सभ्यता से संवाद।

मानो मैं यहाँ किताबों के ढेर के बीच बैठ के समझ रही हूँ कि उस समय उस औरत ने अपने चूल्हे में कितनी ज़ोर से फूंक मारी होंगी कि वो सुलग पाया होगा।

या फिर किसी बकरी के मन में क्या चल रहा होगा ठीक देव-बलि दिए जाने से पहले।

या फिर कैसे कोई योद्धा अपने कमर के किस हिस्से में कितनी बड़ी तलवार को किस वार के लिए कस रहा होगा।

ये सब समझने के लिए और इन सब लोगों के साथ तालमेल बिठाने के लिए ये ज़रूरी है कि उन्हें समझा जाए, किताबों की मदद से।

तो आज किससे बात कर रहे हैं आप?

तो कहने का मतलब ये है कि मोबाइल से ध्यान हटाइए 
और इन किस्सों, कहानियों की दुनियां में गोते लगाइए….

दिल को सुकून देती है कागज़ो पर लिखी ये लाइनें ।
इनकी खुशबू से किरदार महका करतें हैं ।।