The Family Man Season 2

The Family Man Season 2 सीरीज समीक्षा

निर्देशक  –  राज निदिमोरू, कृष्णा डीके, सुपर्ण वर्मा।

कलाकार  –  मनोज बाजपेई, समांथा अक्कीनेनी, शारिब हाशमी, प्रियामणि, सीमा बिस्वास, दलिप ताहिल, विपिन शर्मा, श्री कृष्ण दयाल, सनी हिंदूजा, शरद केलकर और राजेश बालाचंद्रन आदि

प्रस्तुतकर्ता    Amazon prime video
⭐⭐⭐💫 3.5/5



The Family Man Season 2 जिसका इंतजार अब 20 महीनों बाद खत्म हो चुका है और जिस जगह पर सीजन 1 का अंत हुआ था वहां से सीजन 2 के लिए विकलता एक सामान्य सी बात थी। श्रीकांत तिवारी अब आगे क्या करने वाला है दिल्ली को गैस अटैक से बचाने के बाद यह जानने के लिए सब लोग बहुत उत्सुक थे तो फिर अपने सवालों पर विराम चिन्ह लगा लीजिए। और हां, इस सीजन में आपको तेलुगू सुपरस्टार समांथा अक्कीनेनी भी नजर आएंगी जो अपना हिंदी डेब्यु इसी के साथ कर रही हैं।

कहानी की बात करें तो इस बार कहानी में बहुत सारे घुमाव नहीं हैं। सीरीज आपसे क्या कहना चाहती हैं इसका अंदाजा आपको शुरू की 3 कड़ियों के अंदर ही लग जाएगा। उसके उपरांत की कड़ियों (6) में किस तरह योजना को अंजाम तक पहुंचाया जाए, यह दिखाया गया है।


पिछली बार की तरह इस बार भी मनोज बाजपेई, फैमिली मैन की जान है और वह अपने उत्तरदायित्व को निभाना बखूबी जानते हैं और इसीलिए शायद हमेशा ख़रे भी उतरते हैं। उनका हास्य-विनोद और अनूठा अंदाज श्रीकांत के किरदार में जान डाल देता है और जेके(शारिब हाशमी) के साथ उनका तालमेल पिछली बार की तरह ही सीजन का स्तर बढ़ाते हैं। इनकी केमिस्ट्री बहुत स्वभाविक और वास्तविक लगती है। इस बार कहानी के तार श्रीलंका से भी जोड़े गए हैं, जिसके चलते तेलुगू सुपरस्टार समांथा अक्कीनेनी का अभिनय भी आपको देखने को मिलेगा जो कि काफी सटीक और सशक्त है और कहानी की मांग के अनुसार भी है। इस बार श्रीकांत के निजी जीवन पर काफी ध्यान केंद्रित किया गया है और उनका भरसक प्रयत्न भी दिखाया गया है अपनी निजी जिंदगी को सही सांचे में लाने का लेकिन हिंदुस्तानी पति कितना भी कुछ कर ले,कहीं ना कहीं तो चूक ही जाता है 🙂।


निर्देशन पिछली बार की तरह ही अच्छा है और प्रभावित भी करता है किंतु पटकथा में पिछली बार वाली सनसनी नहीं दिखती है। “अब क्या होगा… अब क्या होगा” वाली उत्सुकता का अभाव है जो कहीं ना कहीं खटकता है। कहने का तात्पर्य यह है कि आप अंदाजा लगा सकते हैं कि आगे क्या और कैसे होने वाला है। शुरुआत में सीरीज की रफ्तार भी धीमी है जो अंत आते आते अपनी गति ले लेती है।

एक बात जो आजकल आने वाली ज्यादातर सीरीज में देखने योग्य मिल रहा है, वह है उपयुक्त पात्र-निर्धारण( casting) और कलाकारों का अभिनय। जिसने OTT पर आने वाली सभी सीरीज का स्तर काफी ऊपर उठा दिया है। यहां भी इस कार्य को बखूबी अंजाम दिया गया है और सभी कलाकारों ने अपना कार्य पूर्ण लगन से किया है।
कुल मिलाकर एक देखने योग्य The Family Man Season 2 आपके सामने प्रस्तुत किया गया है, तो बिना किसी देर के आप अपना Weekend इस के साथ गुजार सकते हैं। वैसे मुझे पता है आप ये ही कर रहे होंगे 🙂।

Trivia (something interesting)

– लॉकडाउन के चलते सिर्फ २ दिन की shooting के लिए 9 महीने का इंतजार बढ़ गया ।
– सुपर्ण वर्मा का भी निर्देशन शामिल।

Maharani : साहेब की सरकार बीवी के हाथ में !!!

महारानी सीरीज समीक्षा

निर्देशक  –  करण शर्मा
कलाकार  –  हुमा कुरैशी, सोहम शाह, अमित सियाल, प्रमोद पाठक, अतुल तिवारी और कनी कुश्रुति …
प्रस्तुतकर्ता    SonyLIV
⭐⭐⭐⭐


” कोयले की दलाली में हाथ काले “

अब आप कोयले के व्यापार में हों और आपके हाथ काले ना हों यह तो नामुमकिन सी बात है। अब राजनीति भी कोयले की दलाली स्वरूप कार्य ही है अगर आप उस में उतरे हैं तो जितनी बड़ी आपकी महत्वाकांक्षा होगी उतने ही अधिक अपयश के छींटे आपके दामन पर आएंगे।

बीते शुक्रवार (28 मई) को सोनी लिव पर एक नया सियासी ड्रामा आया है महारानी ,यह उसी की प्रस्तावना थी।

महारानी कहानी है, बिहार की राजनीति की।बिहार की राजनीति और वह भी 90 के दशक की। जी हां, आप जो सोच रहे हैं कहानी वहीं से प्रेरित है किंतु कहानी उनकी नहीं है। बिहार की राजनीति में सबसे बड़ा बदलाव 90 के दशक में ही आया था। महारानी उसी बदलाव को और जातीय समीकरण की राजनीति को अपने ढंग में प्रस्तुत करती है।

राजनीति अपने आप में एक उलझा हुआ और दांवपेच से भरा हुआ विषय है और इससे जुड़ी हुई कोई भी सीरीज या फिल्म यदि सही ढंग से और पूर्ण सतर्कता से बनाई गई हो तो वह अपने आप ही दिलचस्प हो जाती है।

महारानी की कहानी की बात करें तो जैसे इसके नाम से ही प्रतीत हो जाता है कि नारी चरित्र को केंद्र में रखा गया है। कहानी केंद्रित तो रानी भारती के ऊपर ही है किंतु बाकी राजनीतिक पक्षों और किरदारों का समीकरण भी काफी घुमावदार और देखने योग्य है।बिहार के मुख्यमंत्री भीमा भारती के ऊपर जानलेवा हमला होता है जिसके चलते वह अपनी सत्ता को बचाने के लिए अपनी चौथी पास पत्नी को मुख्यमंत्री बना देते हैं, यह सोच कर कि वह कागजी मुख्यमंत्री बनीं रहेंगी और बाकी राजनीति हम चलाएंगे किंतु परेशानी तब होती है जब यह गूंगी गुड़िया बोलने और अपने फैसले लेने लग जाती है। वहीं दूसरी तरफ विपक्ष के नेता नवीन कुमार, जो कि भूतपूर्व मुख्यमंत्री के पुराने मित्र हैं और उनकी पार्टी के युवा नेता भी रह चुके हैं,  इस नई साहिब – बीवी सरकार को गिराने की पूरी कोशिश में हैं और हर यथासंभव प्रयास भी कर रहे हैं। 90 के दशक की बिहार की राजनीति की मुख्य घटनाओं को भी दर्शाया गया है ,जिसमें चारा घोटाला और लक्ष्मणपुर व बाथे नरसंहार शामिल है।

महारानी में देखने योग्य क्या है ??

