Ajeeb Daastaans : Thought-Provoking Cinema

निर्देशक – शशांक खेतान, राज मेहता, नीरज घेवान, कायोज ईरानी
अवधि- 2 घंटा 22 मिनट
प्रस्तुतकर्ता- Netflix
⭐⭐⭐⭐ 4/5
अजीब दास्तान्‌स एक एंथोलाजी यानी एक संकलन है। 4 कहानियों का संकलन, जिनमें समानता उनकेेे किरदारों की सोच हैै, जो बाहर से कुछ और तथा अंदर से कुछ अलग ही भावों को अपने अंदर समेटे हुए हैं। कहनेे का तात्पर्य है कि अंदर का शख्स बाहर वाले शख्स से मेल ही नहीं खाता हैै और वही इन सब कहानियों का असली चेहरा भी है।
इन कहानियों में आपको लाचारी, बेचारगी, बर्बरता, दृढ़ता, द्वेष, ईष्या, पूर्व-निर्माण, जहरीलापन, सभी तरह के भावों का समावेश मिलेगा।
अजीब दास्तान्‌स आपको परिपक्व सिनेमा की तरफ ले जाएगा और आपके मस्तिष्क में ऐसे सवाल छोड़कर जाएगा जिनका उत्तर ढूंढते हुए आपको भी अपने अंदर के छुपे हुए भावों की झलक देखने को मिल सकती है।

विचारोत्तेजक सिनेमा (Thought-provoking Cinema)।

अजीब दास्तान्‌स चार कहानियों का समूह है
मजनू :

जिसमेंं प्रथम शशांक खेतान द्वारा निर्देशित है और फातिमा सना शेख, जयदीप अहलावत और अरमान रहलान मुख्य कलाकारों की भूमिका में हैं। यह कहानी एक अधूरी शादी की दास्तान को बयां करती है। जहां पति पत्नी सिर्फ नाम के रिश्ते में हैै, समाज में अपने आधिपत्य को सुनिश्चित करने के लिए। फिर यहां “वो” का प्रवेश होता है और कहानी अलग मोड़ लेती है। मजनू में सब कुछ अच्छा है। किरदार काफी मजबूत हैं किंतु जो थोड़ा नहीं जमा है, वह है कहानी में नयेेपन की कमी। सब कुछ देखा और सुना हुआ सा प्रतीत होता है।

खिलौना :

दूसरी कहानी है खिलौना, जिसका निर्देशन राज मेहता ने किया है, यहां नुसरत भरुचा और अभिषेक बैनर्जी मुख्य कलाकारों की भूमिका में हैं। यह समाज के दो वर्गों को प्रस्तुत करती है, कोठीवाले और कटियावाले। कटियावालों का मानना है कि “कोठीवाले किसी केेे भी सगे नहीं होते” और यही इस कहानी का दर्द भी हैै। सभी किरदारों ने बहुुत ही सहज अभिनय किया है इस कहानी का अंत आपको हिला कर रख देगा। कहानी आपको पूरी तरह से बांध कर रखती है और बोर नहीं होने देती हैै। यहां जो थोड़ा खटकता है वह कहानी का अंत है, जो बहुत ही डरावना है किंतु कहानी इस अंत के साथ पूर्ण न्याय नहींं करती या कह सकतेेे हैं की इतनी घृणा का सबब पूर्ण रूप सेे निकल कर नहीं आता है।

गीली पुच्ची :

तीसरी और कई विषयों को सामने लाती हुई कहानी है गीली पुच्ची, जिसका निर्देशन नीरव घेवान द्वारा किया गया है और मुख्य किरदारों में कोंकणा सेन शर्माअदिति राव हैदरी हैं। यह कहानी दो विषयों को छूती है,- “वर्ण व्यवस्था” और “समलैंगिकता”। कहानी को सटीक ढंग से लिखा और प्रस्तुत किया गया है। किरदारों केेे बीच की कड़वाहट और खिंचापन साफ पता चलता है। दोनों अभिनेत्रियों नेे बहुत ही उम्दा और सहज अभिनय का प्रदर्शन कियाा है जो इस कहानी का सबसे मजबूत पक्ष है।

अनकही :

चौथी और आखिरी कहानी है निर्देशक कायोज़ ईरानी की, जो बहुुुुत ही गहरी और प्यारी है जिसके मुख्य कलाकार हैं शेफाली शाह, तोता राय चौधरी और मानव कौल। यह कहानी बोलती बहुत कम है लेकिन समझा सब कुछ जाती है और रिश्तो के उतार-चढ़ाव को भी बड़ी सहजता से समझा जाती है। सभी कहानियों में यह सबसे अधिक सशक्त और छाप छोड़ने वाली है। इसी के साथ शेफाली शाहमानव कौल इतने सटीक और निश्छल हैं कि आप अपनी नजर उन से हटा ही नहीं पाएंगे।

