MODERN LOVE MUMBAI

Rating :- 3.5 / 5 ⭐⭐⭐💫
OTT :- Amazon prime

अमेरिकन वेब सीरीज मॉर्डन लव की तान से तान मिलाता हुआ मॉर्डन लव मुंबई भी आ चुका है और अपने साथ दिग्गज निर्देशकों की फौज और कुछ बहुत ही खूबसूरत कहानियों को हमारे सामने अपने मॉर्डन अंदाज में परोसता है।

यहाँ बात प्यार की हो रही है जैसे कि नाम से ज्ञात हो जाता है।
प्यार का कोई रंग रूप नहीं होता, वह हर व्यक्ति विशेष के हिसाब से बदलता है। उसके समीकरण उसके पैमाने वक्त के साथ अपना स्वरूप विकसित और भिन्न करते आए हैं। प्यार इतनी व्यापक और विस्तृत भावना है कि उसके अंदर असंख्य भावनाएं समा सकती हैं।
🔹वह हमको आजादी के साथ बंधना सिखाता है।
🔹वह ठहराव के साथ-साथ बहना भी सिखाता है।
🔹वह परिपक्वता के साथ-साथ बचपने को भी जीवित रखता है।
🔹वह फिक्र में भी बेफिक्री देता है।
कहने का तात्पर्य है कि इससे खूबसूरत भावना, अनुभूति और मनोभाव कुछ हो ही नहीं सकता और सबसे महत्वपूर्ण यह कभी भी आपको अकेला महसूस नहीं होने देता।
इन्हीं सब भावों से परिपूर्ण कहानियां हैं
मॉर्डन लव मुंबई के 6 अध्यायों के अंदर।

सभी कहानियां अपने अपने अंदाज मे प्यार की अपनी-अपनी परिभाषा को प्रस्तुत करती हैं और नएपन का एहसास भी देती हैं।
इन सभी कहानियों में से जो मेरी व्यक्तिगत प्रिय कहानियां हैं वह कुछ इस प्रकार हैं।

CUTTING CHAI :- निर्देशक नूपुर अस्थाना की कटिंग चाय का जो ज़ायका है वह जुबान से उतरने में खासा वक्त लेता है।
इतनी कमाल चाय बनाई है कि मुझ जैसे चाय प्रेमी को तो भा ही गई। कहने का तात्पर्य यह है कि बहुत ही सुंदर प्रस्तुति, बहुत ही सरल अभिनय और बिल्कुल आप और हम जैसे किरदार। जब जिंदगी जीते जीते फीकी होने लगती हैं तब आपको जरूरत होती है कि कोई आए और कहे “चल शुरू से शुरू करते हैं” बस फिर क्या है सफर फिर नया और ताजा लगने लगता है। अरशद वारसी की एक्टिंग हमेशा ताजगी का अनुभव कराती है और चित्रांगदा सिंह इतनी सुंदर कि नज़रें ही ना हटें। मतलब कि कहानी देख कर मजा ही आ गया। (⭐⭐⭐⭐💫)

RAAT RANI :- निर्देशक सोनाली बोस की रात रानी की महक ज़हन को वह अंदर वाली खुशी का अनुभव कराती है जो कुछ महत्वपूर्ण कार्य या सिद्धि के पूर्ण हो जाने पर होती है।
जिस प्रकार रात रानी की महक को दबाना मुश्किल है, वैसे ही व्यक्ति को भी उसकी सही क्षमता का पता लग जाने के बाद रोकना मुश्किल हो जाता है। यह कहानी भी यही पाठ हमें पढ़ाती है कि दूसरों की छत्र छाया या कंधों की जरूरत हमको नहीं है। हम खुद में उतने ही सक्षम है जितनी कि बाकी सब के साथ, जरूरत है तो बस इसको महसूस करने की। इस कहानी को फातिमा सना शेख ने अपनी अदाकारी से जीवित कर दिया है।
(⭐⭐⭐⭐)