  • निर्देशन काफी उम्दा है और प्रस्तुत करने का ढंग भी रुचिकर है।
  • कहानी को यथार्थवादी रखा गया है और प्रस्तुतीकरण भी वैसा ही है।
  • किरदारों का चयन काफी सटीक और न्याय पूर्ण है।
  • सभी किरदारों को मात्रा अनुसार प्रयोग किया गया है जोकि प्रशंसनीय है।
  • सभी कलाकारों का अभिनय सीरीज की सबसे मजबूत कड़ी है।

महारानी में जो सबसे ज्यादा खटकता है, वह है इसकी अवधि जो कुल मिलाकर 450 मिनट बनती है। जो 10 कड़ियों में विभाजित है, इसकी वजह से सीरीज काफी धीरे धीरे चलती हुई प्रतीत होती है। संभवत: 2 कड़ियां तो आराम से कम हो सकती थी।

अभिनय की बात करें तो सभी कलाकारों ने अपना कार्य बहुत ही बारीकी और ईमानदारी से किया है और सभी प्रशंसा के पात्र भी हैं किंतु फिर भी यह 4 नाम मेरे अनुसार अधिक प्रशंसा के योग्य हैं।

हुमा कुरैशी,सोहम शाह,अमित सियाल,कनी कुश्रुति

यदि आप लोगों की रुचि राजनीति में है और आप उसके दांवपेच को समझना और देखना पसंद करते हैं तो यह सीरीज आप ही के लिए है। यह आपके दिमाग को थोड़े समय के लिए काम पर लगा सकती है और आप इसको देखना काफी पसंद भी करेंगें।

तो फिर देखिए और आपको यह सीरीज कैसी लगी वह कमेंट बॉक्स में बताइए 😊😊।

कभी कभी…

कभी-कभी लगता है मन शांत नहीं है,
शायद होने की कोई बात ही नहीं है ।

कभी-कभी लगता है सबकुछ बुझा-बुझा सा है,
शायद कुछ अच्छा इसे सुझा ही नहीं है ।

कभी-कभी लगता है सब उजड़ सा गया है,
शायद मरम्मत का समय आया ही नहीं है ।

कभी-कभी लगता है सब रुका-रुका सा है,
शायद थकान अभी उतरी ही नहीं है ।

कभी-कभी लगता है सब पर चढ़ा कोई कर्ज सा है,
शायद किस्तें सही से चुकाई ही नहीं हैं ।

कभी-कभी लगता है जीने का कोई मतलब सा नहीं है,
शायद कभी सही से मतलब समझा ही नहीं है ।

कभी-कभी लगता है हर रिश्ता कितना ख़ास है,
शायद कभी इतने गौर से देखा ही नहीं है ।

कभी-कभी लगता है हर सांस कितनी कीमती है,
शायद कभी सही क़ीमत लगाई ही नहीं है ।

कभी-कभी लगता है सुकून कितना सस्ता है,
मिले तो चार दिवारी में वरना पूरी दुनियाँ में सुनवाई ही नहीं है ।

#pcscrawls

Saina… ( Saina Nehwal)

निर्देशक – अमोल गुप्ते

लेखक अमोल गुप्ते, अमितोश नागपाल 

अवधि-  2 घंटा  15 मिनट

OTT Amazon Prime
⭐⭐⭐ 3/5

“मांगने वाली चीज नहीं

ये मौका उसका जिसने छीना…”

जिंदगी की सबसे बड़ी विशेषता और विडंबना यह है कि वह परियों की कहानी की तरह नहीं होती है। यहां सब कुछ पाने के लिए आपका हुनर और कड़ी मेहनत ही आपका सबसे बड़ा शस्त्र होता है।निर्देशक अमोल गुप्ते की फिल्म साइना जो विश्व की नंबर वन बैडमिंटन खिलाड़ी रह चुकी साइना नेहवाल की बायोपिक है। विश्व में नंबर एक का खिताब हासिल करना कोई आसान कार्य नहीं होता है और यह कितना मेहनत से भरा होता है, वह यह फिल्म हमें बताने की कोशिश करती है। जिंदगी में एक ऐसा मुकाम पाना जहां पर खड़े होकर आप कितनों की प्रेरणा का सबब बन सकते हैं, वहां तक जाने की डगर पर काफी कुछ निर्भर करता है। फिल्म साइना बहुत सी बातों की महत्वता को दर्शाती है, जिसमें से मुख्य हैं…

  • आशावादी माता पिता !
  • सही दिशा और फोकस की आवश्यकता !
  • दिशा निर्धारकों व गुरुओं का योगदान !
  • सही दिशा में सही कदम !
  • लक्ष्य प्राप्ति के लिए मेहनत का साथ !

यदि आपकी जिंदगी में प्रेरणा की कमी महसूस हो रही है तो आप को यह फिल्म जरूर देखनी चाहिए क्योंकि यह आपको थोड़ा उछाल तो अवश्य ही दे सकती है। कुछ Dialogue जो सच में प्रेरणादायक है…

  • मेरा ध्येय एकदम सरल… सामने वाले को मात देना ।
  • रास्ते पर चलना एक बात है साइना… और रास्ते बनाना दूसरी बात है… तू ना बेटा वो दूसरी बात करने की सोच ।
  • Game जीतने के लिए तुम क्या करते हो वो important नहीं है… important है कि game जीतने के लिए तुम क्या छोड़ते हो ।
  • मुझे वो champion नहीं चाहिए जो मन में जीत के बारे में सोचते हैं… मुझे वो champion चाहिए जो जीत के अलावा और कुछ नहीं सोचता है।

फिल्म बहुत ही सरलता से अपनी बात को कहती है, जो कि फिल्म की खास और आम दोनों ही बात है। जो आसान लगे वह लोगों को मामूली भी लग सकता है, तो यहां भी यही मतभेद है किंतु जिंदगी तो सहज और सरल की होती है। वो तो आपके कार्य होते हैं जो उसको फिल्म बनाने योग्य और लोगों को प्रेरणा देने लायक बनाते हैं। तो निर्देशक अमोल गुप्ते ने उस सहजता को बरकरार रखते हुए साइना नेहवाल के उन कार्य को दिखाने का प्रयत्न किया है जो उनको नंबर 1 के शिखर तक लेकर गए थे। किसी भी खिलाड़ी केेे जीवन पर फिल्म बनानाा कोई आसान कार्य नहीं है क्योंकि उसके लिए कलाकारों का सही चुनाव सबसे दुर्लभ और अहम कड़ी बन जाती हैै । यहां हम अभिनय की बात करें तो नयशा कौर भटोये, परिणीति चोपड़ा, मेघना मलिक और मानव कौल काफी प्रशंसनीय है।

कुछ लोगों के जीवन के बारे में जानना बहुत महत्वपूर्ण और सुखद होता है कहने का तात्पर्य है कि आपको यह फिल्म एक बार अवश्य ही देखनी चाहिए और अपनी प्रतिक्रिया को भी मुझ तक जरूर पहुंचाएं 😊।

Ajeeb Daastaans : Thought-Provoking Cinema

निर्देशक – शशांक खेतान, राज मेहता, नीरज घेवान, कायोज ईरानी
अवधि- 2 घंटा 22 मिनट
प्रस्तुतकर्ता- Netflix
⭐⭐⭐⭐ 4/5
अजीब दास्तान्‌स एक एंथोलाजी यानी एक संकलन है। 4 कहानियों का संकलन, जिनमें समानता उनकेेे किरदारों की सोच हैै, जो बाहर से कुछ और तथा अंदर से कुछ अलग ही भावों को अपने अंदर समेटे हुए हैं। कहनेे का तात्पर्य है कि अंदर का शख्स बाहर वाले शख्स से मेल ही नहीं खाता हैै और वही इन सब कहानियों का असली चेहरा भी है।
इन कहानियों में आपको लाचारी, बेचारगी, बर्बरता, दृढ़ता, द्वेष, ईष्या, पूर्व-निर्माण, जहरीलापन, सभी तरह के भावों का समावेश मिलेगा।
अजीब दास्तान्‌स आपको परिपक्व सिनेमा की तरफ ले जाएगा और आपके मस्तिष्क में ऐसे सवाल छोड़कर जाएगा जिनका उत्तर ढूंढते हुए आपको भी अपने अंदर के छुपे हुए भावों की झलक देखने को मिल सकती है।

विचारोत्तेजक सिनेमा (Thought-provoking Cinema)।

अजीब दास्तान्‌स चार कहानियों का समूह है
मजनू :

जिसमेंं प्रथम शशांक खेतान द्वारा निर्देशित है और फातिमा सना शेख, जयदीप अहलावत और अरमान रहलान मुख्य कलाकारों की भूमिका में हैं। यह कहानी एक अधूरी शादी की दास्तान को बयां करती है। जहां पति पत्नी सिर्फ नाम के रिश्ते में हैै, समाज में अपने आधिपत्य को सुनिश्चित करने के लिए। फिर यहां “वो” का प्रवेश होता है और कहानी अलग मोड़ लेती है। मजनू में सब कुछ अच्छा है। किरदार काफी मजबूत हैं किंतु जो थोड़ा नहीं जमा है, वह है कहानी में नयेेपन की कमी। सब कुछ देखा और सुना हुआ सा प्रतीत होता है।

