कभी कभी…

कभी-कभी लगता है मन शांत नहीं है,
शायद होने की कोई बात ही नहीं है ।

कभी-कभी लगता है सबकुछ बुझा-बुझा सा है,
शायद कुछ अच्छा इसे सुझा ही नहीं है ।

कभी-कभी लगता है सब उजड़ सा गया है,
शायद मरम्मत का समय आया ही नहीं है ।

कभी-कभी लगता है सब रुका-रुका सा है,
शायद थकान अभी उतरी ही नहीं है ।

कभी-कभी लगता है सब पर चढ़ा कोई कर्ज सा है,
शायद किस्तें सही से चुकाई ही नहीं हैं ।

कभी-कभी लगता है जीने का कोई मतलब सा नहीं है,
शायद कभी सही से मतलब समझा ही नहीं है ।

कभी-कभी लगता है हर रिश्ता कितना ख़ास है,
शायद कभी इतने गौर से देखा ही नहीं है ।

कभी-कभी लगता है हर सांस कितनी कीमती है,
शायद कभी सही क़ीमत लगाई ही नहीं है ।

कभी-कभी लगता है सुकून कितना सस्ता है,
मिले तो चार दिवारी में वरना पूरी दुनियाँ में सुनवाई ही नहीं है ।

#pcscrawls

कुछ तो …

कुछ तो बदल रहा है, उम्र के साथ मुझ में
कुछ तो…

पहले जो कदम कहीं भी बेधड़क पड़ा करते थे उनको सोच समझ कर रखने लगी हूं मैं
अपने ही शब्दों के अर्थों में उलझने सी लगी हूं मैं…

अपने को, अपने को… समझदारी के एक लबादे में हमेशा ढकने की कोशिश में रहती हूं,
अपनी ही अलहड़ता से छुपने सी लगी हूं मैं…

मुझे नहीं पता कितना समझदार होने पर लोगों को समझदार की उपाधि दी जाती है या कितना ज्ञान प्राप्त कर वो ज्ञानी कहलाते हैं,
अपने आस-पास, अपने आस-पास..इन बुद्धिजीवियों की होड़ से विचलित सी होने लगी हूं मैं…

मुझे द्रौपदी का किरदार हमेशा से प्रभावित करता आया है।
उसके चेहरे की दृढ़ता हमेशा अपने अंदर महसूस कि है मैंने।किंतु अब इस बात को सबको बताने से भयभीत सी होने लगी हूं मैं…

बहुत संवेदनशील हूं मैं, बहुत संवेदनशील हूं मैं …और ये मेरा सब से बड़ा गुण है लेकिन इस गुण को भी गुण बताने से झिझकने सी लगी हूं मैं…

ये सब इस उम्र के साथ ही तो आया है।

तभी तो कुछ तो..कुछ तो बदल रहा है उम्र के साथ मुझ में…🙂