BAAI :- निर्देशक हंसल मेहता की कहानी बाई हमें यह बताती है कि कुछ चीजों को समाज में इस तरह से निषेध घोषित कर दिया गया है कि अब वह चाहे कितनी भी पवित्र या शुद्ध भावना ही क्यों ना हो व्यक्ति उसको मानने से कतराते है और अपने आसपास के लोगों को भी इसके बारे में बताने में भय महसूस करता है। यह कहानी समलैंगिकता पर आधारित है और प्रतीक गांधी ने उस युवक जो इन परिस्थितियों से जूझ रहा है उसका किरदार बड़ी ही काबिलियत के साथ निभाया है और इसी के साथ रणवीर बरार की भी अदाकारी की शुरुआत बहुत ही पुख्ता तरीके से हुई है।
(⭐⭐⭐💫)

तो यह वह कहानियां हैं जिन्होंने कहीं ना कहीं मेरे मस्तिष्क पर अपना असर छोड़ा और सकारात्मकता की तरफ अग्रसर किया है।इसके अलावा भी इस सीरीज की बाकी तीन कहानियां भी बेशक देखने योग्य हैं और आपके सोच के खजाने में कुछ जोड़ कर ही जाने वाली हैं।
यदि आप मॉडर्न लव मुंबई देख चुके हैं तो अपने विचार मुझे बताइए और यदि नहीं तो देखकर जरूर बताइएगा।

The Fame Game !

⭐⭐⭐⭐ 4/5

निर्देशक : बिजॉय नांबियार, करिश्मा कोहली

लेखक : श्री राव

कलाकार : माधुरी दीक्षित, संजय कपूर, मानव कौल, राजश्री देशपांडे, मुस्कान जाफरी, सुहासिनी मुले, लक्षवीर सरन, गगन अरोड़ा

OTT : Netflix


तुम हुस्न परी तुम जाने जहां
तुम सबसे हसीन तुम सबसे जवां

अब आप सोच रहे होंगे कि यहां इन पंक्तियों का क्या अभिप्राय है तो यह पंक्तियां मैं प्रयोग कर रही हूँ सिर्फ और सिर्फ माधुरी दीक्षित के लिए। यह वह पंक्तियां हैं जो सीरीज को देखते समय अनायास ही मेरे मस्तिष्क में बार-बार आ रही थी। इससे आप अंदाजा तो लगा ही सकते हैं कि धक-धक गर्ल एक बार फिर से अपने इस OTT डेब्यू में लोगों को अपना दिल थाम कर रखने पर मजबूर कर देती हैं।
माधुरी दीक्षित अपने दशक की सबसे बेहतरीन, बहुचर्चित और बेहद खूबसूरत अदाकारा रही हैं और The Fame Game में भी वह इस बात को फिर से साबित करती हैं कि वह अपने समय में नंबर वन क्यों थी। किसी भी दृश्य के अंदर यदि माधुरी दीक्षित हैं तो वहां सभी लोग अपने आप ही नज़र आना कम हो जाते हैं, ऐसा कदापि नहीं है कि उन कलाकारों के अभिनय में कोई कमी है। किंतु माधुरी दीक्षित की अज़मत ही कुछ ऐसी है कि एक बार को उनके अलावा सब कुछ फीका फीका सा नज़र आने लगता है।
सीरीज की कहानी को श्री राव ने लिखा है, जिसको 45 to 50 मिनट्स के 8 अध्यायों में बांटा गया है। जिसका निर्देशन बिजॉय नांबियार और करिश्मा कोहली ने बहुत ही उम्दा तरीके से किया है। आपको इसके अंदर वह सभी मसाले देखने को मिलेंगे जिसकी वजह से b-town हमेशा सुर्खियों में रहता है किंतु थोड़े अलग फ्लेवर के साथ। तो जैसे कि आपको सीरीज के नाम और ट्रेलर से अंदाजा लग ही गया होगा कि कहानी एक फेमस हीरोइन के बारे में है, जो हैं अनामिका आनंद। उनका एक पति है, एक पुराना प्रेमी है, उनकी मां भी है, दो बच्चे भी हैं, एक पागल फैन भी है, तो कहने का तात्पर्य यह है कि सब तरफ से यह अभिनेत्री घिरी हुई है। अब उस पर इसका अपहरण भी हो जाता है, तो कहानी में पुलिस भी है। इसके अलावा इन सभी किरदारों की भी अपनी अपनी जंग है और अपना-अपना एक छुपाया या उलझा हुआ सा राज़ है। कुल मिलाकर यह सीरीज आपको अंत तक अपने अंदर पूरी तरह से उलझा कर रखेगी।
सीरीज की सबसे अच्छी और उम्दा बात यह है कि वह अनामिका आनंद से जुड़े हुए सभी किरदारों पर अपना पूरा ध्यान देती है ।किसी के साथ भी सौतेला व्यवहार नहीं करती। इसके चलते सीरीज थोड़ी धीमी जरूर प्रतीत होती है लेकिन सबको अपनी अदाकारी दिखाने का भरपूर मौका भी देती है।