खिलौना :

दूसरी कहानी है खिलौना, जिसका निर्देशन राज मेहता ने किया है, यहां नुसरत भरुचा और अभिषेक बैनर्जी मुख्य कलाकारों की भूमिका में हैं। यह समाज के दो वर्गों को प्रस्तुत करती है, कोठीवाले और कटियावाले। कटियावालों का मानना है कि “कोठीवाले किसी केेे भी सगे नहीं होते” और यही इस कहानी का दर्द भी हैै। सभी किरदारों ने बहुुत ही सहज अभिनय किया है इस कहानी का अंत आपको हिला कर रख देगा। कहानी आपको पूरी तरह से बांध कर रखती है और बोर नहीं होने देती हैै। यहां जो थोड़ा खटकता है वह कहानी का अंत है, जो बहुत ही डरावना है किंतु कहानी इस अंत के साथ पूर्ण न्याय नहींं करती या कह सकतेेे हैं की इतनी घृणा का सबब पूर्ण रूप सेे निकल कर नहीं आता है।

गीली पुच्ची :

तीसरी और कई विषयों को सामने लाती हुई कहानी है गीली पुच्ची, जिसका निर्देशन नीरव घेवान द्वारा किया गया है और मुख्य किरदारों में कोंकणा सेन शर्माअदिति राव हैदरी हैं। यह कहानी दो विषयों को छूती है,- “वर्ण व्यवस्था” और “समलैंगिकता”। कहानी को सटीक ढंग से लिखा और प्रस्तुत किया गया है। किरदारों केेे बीच की कड़वाहट और खिंचापन साफ पता चलता है। दोनों अभिनेत्रियों नेे बहुत ही उम्दा और सहज अभिनय का प्रदर्शन कियाा है जो इस कहानी का सबसे मजबूत पक्ष है।

अनकही :

चौथी और आखिरी कहानी है निर्देशक कायोज़ ईरानी की, जो बहुुुुत ही गहरी और प्यारी है जिसके मुख्य कलाकार हैं शेफाली शाह, तोता राय चौधरी और मानव कौल। यह कहानी बोलती बहुत कम है लेकिन समझा सब कुछ जाती है और रिश्तो के उतार-चढ़ाव को भी बड़ी सहजता से समझा जाती है। सभी कहानियों में यह सबसे अधिक सशक्त और छाप छोड़ने वाली है। इसी के साथ शेफाली शाहमानव कौल इतने सटीक और निश्छल हैं कि आप अपनी नजर उन से हटा ही नहीं पाएंगे।

यदि आप चारों कहानियों की तुलना करते हैं तो प्रथम कहानी प्रभावित करने से थोड़ा सा चूक जाती है, बाकी सब अपने-अपने संदेश को आप तक पूरी तरह से पहुंचाती है। सभी किरदार अपने अपने चयन में पूर्ण रूप से न्याय संगत है और आपको मनोरंजन के साथ साथ सोचने पर विवश करते हैं, जो कि इस फिल्म का भी उद्देश्य है। एक बेहतरीन फिल्म काफी समय के बाद आपके समक्ष है और आप देखने से कृपया ना चूके।

फिल्म का मजबूत पक्ष, निर्देशन और किरदारों का चयन है।

SILENCE…can you hear it?

लेखक, निर्देशक – अबन भरुचा देवहंस
कलाकार- मनोज बाजपेयी, प्राची देसाई, अर्जुन माथुर
अवधि- 2 घंटा 16 मिनट
प्रस्तुतकर्ता- ZEE 5
⭐⭐⭐🌠 3.5/5
“बुलबुल को सैयाद का इंतजार है”

चलो केस सॉल्व करते हैं …

अबन भरुचा देवहंस जिनको हम एक अभिनेत्री के रूप में उनके अभिनय के लिए जानते हैं, वह निर्देशक केेे तौर पर अपनी दूसरी फिल्म
Silence… can you you hear it के साथ एक बार फिर हमारे दिमाग को काम पर लगाने के लिए तैयार है। यह एक मर्डर मिस्ट्री हैै, जिसको आप zee5 पर देख सकते हैं। फिल्म के मुख्य कलाकार, हम सबके चहेते मनोज वाजपेयी जी हैं और उन्हीं के कंधों पर है इस फिल्म की सारी जिम्मेदारी। जैसा कि हम जानते हैं कि एक खाकी वर्दी के अंदर उनका रुतबा देखते ही बनता है और एक पुलिस वाले के तौर पर उनके तेवर हमेशा काबिले तारीफ होते हैं। यहां भी उन्होंने अपने उसी उम्दा अभिनय का प्रदर्शन किया है और फिल्म के साथ पूर्ण न्याय भी किया है।
फिल्म की कहानी की बात करें तो वह काफी सरल सी है लेकिन उसको प्रस्तुत करने का ढंग उसको आकर्षक बनाता है और दर्शकों पर अपनी पकड़ बनाए रखता है कहने का तात्पर्य यह है कि फिल्म आपको बोर नहीं होने देगी और आप भी एसीपी अविनाश के साथ केस को सुलझाने में व्यस्त हो जाएंगे। आजकल जिस तरह से थ्रिलर फिल्मों की बाढ़ आई हुई है जिसके चलते हम सभी केस को सुलझाने में और कातिल तक पहुंचने में महारथ हासिल कर चुके हैं, तो वहां पर यह काफी हद तक महत्वपूर्ण हो जाता है कि आपको कोई ऐसी फिल्म ला कर दे जो निष्कर्ष तक आपको आसानी से ना पहुंचने दे और अपने में थोड़ा उलझा कर रखें। इस फिल्म में भी निर्देशन और अभिनय जिस प्रकार का है वह कहानी के सरल होने के बावजूद भी आपको कातिल तक इतनी आसानी से नहीं पहुंचने देता है।
फिल्म में एक चीज जो खटकती है वह है, पुलिस अपना कार्य पुलिसनुमा तरीके से नहीं करके केस को बातों के जरिए सुलझाती हुई नजर आती है जोकि अटपटा और थोड़ा अधकचरा लगता है। जहाँ ऐसी ऐसी फिल्में और सीरीज आपके सामने प्रस्तुत की जाती हैं जहां आपको पुलिस की कार्यप्रणाली का पूर्ण बारीकी से ज्ञान दिया जाता है, वहाँ पुलिस को बातों से केस को सुलझाने हुए देखना होमवर्क की कमी को उजागर करता है। फिल्म का सारा का सारा दारोमदार मनोज बाजपेयी पर है, जिसके चलते किसी भी और किरदार को उतनी अच्छी तरीके से उभरा नहीं गया दूसरी तरफ प्राची देसाई इस तरह के किरदार में उतनी प्रभावी नहीं लगती है कहने का तात्पर्य है कि पुलिस वालों की कठोरता उनके चेहरे पर नजर नहीं आती है जो थोड़ा अस्वभाविक सा लगता हैै।
एक और चीज जिसका OTT पर फिल्मों को प्रसारित करने वाले सभी निर्देशकों को ध्यान देना चाहिए वह है, फिल्म की अवधि। OTT के लिए फिल्मों की अवधि का कम होना देखने वालों के लिए फिल्म को दिलचस्प रखता है। Silence… can you hear it ? भी अगर थोड़ी और छोटी होती तो ज्यादा असरदार रहती। कुल मिलाकर फिल्म को देखा जा सकता है और देखना भी चाहिए उसकी मुख्य और अहम वजह हैं, मनोज बाजपेयी जी (जिया हो बिहार के लाला)…

Bombay Begums Review

बॉम्बे बेगमस सीरीज समीक्षा

लेखक,निर्देशक – अलंकृता श्रीवास्तव, बोरनीला चटर्जी

कलाकार – पूजा भट्ट, शहाना गोस्वामी, अमृता सुभाष, प्लबिता बोरठाकूर, आध्या आनंद, दानिश हुसैन, राहुल बोस, मनीष चौधरी

प्रस्तुतकर्ता Netflix

⭐⭐⭐

Survival is the battle for every woman…
अस्तित्व, हर महिला की लड़ाई है...