यदि आप चारों कहानियों की तुलना करते हैं तो प्रथम कहानी प्रभावित करने से थोड़ा सा चूक जाती है, बाकी सब अपने-अपने संदेश को आप तक पूरी तरह से पहुंचाती है। सभी किरदार अपने अपने चयन में पूर्ण रूप से न्याय संगत है और आपको मनोरंजन के साथ साथ सोचने पर विवश करते हैं, जो कि इस फिल्म का भी उद्देश्य है। एक बेहतरीन फिल्म काफी समय के बाद आपके समक्ष है और आप देखने से कृपया ना चूके।

फिल्म का मजबूत पक्ष, निर्देशन और किरदारों का चयन है।

Ek Ladki Ko Dekha To Aisa Laga…… Thoughtful !!!


‘एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा’ फ़िल्म समीक्षा (Movie Review)
3*/5*
यह फ़िल्म एक महत्वपूर्ण विषय(subject) की तरफ हमारा ध्यान केंद्रित करती है ‘समलैंगिक रिशते’। ऐसा नहीं है की इस विषय पर इससे पहले फिल्में नहीं बनी है, ‘अनफ्रीडम’ ‘फ़ायर’ ‘आई एम’ आदि फिल्में इस विषय पर बन चुकी है किंतु सितम्बर 2018 में कानून द्वारा ‘समलैंगिकता’ को अपराध की श्रेणी से हटाने के बाद आयी यह प्रथम फ़िल्म है।
निर्देशक शैली चोपड़ा धर की यह प्रथम फ़िल्म है, अपनी पहली ही फ़िल्म में इतने संवेदनशील विषय को चुनना काबिले तारीफ़ है किन्तु सिर्फ विषय चुनने के अंक नहीं मिलते है, कहने का अर्थ यह है कि फ़िल्म जिस मुद्दे को दिखाना चाहती थी वो पुख़्ता तौर पर उस पर नहीं बोलती है। कानून द्वारा मान्यता मिलने के बाद यह फिल्म ‘LGBT’ समुदाय केे लिए एक अहम फ़िल्म साबित हो सकती है क्योंकि समाज द्वारा ‘समलैंगिकता’ को स्वीकारा जाना अभी भी एक मुद्दा है। फ़िल्म इसी तरफ इशारा भी करती है “प्यार,प्यार होता है और वह किसी को भी किसी से भी हो इस से प्यार का अस्तित्व नहीं बदलता वो तब भी प्यार ही रहता है।” अब यह बात समझने में समाज कितना समय लेगा वो तो एक प्रशन ही है।
कहानी की बात करें तो यह एक आम पंजाबी परिवार है। जिसमें एक दिलचस्प पिता बलबीर चोधरी(अनिल कपूर) उनकी एक डरी सहमी सी बेेटी स्वीटी(सोनम कपूर) और अपनी बहन पर जान देंनेे वाला बेटा (अभिषेक दुहान) है जिसे अपनी बहन का औरों से अलग होना एक बीमारी लगता है और वह उसे निरन्तर समझाता रहता है। फ़िल्म के सहायक किरदारों में जूही चावला, मधुमालती, सीमा पाहवा, बृजेंद्र कला और रेजिना कैसेंडरा बहुत सहज है। अब बात करते है साहिल मिर्जा(राजकुमार राव) की वह इस कहानी के धागों को फिल्म के विषय से बांधने का काम करते है और एक अनोखे रूप में फ़िल्म पर छाए रहते हैं। कहानी को गजल धलीवाल और शैली चोपड़ा धर ने मिल कर लिखा जिसमें थोड़े पैनेपन की और व्यंग्य की कमी दिखाई देेती है। रोचक कोहली का संगीत फ़िल्म के साथ-साथ सुचारु रूप से(smoothly) चलता है। फिल्म एक प्रयास है कि कुुुछ चीजें जैसी है उसे वैसा ही स्वीकार करना चाहिए। कुुुछ लोग हम से उतने ही अलग हैं जितने कि हम उनसे लेेकिन यहां विडंबना यह है कि अलग होने के पैमाने भी समाज ने पहले से ही निधार्रित किये हुए हैं। सोचिएगा जरूर ……🤔🤔