क्यों देखनी चाहिए …
– माधुरी दीक्षित के फैन हैं तो
– Celebs की जिंदगी में दिलचस्पी रखते हैं तो
– आजकल की सीरीज से अलग मसाला चाहिए हो तो
– फिल्म को हिट कराने के पीछे के हथकंडे जानने हों तो
– मुस्कुराते चेहरों के पीछे रोते हुए दिलों की तड़प महसूस करनी हो तो

कुल मिलाकर बहुत सारी फिल्मों की झलक और उनके मसालों के साथ इस सीरीज को बनाया गया है, जो आपको कहीं कहीं कुछ देखी हुई चीजों की झलक दे सकती है किंतु फिर भी अपने नएपन को बरकरार रखते हुए अंत में आपको अपने क्लाइमेक्स के साथ थोड़ा चौंकाती भी है क्योंकि
सच के कई पहलू होते हैं और सभी को अपने हिस्से का सच ही सच लगता है।

Human :- without Humanity !

⭐⭐⭐💫 3.5/5

कलाकार  :- शेफाली शाह , कीर्ति कुल्हारी , राम कपूर , इंद्रनील सेनगुप्ता , आदित्य श्रीवास्तव , सीमा बिस्वास और विशाल जेठवा

लेखक  :- मोजेज सिंह और इशानी बनर्जी

निर्देशक  :- विपुल अमृतलाल शाह और मोजेज सिंह

ओटीटी  :- डिज्नी प्लस हॉटस्टार

अवधि  :- 7 to 8 hours

Human होने के लिए जो सबसे पहली शर्त है वह है Humanity का होना, जो कि धीरे-धीरे व्यक्ति विशेष में उसके अपने निजी कारणों से या फिर सामाजिक कारणों की वजह से कहीं ना कहीं विलुप्त सी होती जा रही है। डिजनी प्लस हॉटस्टार की नई सीरीज Human इसी अमानवता भरे वातावरण को, हम सभी लोगों के समक्ष अपने ढंग से प्रस्तुत करती है। यह एक मेडिकल थ्रिलर है, जो डॉक्टर्स और फार्मा कंपनियों का एक नया और खौफनाक पहलू उजागर करती है।  कैसे कुछ लोगों की महत्वाकांक्षा, उनकी सनक बाकी लोगों की जिंदगियों को दांव पर लगा देती है।

वेब सीरीज Human की कहानी हमारे लिए नई है, इसलिए ताजी भी लगती है।  कहानी भोपाल में शुरू होती है, जहां भोपाल गैस कांड (1984)के निशान अभी तक पूरी तरह से गए नहीं हैं और लोग अभी भी उस कांड की वजह से कई बीमारियों से ग्रस्त हैं। जैसे कि हम सब जानते हैं कि कोई भी दवा बाजार में आने से पूर्व कई तरह के प्रयोगों से गुजरती है तब जा कर कहीं बाजार में उतारी जाती है।तो यहां दिखाया गया है कि कैसे दवाओं के ट्रायल को लेकर कंपनियां और डॉक्टर्स मिलकर इसको अपने फायदे के लिए उपयोग कर रहे हैं और गरीब लोगों की जिंदगियों के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है।

कहानी दो डॉक्टर्स के इर्द-गिर्द घूमती है। भोपाल के एक बड़े अस्पताल मंथन की सर्वज्ञाता डॉक्टर गौरी नाथ (शेफाली शाह) और उसी अस्पताल की एक नई डॉक्टर, डॉक्टर सायरा सभरवाल (कीर्ति कुल्हारी)। इन्हीं की जिंदगियों को केंद्र में रखकर दवा ट्रायल्स के नाम पर हो रहे अमानवीय व्यवहार की संरचना को प्रदर्शित किया गया है। कैंपों में गरीब लोगों को बिना बताए उन पर दवा का प्रयोग किया जा रहा है। इंसानों को भी गिनी पिग्स की श्रंखला में ही रख कर उनको भी ट्रायल का अंग बना लिया गया है। पीड़ितों को ना तो मुआवजा दिलाने वाला है कोई और ना ही न्याय।