अंतरष्ट्रीय महिला दिवस(8 मार्च) पर आयी Netflix की नई प्रस्तुति बॉम्बे बेगम्स भी 5 महिलाओं की अस्तित्व की लड़ाई को हमारे सामने प्रस्तुत करता है। हमेशा वही सही नहीं होता जो सीधे तौर पर आपको दिखता या दिखाया जाता है। हर व्यक्ति कई तरह की परतों से मिलकर बना होता है और किस परत को अंतिम रूप में दुनिया के सामने प्रस्तुत करना है या किस परत को अपना चरित्र बना कर समाज को दिखाना है, यह सब वह स्वयं निर्धारित करता है। बॉम्बे बेगमस लोगों की उन्हीं परतों को उतारकर बड़ी ही पारदर्शिता के साथ परदे पर प्रस्तुत करता है, खासकर महिलाओं की परतों को, उनके संघर्षों को, अपने आप को एक मुकाम दिलाने के जुनून को और उनकी विचित्र सोच को।

सब एक दौड़ का हिस्सा हैं, सबको कहीं न कहीं पहुंचना है किन्तु किसी के लिए रास्ता महत्वपूर्ण है तो किसी के लिए मंज़िल। इसी के चलते सब एक उलझन में रहते हैं कि क्या सही है, क्या नहीं…
बॉम्बे बेगमस की ये 5 महिलाएं भी कुछ इसी उलझन का सामना करती हैं और अपने हिस्से के आसमा की तलाश में जिंदगी उलझाती और सुलझाती सी नजर आती हैं।
बॉम्बे बेगमस की कहानी 5 किरदारों को हमारे सामने प्रस्तुत करती है, जिनमें से प्रथम है रानी सिंह ईरानी जो रॉयल बैंक ऑफ बॉम्बे की ceo हाल ही में नियुक्त की गई है। उनको यहां तक पहुंचने के लिए किन – किन संघर्षों का सामना करना पड़ा है, वह एक दिलचस्प पहलू है बॉम्बे बेगमस का और अब इस मुकाम पर बने रहने का भी उनका अपना ही दांवपेच है। पूजा भट्ट ने रानी के किरदार में जान डाल दी है और यह सीरीज इसी किरदार की मजबूती पर खड़ी प्रतीत होती है। बड़ा ही सुलझा हुआ और परिपक्वता से भरा हुआ अभिनय का प्रदर्शन आपको पूजा भट्ट के द्वारा इस किरदार में मिलेगा। इसके बाद आती हैं
फातिमा वारसी (शहाना गोस्वामी) जिनको रानी ने अभी हाल ही में प्रमोशन दिया है, जिसके चलते वह हेड ऑफ प्राइवेट इक्विटी एंड वेंचर की डिप्टी मैनेजिंग डायरेक्टर बन गई है। उसकी जिंदगी की अपनी जंग है। जहां इतना बड़ा पद मिलना एक सपने का सच होना जैसा है, वही दूसरी तरफ व्यक्तिगत जिंदगी पूरी तरह उलझी हुई है। इसी ही बैंक की एक नई सदस्य है आयशा अग्रवाल (प्लबिता बोरठाकूर) जो इंदौर से मुंबई पहुंची है, अपने सपनों को अलग मुकाम देने के लिए लेकिन अपने ही आप में उलझी सी हैं। कुछ चाहती हैं और कुछ करती है, यही उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी विडंबना है यह तीनों किरदार कॉरपोरेट जगत में अपने आप को स्थापित करने के लिए पुरजोर कोशिश लगाते नजर आते हैं। इनसे हटकर जो किरदार है वह है लिली (अमृता सुभाष) का जो जिस्मफरोशी के धंधे में है लेकिन अपने बच्चे को इज्जत की जिंदगी देना चाहती है और उसी के चलते उसकी जिंदगी बाकी तीनों किरदारों से जुड़ती है।
बॉम्बे बेगमस का पांचवा किरदार है रानी की सौतेली बेटी शाय (आध्या आनंद) का जो महज 13 वर्ष की है लेकिन अपनी उम्र से काफी बड़ी है और समझती भी खुद को बड़ा ही है। वह अपने आपको अपने तरीके से परिभाषित करना चाहती है और जीवन को अपनी स्केच बुक में बुनती रहती है। उसी के भावों और मनोदशा को पार्श्व स्वर ( voice over) के रूप में सभी एपिसोडस में प्रयोग किया गया है।

बॉम्बे बेगमस महिलाओं की जिंदगी के काफी पहलुओं को छूने की कोशिश करता है और काफी चीजों को सही तरह से प्रस्तुत भी करता है। जिनमें प्रमुख हैं कॉर्पोरेट जगत में Me too, यहां इसको काफी समझदारी से प्रस्तुत किया गया है और किस तरह यह महिलाओं को अपना शिकार बनाता है वह समझने और देखने योग्य है। एक ही पुरुष किसी के लिए देवता और किसी के लिए दानव का रूप किस प्रकार से हो सकता है यह काफी अच्छे से प्रस्तुत किया गया है।

बॉम्बे बेगमस के कमजोर पक्ष की बात करें तो, यह पुरुष पात्रों के साथ पूर्ण रूप से न्याय नहीं करता जिसके चलते महिलाओं की कहानी का दर्द सही रूप से निखर कर नहीं आता इसी के साथ सेक्स को बहुत ही सामान्य सी चीज प्रस्तुत किया गया है जिसे कोई भी किसी के भी साथ कभी भी कर सकता है।
महिलाओं के आजाद होने या आत्मनिर्भर होने का अर्थ यही तो नहीं है शायद ???
कहीं ना कहीं यह बात खटकती है ।।।
शहाना गोस्वामी का अभिनय अचंभित करता है। इसी के साथ मनीष चौधरी का पूर्ण रूप से प्रयोग ना होना खलता भी है। कुछ किरदारों को उनकी पूर्ण क्षमता तक नहीं प्रयोग किया गया है जिनमें दानिश हुसैन और राहुल बोस प्रमुख हैं।
कुल मिलाकर बॉम्बे बेगमस को देखना बनता है वह आपके सामने काफी सवालों को लाकर खड़ा करती है।
जिनका समाधान सच में जरूरी है …

The Last Color : रंग गुलाबी…

निर्देशक – विकास खन्ना
कलाकार- नीना गुप्ता, अक्सा सद्दीकी,
रूद्राणी छेत्री, असलम शेख
अवधि- 90 मिनट
प्रस्तुतकर्ता- Amazon prime video
⭐⭐⭐🌠 3.5/5
“चांद तो सबके पास होता है लेकिन जिनके दिल खुले होते हैं उनको चांद नजर आते हैं, हाथों के”

