विचारोत्तेजक सिनेमा (Thought-provoking Cinema)।
जिसमेंं प्रथम शशांक खेतान द्वारा निर्देशित है और फातिमा सना शेख, जयदीप अहलावत और अरमान रहलान मुख्य कलाकारों की भूमिका में हैं। यह कहानी एक अधूरी शादी की दास्तान को बयां करती है। जहां पति पत्नी सिर्फ नाम के रिश्ते में हैै, समाज में अपने आधिपत्य को सुनिश्चित करने के लिए। फिर यहां “वो” का प्रवेश होता है और कहानी अलग मोड़ लेती है। मजनू में सब कुछ अच्छा है। किरदार काफी मजबूत हैं किंतु जो थोड़ा नहीं जमा है, वह है कहानी में नयेेपन की कमी। सब कुछ देखा और सुना हुआ सा प्रतीत होता है।
दूसरी कहानी है खिलौना, जिसका निर्देशन राज मेहता ने किया है, यहां नुसरत भरुचा और अभिषेक बैनर्जी मुख्य कलाकारों की भूमिका में हैं। यह समाज के दो वर्गों को प्रस्तुत करती है, कोठीवाले और कटियावाले। कटियावालों का मानना है कि “कोठीवाले किसी केेे भी सगे नहीं होते” और यही इस कहानी का दर्द भी हैै। सभी किरदारों ने बहुुत ही सहज अभिनय किया है इस कहानी का अंत आपको हिला कर रख देगा। कहानी आपको पूरी तरह से बांध कर रखती है और बोर नहीं होने देती हैै। यहां जो थोड़ा खटकता है वह कहानी का अंत है, जो बहुत ही डरावना है किंतु कहानी इस अंत के साथ पूर्ण न्याय नहींं करती या कह सकतेेे हैं की इतनी घृणा का सबब पूर्ण रूप सेे निकल कर नहीं आता है।
तीसरी और कई विषयों को सामने लाती हुई कहानी है गीली पुच्ची, जिसका निर्देशन नीरव घेवान द्वारा किया गया है और मुख्य किरदारों में कोंकणा सेन शर्मा व अदिति राव हैदरी हैं। यह कहानी दो विषयों को छूती है,- “वर्ण व्यवस्था” और “समलैंगिकता”। कहानी को सटीक ढंग से लिखा और प्रस्तुत किया गया है। किरदारों केेे बीच की कड़वाहट और खिंचापन साफ पता चलता है। दोनों अभिनेत्रियों नेे बहुत ही उम्दा और सहज अभिनय का प्रदर्शन कियाा है जो इस कहानी का सबसे मजबूत पक्ष है।
चौथी और आखिरी कहानी है निर्देशक कायोज़ ईरानी की, जो बहुुुुत ही गहरी और प्यारी है जिसके मुख्य कलाकार हैं शेफाली शाह, तोता राय चौधरी और मानव कौल। यह कहानी बोलती बहुत कम है लेकिन समझा सब कुछ जाती है और रिश्तो के उतार-चढ़ाव को भी बड़ी सहजता से समझा जाती है। सभी कहानियों में यह सबसे अधिक सशक्त और छाप छोड़ने वाली है। इसी के साथ शेफाली शाह व मानव कौल इतने सटीक और निश्छल हैं कि आप अपनी नजर उन से हटा ही नहीं पाएंगे।
यदि आप चारों कहानियों की तुलना करते हैं तो प्रथम कहानी प्रभावित करने से थोड़ा सा चूक जाती है, बाकी सब अपने-अपने संदेश को आप तक पूरी तरह से पहुंचाती है। सभी किरदार अपने अपने चयन में पूर्ण रूप से न्याय संगत है और आपको मनोरंजन के साथ साथ सोचने पर विवश करते हैं, जो कि इस फिल्म का भी उद्देश्य है। एक बेहतरीन फिल्म काफी समय के बाद आपके समक्ष है और आप देखने से कृपया ना चूके।
फिल्म का मजबूत पक्ष, निर्देशन और किरदारों का चयन है।