है ना कितनी खूबसूरत सी बात और समझने वाली भी

Michelin star Chef विकास खन्ना की फिल्म The Last Colour उसी खूबसूरती के एहसास को आपके अंदर से निकालकर आपके सम्मुख लेकर आती हैै। शर्त यह है कि आप उसे समझने की ओर अग्रसर हो। सरल शब्दों में कहा जाए तो यह फिल्म व्यक्ति के उन मनोभावों को प्रस्तुत करती है जो वास्तविकता में उसकेे अपने होते हैंं या परिस्थिति वश वह जैसा बन गया है यानी उसके चरित्र के भाव… यहां व्यक्ति से मेरा तात्पर्य फ़िल्म के किरदारों से है।
फिल्म वाराणसी की विधवाओं को केंद्र में रखकर बनाई गई है जिसके चलते नूर ( नीना गुप्ता) फिल्म का केंद्र बिंदु है। Chef विकास खन्ना की फिल्म विधवाओं की जिंदगी को रंंगहिन कर उनको सिर्फ और सिर्फ प्रभु भक्ति में अपना बचा हुआ जीवन बिताने की प्राचीन परंपरा को प्रस्तुत करती है, जहां पर उनको होली खेलने तक का अधिकार नहीं था क्योंकि वह भी रंगों का त्योहार है।
फिल्म विधवाओं के साथ-साथ छुआछूत और किन्नरों की व्यथा को भी कुछ हद तक प्रस्तुत करती है। यहां फिल्म के निर्देशक विकास खन्ना की तारीफ सही मायनों में बनती है उन्होंने यह साबित किया है कि जिस प्रकार अच्छे व्यंजन के लिए सभी मसालों का सही अनुपात आवश्यक है, तो उसी प्रकार एक बेहतर फिल्म बनाने के लिए भी सभी तरह के भावों का सही अनुपात अनिवार्य है और वह इस फिल्म में आपको बेहतरीन रूप से देखने को मिलेगा। इसी के साथ फिल्म का हर एक फ्रेम अपने आप में खूबसूरत है, सिनेमैटोग्राफी कमाल की है जिस के चलते बनारस के घाटों और गलियों की सजीवता देखते ही बनती है।
अदाकारी की बात करें तो नीना गुप्ता नूर के किरदार में बड़ी ही सहज और ईमानदार लगी है और उनके चेहरे का नूर सच में देखते ही बनता है इसी के साथ छोटी के किरदार में अक्सा सिद्दीकी ने कमाल कर दिया है। दोनों की केमस्ट्री पर्दे पर काबिले तारीफ है, जिसकी वजह से आपको उनका आत्मीय रिश्ता बहुत ही पाक नजर आएगा। फिल्म में रुद्राणी छेत्री और असलम शेख भी अपनी उपस्थिति दर्ज करानेे में कामयााब रहे हैं।
फिल्म पितृसत्ता के मुद्दे को भी उजागर करती है और इसी के साथ शक्ति का प्रयोग कर लोग किस तरह कमजोर लोगों को दबाने का प्रयास करते हैं, का भी छोंक लगाती है।
यहां यह कहना कदापि अनुचित नहीं होगा कि जिस दिन हम एक इंसान के रूप में अपने दर्द और बाकी सभी प्राणियों के दर्द को समान समझने लग जाएंगे उसी दिन से इस तरह की अमानवीय परंपराएं जो कभी उपजा करती थी वो ना तो कभी उपजती और जो अमानवीय कृत्य होते आ रहे है वह भी कभी जन्म ना लेते किंतु “मेरा है तो ही मुझे दर्द है” इस प्रवृत्ति ने इंसानियत को हर बार अलग-अलग रूप में शर्मसार ही किया है। यह पूर्णतया मेरा दृष्टिकोण है।
फिल्म की बात करें तो वह आपके संवेदना के तारों को अपने सरल और सहज अंदाज में छेड़ती है। जोकि देखे जाने और सराहे जाने के लिए पूर्ण रूप से उपयुक्त है। तो कृपया जरूर देखिए और मुझे अपना पक्ष भी बताइए …😊।

Tribhanga – टेढ़ी मेढ़ी Crazy

निर्देशक – रेणुका शहाणे
कलाकार- तनवी आज़मी, काजोल, मिथिला पालकर, कुणाल रॉय कपूर
अवधि- 1 घंटा 35 मिनट
प्रस्तुतकर्ता- Netflix
⭐⭐⭐🌠 3.5/5
रेणुका शहाणे का नाम लेते ही जो छवि उभर कर आती है वह है नूरानी मुस्कान से दमकता हुआ उनका चेहरा और इसी दमकते हुए चेहरे ने एक उद्देश्य पूर्ण कहानी के साथ फिल्म निर्देशन में अपना कदम स्थापित किया है। फिल्म है त्रिभंग जो नेटफ्लिक्स (Netflix) पर प्रस्तुत की गई है।
त्रिभंग का यथाशब्द अर्थ तीन स्थानों से झुका हुआ अर्थात तीन स्थानों से टेढ़ा या बल खाया हुआ होता है और यह उड़ीसी नृत्य की एक मुद्रा भी है, जिसमें शरीर तीन स्थानों से झुका होता है। फिल्म भी ऐसी ही टेढ़ी-मेढ़ी अर्थात भावनाओं और रिश्तो के उतारचढ़ावों से परिपूर्ण है। त्रिभंग नारी सशक्तिकरण की अनोखी कहानी को आपके समक्ष प्रस्तुत करती है। फिल्म को कहने का तरीका काफी दिलचस्प हैै, भूत और भविष्य को एक साथ पर्दे पर दर्शाया जा रहा है। फिल्म देखते समय प्रतीत होता है कि आप किसी किताब को पढ़ रहे हैं क्योंकि बहुत ही बारीकी से किरदारों को और उनकी भावनाओं को पर्दे पर उभारा गया है। कुल मिलाकर स्त्रियों की उन भावनाओं और हाव-भावों को उन्मुक्त रुप में प्रस्तुत किया गया है जो शायद कोई महिला ही बखूबी समझ और निखार सकती थी। तो बहुत ही उम्दा निर्देशन देखने को मिलता है।
फिल्म की कहानी की बात करें तो यह तीन औरतों के इर्द-गिर्द घूमती है, जो तीन पीढ़ियों को प्रस्तुत करती हैं।जिसमें नयनतारा आप्टे (तनवी आज़मी) पहली पीढ़ी को दर्शाती है जो कि एक लेखिका है और जिसने अपनी पूरी जिंदगी को अपनी शर्तों पर जिया और कभी भी अपनी इच्छाओं को लेकर किसी भी प्रकार का समझौता नहीं किया, जिसके चलते वह अपनी ही बेटी की नजरों में सम्मान की पात्र नहीं रही है। उनकी बेटी और दूसरी पीढ़ी है अनुराधा आप्टे (काजोल), जो खुद भी अपनी जिंदगी को अपने ही ढंग में अपनाती है और पूरी जिंदगी अपनी बेटी को वह संरक्षण प्रदान करती हैं जिससे वह वंचित रह गई थी। तीसरी पीढ़ी में आती है माशा मेहता (मिथिला पालकर) जो इन दोनों पीढ़ीयों को देखकर अपनी जिंदगी अलग ढंग से निर्धारित करती हैं जो कि युवा पीढ़ी के स्वभाव से बिल्कुल भिन्न है।
फिल्म कुल मिलाकर स्त्रियों के ही दृष्टिकोण को स्त्रियों के प्रति दर्शाती है। समाज ने शुरू से ही स्त्रियों के लिए एक खांचा तैयार किया है और जब कभी भी, कोई भी स्त्री, किसीको भी, उस खांचे से अलग कुछ करती हुई दिखाई देती है तो वह आलोचना की शिकार हो ही जाती है। चाहे वह अपने आप को बेहतर स्तर दिलाना हो या फिर अपने आप को सक्षम सिद्ध करना ही क्यों ना हो। तब समाज यह नहीं देखता कि वह क्या क्या हासिल कर पाई है, वह अपना ध्यान केंद्रित करता है तो उसके अंदर की कमियों को उजागर करने पर। तो फिल्म यह भी बताती है कि कोई भी सर्वगुण संपन्न नहीं होता है किंतु अपनी क्षमताओं का पता होना ही सही मायने में जिंदगी की उड़ान को बताता है।
जो कार्य पसंद हो, आप को आगे ले जाए और समाज को नई दिशा भी दे तो उसे करने में कोई बुराई नहीं है। और इसमें गर जग हंसाई भी हो तो वह सही मायने में जग हंसाई नहीं है।
गुलाब के फूल के साथ कांटे आना तो स्वभाविक है।
हर किरदार पर्दे पर अपनी छाप छोड़ता है और अच्छे लेखन के चलते आपको समझ भी आएगा कि वह ऐसा व्यवहार क्यों करता है। सभी कलाकारों का अभिनय काफी उम्दा है और फिल्म को अवश्य ही देखा जाना चाहिए और इसी के साथ आप लोगों की प्रतिक्रिया का मुझे तो हमेशा इंतजार रहता ही है।
तो देखिए और बताइए भी… यहां कमेंट्स में या फिर मुझे priyankac1306@gmail.com पर email कर के।

तांडव :- एक सियासी खेल ।।।

निर्देशक – अली अब्बास ज़फ़र
कलाकार- सैफ अली खान, डिंपल कपाड़िया, मोहम्मद जीशान अयूब, सुनील ग्रोवर, कृतिका कामरा, कुमुद मिश्रा, तिग्मांशु धूलिया, सारा जेन डायस, गौहर खान
एपिसोड संख्या – 9 (35 to 40mis/-)
प्रस्तुतकर्ता- Amazon prime video

⭐⭐⭐ / 5

“सही और गलत के बीच में जो चीज आकर खड़ी हो जाती है उसे राजनीति कहते हैं”
उसी तरह अच्छी और बहुत अच्छी के बीच के फर्क को साफ तौर पर जो दर्शाती है उसे कहते हैं तांडव सीरीज..
तांडव सीरीज जब शुरू होती है तो आपको ऐसा लगेगा कि एक बहुत ही बेहतरीन और बारीकी सेेेे बुना हुआ राजनीतिक थ्रिलर आपके समक्ष प्रस्तुत किया जाा रहा है जो अपनी पकड़़ आपके मस्तिष्क पर धीरे धीरे मजबूत करता जाएगा, क्योंकि किरदारों का चयन काफी दिलचस्प है और हर एक किरदार एक दूसरे से जिस प्रकार से जुड़ा हुआ है वह आपकी जिज्ञासा को हवा देनेे के ढंग से ही रचा गया है।

तांडव में आपको वह सभी घटक उपस्थित मिलेंगे जो आपको किसी भी बेहतरीन रचनात्मक सृजन के लिए चाहिए होते हैं किंतु किसी भी उत्तम व्यंजन के लिए सभी मसालों को सही अनुपात में प्रयोग मेंं लाना ही एक अभिष्ट कला होती है और इसी कला का सही उपयोग करने से निर्देशक अली अब्बास ज़फ़र थोड़ा सा चूक गए हैैं।

तो यहां यह कहना कदापि गलत नहीं होगा कि
” नाम बड़े और दर्शन छोटे”
तांडव एक सियासी ड्रामा है। जिसमें यह दिखाया गया है कि अपनी सत्ता को बनाए रखने के लिए आपका कुछ भी कर जाना या किसी भी हद तक चले जाना नाजायज नहीं है। झूठ को किस तरह से झाड़ पोछ़ कर सफेद लबादे में जनता के सामने प्रस्तुत किया जा सकता है, वह तांडव आपको बताएगा। साम दाम दंड भेद की राजनीति और यही है असली राजनीति भी शायद।
कहानी की बात करें तो एक राजनीतिक पार्टी और परिवार की कहानी है। जो देवकी नंदन (तिग्मांशु धूलिया) से शुरू होती है। जिसकी पार्टी जनता लोक दल देश की सबसे मजबूत पार्टी है। और इस बार भी चुनाव में सफलता प्राप्त करने वाली है। जिसके चलते देवकी नंदन एक बार फिर प्रधानमंत्री बनने वाले हैं किंतु नतीजों से पूर्व ही उनकी मृत्यु हो जाती है। और फिर शुरू होता है राजनीतिक दांवपेच का खेल… कि अगला पी एम कौन बनेगा, पुत्र समर प्रताप (सैफ अली खान), पार्टी प्रमुख अनुराधा किशोर(डिंपल कपाड़िया) या फिर पार्टी के वरिष्ठ नेता गोपाल दास मुंशी(कुमुद मिश्रा)। इसी के साथ प्रवेश होता है छात्र राजनीति का जिसके चलते छात्र नेता शिव शेखर(मोहम्मद जीशान अयूब) और छात्र राजनीती का मुख्यधारा की राजनीति से जुड़ाव का। यह सब देखना काफी दिलचस्प भी है। सीरीज में छात्र राजनीति, मुख्यधारा की राजनीति, किसान आंदोलन, मीडिया की भूमिका मौजूदा राजनीति में, सब कुछ है और यह सब किस तरह से कार्य करता है उसकी भी झलक है किंतु सीरीज का climax उस की कमजोर कड़ी है। जिसके चलते अंत में एक अधूरेपन का स्वाद आता है।
अभिनय की बात करें तो सुनील ग्रोवर और सैफ अली खान के किरदारों ने पूर्ण अधिपत्य स्थापित किया हुआ है और वह आपको अपने अभिनय से पूर्ण रूप से विस्मित भी करेंगे और इसी कड़ी को आगे बढ़ाने का कार्य मोहम्मद जीशान अयूब ने भी किया है। किरदारों का चित्रण, लेखन और उनका चयन ही सीरीज की सबसे मजबूत कड़ी है और जिसके चलते आप सभी को यह सीरीज अवश्य देखनी चाहिए और अपनी प्रतिक्रिया को मुझ तक पहुंचाना भी चाहिए।

कागज :- जंग कागज की…

निर्देशक – सतीश कौशिक
कलाकार – पंकज त्रिपाठी, मोनल गज्जर, सतीश कौशिक
अवधि – 1 घंटा 49 मिनट
प्रस्तुतकर्ता – Zee5

⭐⭐⭐

” कुछ नहीं है मगर है सब कुछ भी
क्या अजीब चीज है यह कागज भी
बारिशों में है नाव कागज की
सर्दियों में अलाव कागज की
आसमां में पतंग कागज की
सारी दुनिया में जंग कागज की ”

तो सतीश कौशिक निर्देशित फिल्म कागज में भी सारी जंग कागज की ही है। एक कागज जिसकी कोई बिसात नहीं होती है किंतु असल में तो सारी बाजी उसी कागज के हाथ में होती है। अगर किसी सरकारी कागज पर यह लिख गया है कि व्यक्ति ऊंट है तो उसको अपनी पूरी जिंदगी लगा देनी पड़ती है यह साबित करने में कि वह व्यक्ति ऊंट नहीं है, तो यह हैसियत रखता है एक सरकारी कागज।

कागज फिल्म की कहानी प्रेरित है लाल बिहारी मृतक की जिंदगी से जिन्होंने 18 साल के लंबे संघर्ष के बाद अपने आप को सरकारी कागजों में जीवित साबित कर पाया। उनके इस संघर्ष को पर्दे पर जीवंत किया है पंकज त्रिपाठी जी ने और जिस शिद्दत से उन्होंने इस किरदार को जिया है जो आपको आभास मात्र भी नहीं होने देगा कि वह अभिनय कर रहे हैं और शायद यही उनकी खासियत भी है, “एक सहज और सुलझी हुई अभिनय प्रणाली”।

कहने को तो एक लेखपाल ने लालच में आकर एक व्यक्ति को मृतक लिख दिया जिसको सुधारना इतना भी कठिन नहीं हो सकता था कि 18 साल का लंबा समय लग जाए किंतु किसी भी गलती को सुधारने के लिए उसको मानना आवश्यक है और यहां मुद्दा गलती ना मानना है। सरकारी प्रणाली के इसी दोष को उजागर कर प्रत्यक्ष रूप में प्रस्तुत किया गया है।
हर फिल्म हर व्यक्ति के लिए नहीं होती और ना ही हर व्यक्ति हर फिल्म के लिए। यह फिल्म भी कुछ इसी तरह की है, अच्छी है किंतु सबके लिए नहीं है।

अभिनय की बात करें तो एम मोनल गज्जर ने बहुत अविश्वसनीय अभिनय का प्रदर्शन किया है उन्होंने भरत लाल की पत्नी भूमिका की बड़ी ही सहजता के साथ निभााई है इसी के साथ मीता वशिष्ठठ, नेहा चौहान, अमर उपाध्याय, सतीश कौशिक सभी लोग अपने अपने स्थान पर उपयुक्त और असरदार हैै।

फिल्म एक अच्छे संदेश को सामने रखती है किंतु 2 घंटे की अवधि के लिए वह ज्यादा है और खींची हुई प्रतीत होती है। इसी के साथ अंत में किसी भी सीधे संदेश के ना होने की वजह से थोड़ी अधूरी अधूरी भी लग सकती हैं, किंतु फिर भी एक बार अवश्य ही देखी जा सकती है। और यदि आप पंकज त्रिपाठी के फैन हैं तो निस्संदेह देखनी ही चाहिए।

अहसास….

कहने को तो जिंदगी बहुत छोटी सी है
लेकिन पीछे मुड़कर देखो तो लगता है जमाना गुजर गया है।कुछ रिश्ते मौसम की तरह बदल जाते हैं और कुछ पर कितने भी मौसम निकल जाए अहसास तक नहीं होता।
कभी-कभी अपने को अपने गांव के घर की मुंडेर पर पाती हूं…
आज भी मन में गुदगुदी सी हो जाती है, जब यह सोचती हूं कि मम्मी जब कुटी काटा करती थी तो मैं क्यों मना करती थी कि…“मेरी मम्मी कुटी नहीं काटेगी… “कुछ लगता होगा बाल मन को अलग सा ।
आज भी मुझे याद है कैसे हम सब गर्मी की छुट्टियों में जिया-दादी की चारपाई के नीचे घुसकर उसको अपने सर से उठा दिया करते थे और वह जोर जोर से चिल्लाने लगती थी
“मरे दूपहारी में हू, चैन नाहीं लेन देत हैं..”

उस समय हम सब बच्चों को वही खेल प्यारा था।

बाबा का वो हर बार नीम के पेड़ पर मेरे लिए झूला डालना और एक बार मेरे भाई ने इतनी तेज धक्का दिया था कि झूला काटें की झाड़ी के पास चला गया और मेरे पैर पर जरा सी खरोच आ गई और भाई हम तो हम है सबको दिखा दिखा कर पागल कर दिया, आखिर में बाबा ने बोला ही
” कितना खून निकल गया है उतना तो महीने भर में भी नहीं बना होगा …”
कहने को तो ये सब उस समय की छोटी-छोटी बातें हैं लेकिन है यादों में है और अब ये ही अनमोल लगती हैं।
जैसे जब कोई सभ्यता लुप्त हो जाती है तब उसके टूटे हुए बर्तन भी धरोहर कहलाते है। ये मेरी धरोहर है शायद…एक दादी हुए करती थी हमारे गाँव में, पापा मौसी बोला करते थे उनको, अभी जो लोग गाँव के होंगे उनको पता भी होगा कि वहां कितने ही अदभुत और निराकार रिश्ते होते है जिनको जो भी आकार आप अपने अनुसार दे सकते है..

“उनको बड़ा अरमान था मुझे मेरी शादी में देखने का, उनके अनुसार मैं बड़ी सुंदर थी और अपनी शादी में बड़ी ही सुंदर लगने वाली थी दुल्हन के रूप में..”

अभी भी ये किस्सा ज़हन में ताजा सा रहता है क्योंकि एक तो उनकी सोच के विपरीत मैं अपनी शादी में सुंदर नहीं लगी बल्कि बैंगनी रंग की लग रही थी (मेरे पति के अनुसार)। दूसरा मुझे अपनी तारीफ़ और बुराई याद रह ही जाती है…मुझे पता है काफी लोगों के साथ ऐसा होता है।
पता नहीं क्यों एक बात मेरे साथ बहुत अजीब सी है, मैं अपने विशेष अवसरों पर कभी अपेक्षित रूप में सुंदर नहीं लगी हूं ये विडंबना अभी तक है मेरे साथ… लोगों की अपेक्षाओं पर खरा ना उतार पाने का हुनर शायद शुरू से ही था मुझ में। हा हा…
एक बात तो है, आप अपने आपको जितनी अहमियत देते हो लोग भी उतनी ही देते है, चाहे देर से ही क्यों ना दे..उसके लिए ज़रूरी है तो की आप अपने आप को महत्वपूर्ण समझना बंद ना करे । हर स्तर पर आप अपने आपको आकार ही दे रहे होते हैं…. पूर्ण होने जैसा कुछ होता ही नहीं है मेरे हिसाब से तो…

हर पल हर लम्हा कोई ना कोई किस्सा बन ही रहा होता है।

सफरनामा… Finalist (Mrs Delhi NCR 2020)

मैंने देखा है बंद परों का खुलना
मैंने देखा है कुम्हलाई आंखों का ख्वाब बुनना
मैंने देखा है सिर्फ अपने लिए ही लड़ना
मैंने देखा है खुद के वजूद को आगे रखना
मैंने देखा है अपने नाम को पहचान दिलाने का जज्बा पिरोना
इन बीते 4 दिनों में मैंने वह सब देखा और महसूस किया जो करने में शायद उम्र लग जाती है। अकेले में आप शायद अपने ही पंखों की उड़ान, अपने ही ख्वाबों की धार और अपने हौसलों को ही देख पाते हैं लेकिन जब आप एक ऐसी जगह होते हैं जहां सब के सपनों की दिशा एक ही है लेकिन फिर भी वह एक दूसरे से नहीं लड़ रहे वह सिर्फ और सिर्फ अपने आप को बेहतर और बेहतर और भी बेहतर करने के लिए लड़ रहे हैं।
जब बहुत लोगों की दिशा एक जैसी होती है तो वह शायद एक जैसे लगते हैं, ऐसा मैं सोचा करती थी लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है लोगों की शख्सियत अलग होते हुए भी ख्वाबों की दिशा एक है उनकी डगर एक है, उनकी मंजिल एक है फिर भी वे एक दूसरे से एकदम अलग है।
यहां मैं बात कर रही हूं अपने Mrs Delhi NCR 2020 के Finalist के अनुभव की, उस सफर की, उन चार दिनों की जो मैंने और बाकी प्रतियोगियों ने Glamour Gurgaon की Team के साथ बिताए। कुछ अनुभव जिंदगी आपको खुद ब खुद देती है और कुछ आप चुनते हैं। यह वही चुना गया अनुभव है। कभी-कभी आपके हुनर को आपके आसपास वाले लोग पूरी तरीके से महसूस नहीं कर पाते हैं। इसका मतलब यह कदापि नहीं है कि आप हुनरमंद नहीं है, जरूरी यह है कि आप उसको पहचाने और वहां जाकर खड़े होने का जज्बा दिखाएं, जहां वह पहचाना जा सकता है।
Mrs Delhi NCR 2020 के ऑडिशन में मैंने इस जज्बे को प्रत्यक्ष रूप से देखा है उन लोगों को देखा है जो अपने हुनर को, अपनी शख्सियत को एक अलग पहचान देना चाहते हैं, जो अपने-अपने क्षेत्र में कुछ ना कुछ अर्थ पूर्ण कर रहे हैं, फिर भी कुछ और की कोशिश करना चाहते हैं। इसी को तो शायद जिंदगी कहते हैं – बिना रुके, बिना थके निरंतर कुछ ना कुछ करने की चाह में आगे बढ़ते जाना।
कभी-कभी आपको सिर्फ और सिर्फ सही समय पर सही जगह होने की जरूरत होती है और उसके बाद जो कुछ होता है वह अच्छा ही होता है, जिस प्रकार हीरे की कद्र जौहरी को होती है बाकियों के लिए तो वह भी कोयला होता है।
Glamour Gurgaon की Team के पास वो पारखी नज़र थी कि वो उस सजीवता को पहचान कर उसको वो दिशा दे जिसके लिए वो उस मंच पर आकर खड़े हुए हैं। इस pandemic (Corona) की उपस्थिति में इस तरह की प्रतियोगिता का आयोजन करना और लोगों का इस आयोजन में सम्मिलित होना एक उत्साही और क्रांतिकारी ज्जबे का उदाहरण प्रस्तुत करता है। कोई भी बाधा आपको आगे बढ़ने से नहीं रोक सकती बशर्ते आपकी दिशा सही है, जरूरी है तो सारे नियमों और निर्देशों का बखूबी पालन करना।
बरखा मैम (Barkha Nangia) और अभिषेक सर (Abhishek Nangia) ने ये पूर्ण रूप से सुनिश्चित कराया कि किसी भी प्रतिभागी को कोई असुविधा ना हो और नियमों का भी पूर्ण रूप से पालन किया जाए। इतना बड़ा उत्तरदायित्व लेना और उसको पूर्ण रूप से निभाना एक बहुत बड़ा जिम्मेदारी का कार्य होता है जो की काबिले तारीफ़ ढंग से Glamour Gurgaon की Team द्वारा सफलतापूर्वक अंजाम तक पहुंचाया गया।
कुछ लोग अपने सिर्फ अपने आपको कामयाबी की तरफ ले कर जाते है और कुछ वो रास्ता चुनते है जो दूसरों को कामयाबी की तरफ ले जाते हुए उनको भी कामयाब बनाए। इस बार कुछ लोगों के सपनों की उड़ान मैंने भी देखी और कुछ के सपनों को मुकम्मल होते हुए भी। इस पूरे आयोजन के दौरान जिस आशावादी सोच को मैंने सभी की आंखों में देखा वह बहुत ही प्रगतिशील थी। सभी लोग प्रतियोगी होते हुए भी किसी को नीचा दिखाना या छोटा दिखाने की कोशिश ना करते हुए अपने आप को श्रेष्ठ दिखाने की कोशिश में थे जोकि आज कल के प्रतिस्पर्धा पूर्ण वातावरण में कम ही देखने को मिलता है। इस श्रेष्ठता तक पहुंचने के लिए बहुत आत्मविश्वास और आत्म संयम की जरूरत होती है जो कि वहां आए सभी लोगों में था और यदि कभी किसी निराशा ने हम लोगों को घेरा तो बरखा मैम और बाकी सभी मेंटर्स ने सकारात्मकता बनाए रखने का पूर्ण प्रयास किया।

यहां मैं एक बात अवश्य कहना चाहूंगी कि लोगों का ग्लैमर और फैशन इंडस्ट्री के बारे में एक अलग तरह का दृष्टिकोण है जोकि नकारात्मक है, परंतु कुछ लोगों के नकारात्मक अनुभव को ही आधार बनाकर सभी को उसी कतार में शामिल करना उचित नहीं है। हर जगह हर तरह के लोग होते हैं, कभी कभी आप का चुनाव गलत होता है और कभी कुछ लोग गलत होते हैं जिनकी वजह से यह धारणा बन जाती है। तो कृपया अपने चुनाव को लेकर सजग रहें ताकि इस तरह की धारणाओं को बढ़ावा ना मिले।

हर व्यक्ति अपना आसमां खुद चुनता है और वही उसकी उड़ान को मुकम्मल दिशा मिल पाती है तो किसी भी अवसर को अपने हाथ से मत जाने दो क्योंकि वो अवसर आपको कुछ ना कुछ तो दे कर ही जाएगा। सफलता मिल गई तो ‘ सोने पर सुहागा ‘ नहीं तो अनुुुुभव तो अनमोल मिलेगा ही जो अपने आप में अतुलित है ।
अब बुढ़ापे में किस्से भी तो सुनने है, तो अपने किस्से तो आप ही बुनेंगे ना, तो फिर करो शुरूआत ।

SCAM 1992- The Harshad Mehta Story !

SCAM 1992 The Harshad Mehta Story वेब सीरीज समीक्षा

⭐⭐⭐⭐/ 5*

  • शैली (Genre) बायोपिक ड्रामा
  • द्वारा निर्देशित (Directed by) हंसल मेहता
  • भाषा (Language) हिंदी
  • एपिसोड संख्या 10 ( 50 to 55 mins/-)

जब किसी कार्य को पूरी श्रद्धा और कड़ी मेहनत के साथ किया जाए और उसका परिणाम उम्दा ना आए, यह तो संभव ही नहीं होता और ‘स्कैम 1992’  निर्देशक हंसल मेहता कि कड़ी मेहनत और उसको बनाने की निष्कपट श्रद्धा का जीवंत उदाहरण स्वरूप सोनी लिव पर गत सप्ताह प्रसारित किया गया है।’स्कैम 1992′ कहानी है हर्षद मेहता की। पहली बात अगर आप हर्षद मेहता को नहीं जानते तो आप इस सीरीज के अंत तक इस विषय में पारंगत हो जाएंगे और अगर जानते हैं तो यह सीरीज आपके उस ज्ञान में बढ़ोतरी कर देगी।

  • RISK है तो ISHQ है।
  • EMOTION में इंसान हमेशा गलती करता है।
  • SUCCESS क्या है ?? FAILURE के बाद का नया CHAPTER ।
  • देखो मैं CIGARETTE नहीं पीता पर जेब में LIGHTER जरूर रखता हूं, धमाका करने के लिए।
  • जब जेब में MONEY हो तो कुंडली में शनि होने से कुछ फर्क नहीं पड़ता।

इन डायलॉग के द्वारा आपको ज्ञात हो जाएगा कि हर्षद मेहता को शेयर मार्केट का अमिताभ बच्चन क्यों कहा जाता था।
आप जैसा सोचते हैं, वैसा ही बनते हैं। ‘
यह कहावत हर्षद मेहता के ऊपर पूर्ण रूप से खरी उतरती है। उन्होंने जो चाहा, जैसे चाहा, वैसा किया और वैसा जिया भी लेकिन जिस तरह शिखर पर पहुंचने के उपरांत धरातल पर ही आना पड़ता है, वहीं कुछ हर्षद मेहता के साथ भी हुआ।
इस सीरीज के जरिए आप हर्षद मेहता की जिंदगी के उतार-चढ़ाव के साथ साथ शेयर मार्केट की गणित को भी बखूबी समझ पाएंगे। निर्देशक हंसल मेहता ने हर एक बारीकी का ध्यान रखा है। जिससे किसी भी तरह की गलती की संभावना समाप्त ही हो गई है, चाहे वह…

  • हर्षद मेहता के स्वभाव और उनकी सोच को पर्दे पर उतारना हो।
  • उनके परिवार की मनोदशा का वर्णन करना हो।
  • शेयर मार्केट किस तरह से कार्य करता है या कैसे संचालित किया जाता है अर्थात उसकी कार्यप्रणाली के बारे में हो।
  • 90 के दशक को पर्दे पर किस प्रकार जीवंत किया जाए।
  • भाषा को सरल रखते हुए दर्शकों पर किस तरह पकड़ स्थापित की जाए।

‘ स्कैम 1992’ में जिस स्कैम के बारे में बात हुई है, वह है 500 करोड़़ का बैंक फ्रॉड और यह कैसे हर्षद मेहता के साथ-साथ उस समय के दिग्गजों को भी अपने लपेटे में ले लेता है। यह सीरीज देवाशीष बसु व सुचेता दलाल की किताब ‘ द स्कैम ‘ से प्रेरित है।
अभिनय की बात करें तो हर किरदार इतना प्रभावशाली और सहज है कि आपको प्रतीत होगा कि आप कोई डॉक्यूमेंट्री देख रहे हैं। जिसमें मुख्य किरदार निभाने वाले प्रतीक गांधी और श्रेया धनवंतरी काबिले तारीफ है। उनको देखकर आपको आभास भी नहीं होता है कि वह अभिनय कर रहे हैं। यह सीरीज मेरी 2020 की अब तक की देखी हुई  सीरीजों में ‘असुर ‘ के बाद सबसे उम्दा है और निस्संदेह देखने योग्य है।

नोट :- प्रतीक गांधी का अभिनय इस सीरीज को चार चांद लगाता है ।

डॉली किट्टी और वो चमकते सितारे फिल्म समीक्षा Movie Review

  • निर्देशक – अलंकृता श्रीवास्तव
  • कलाकार – कोंकणा सेन शर्मा, भूमि पेडनेकर
  • अवधी – २ घंटे
  • प्रस्तुतकर्ता – नेटफ्लिक्स
  • ⭐⭐⭐
जब आपके दिमाग में बहुत सारे विचार हो और आप उन विचारों को एक-एक करके नहीं एक साथ ही शक्ल देने का प्रयास करते हैं तो जो अंत में जो परिणाम आता है, उसको हम डॉली किट्टी और वो चमकते सितारे भी कह सकते हैं। निर्देशक अलंकृता श्रीवास्तव ‘लिपस्टिक अंडर माय बुर्का’ के 3 साल बाद अपनी नई फिल्म के साथ फिर से महिला सशक्तिकरण के मुद्दे को उजागर कर रही हैं।
Why should boys have all the fun की तान पर बनी फ़िल्म, की हम औरतें क्या पीछे हैं। तो फ़िल्म की कहानी औरतों की अधूरी इच्छाओं की है लेकिन इसके लिए उनको कन्फ्यूज्ड दिखाना कहां तक सही है ??

कहानी कहने का जो तरीका है वह भी कंफ्यूज है और डॉली और किट्टी दोनों के किरदार भी उलझे हुए हैं। दोनों किरदार चचेरी बहनों के रिश्ते में है कोंकणा और भूमि बहनों के किरदार में काफी सहज व विश्वसनीय हैं लेकिन उनके किरदारों को पता ही नहीं है कि उन्हें जिंदगी से क्या चाहिए है।

डॉली अपनी शादी में संतुष्ट नहीं है, लेकिन खुश दिखने का ढोंग करती रहती है और डिलीवरी ब्वॉय उस्मान के रूप में आंतरिक खुशी ढूंढती रहती है और वहीं दूसरी तरफ किट्टी कम पढ़ी-लिखी है और गांव से शहर आकर एडल्ट कॉल सेंटर में काम करने लगती हैं, और अपने आप को शहर के परिवेश में ढालने का पुरजोर प्रयास करती है।
फिल्में में बहुत कुछ एक साथ दिखाने का प्रयास किया जा रहा है। जिसके चलते बहुत सारी चीजें अधूरी लगती हैं और जब फिल्म समाप्त होती है तो संतुष्टि का अहसास नहीं देती और ना ही आपको यह लगता है कि आप कुछ अर्थपूर्ण देख रहे थे।
फिल्म की शुरुआत अच्छी है लेकिन अंत सभी प्रश्नों का उत्तर सफलतापूर्वक नहीं दे पाता है फिल्म में काफी कलाकार है और सभी अभिनय के लिहाज से काफी अच्छे साबित हुए हैं लेकिन सभी किरदारों को उनकी पूरी जगह सही से नहीं मिल पाई है। उसमें अमीर बशीर, विक्रांत मेसी अमोल पाराशर, करण कुंद्रा और कुब्रा सैत जैसे नाम शामिल हैं।
फिल्म को बिना शक एक बार जरूर देखा जा सकता है तो जाकर देखें और अपने विचार व्यक्त कीजिए।