सभी किरदारों को ग्रे शेड में दिखाया गया है कोई भी पूर्ण रूप से सही नहीं है और सभी किरदारों की अपनी अपनी एक वजह या कहानी है उनका इस तरह का होने की, लेकिन सच यह भी है कि…

जिंदगी सब के साथ सुखद नहीं होती लेकिन जरूरी तो नहीं ना सब खारे ही हो जाएं।

Human के अंदर, मुख्य कहानी के अलावा और भी छोटी-छोटी हर किरदार की अपनी एक कहानी भी है, जो ऐसा प्रदर्शित करती है कि एक साथ बहुत कुछ चल रहा है और जो कभी-कभी हमें मुख्य कहानी से भटका देता है और series को लंबा और धीमा बना देती है। Human की कहानी और किरदारों को ध्यान से देखो तो लगता है, इनको काफी सोच कर और गहराई के साथ लिखा गया है, गूढता पर कार्य किया गया है। किरदारों की बात करें तो शेफाली शाह का किरदार वह स्तंभ है जिस पर पूरी कहानी टिकी हुई है, बाकी सब किरदार इन्हीं के आसपास रचित हैं। यहां मैं एक बात जो विशेष रूप से अंकित करना चाहूंगी वह है, शेफाली शाह की अदाकारी और जो कुछ वह अपनी आंखों के जरिए बयां करती हैं, वहां शब्द और संवादों की जरूरत ही नहीं होती है। गौरी नाथ का किरदार उनसे बेहतर कोई कर ही नहीं सकता था। इसी के साथ नाम आता है, विशाल जेठवा का, आपको series देखते समय एक बार भी एहसास नहीं होगा कि वह acting कर रहे हैं, बहुत ही सहजता के साथ किरदार को निभाया है। अब बात करते हैं कीर्ति कुल्हारी की, एक बार फिर से ईमानदारी के साथ अपना कार्य करती नजर आती हैं।

कुल मिलाकर मोजेज सिंह और इशानी बनर्जी ने एक नई तरह की कहानी को लिखा है जो मेडिकल जगत के एक स्याह पहलू को सामने लाता है जिसको एक बार जरूर देखा जाना चाहिए।इसको देखने के लिए धैर्य और संवेदना दोनों की आवश्यकता है, कहने का तात्पर्य है उपयुक्त समय लेकर देखिएगा।

Candy :- Unwrap the sin…

कलाकार :- रॉनित रॉय, रिचा चड्ढा, मनु ऋषि चड्ढा,
नकुल रोशन सहदेव, गोपाल दत्त और रिद्धि कुमार ।।
निर्देशक :-  आशीष आर शुक्ल
प्रस्तुतकर्ता :- Voot Select
⭐⭐⭐⭐


“लोग जितना दिखाते हैं,
उससे कहीं ज्यादा वह अपने अंदर छुपा कर रखते हैं।”
यही voot select की नई series “Candy” हमको दिखाती है, जैसे कि उसके नाम में ही है “Unwrap The Sin”
हर व्यक्ति जो कुछ भी होता है या बनता है उसका बहुत गहरा संबंध उसके अतीत से जुड़ा होता है और अतीत हमेशा सुखद नहीं होता। कुछ लोग उसको अपना अतीत समझ कर भूल जाते हैं और अपने वर्तमान को बेहतर बनाते हैं और कुछ अपने वर्तमान पर भी उस अतीत के छिटों को आने देते हैं। Candy भी उसी तरह की कहानी है जहां लोगों का अतीत उनके वर्तमान का हाथ पकड़ कर चल रहा है।


Voot select की इस Candy का स्वाद काफी दिन तक आपके जेहन में रहने वाला है। इसमें आपको वह सब मिलेगा जो एक सस्पेंस थ्रिलर को यादगार बनाता है।
– यह सीरीज आपको शुरू से अंत तक अपने साथ पूर्ण रूप से जोड़ कर रखती है।
– कहानी का कसाव मस्तिष्क से किसी भी एपिसोड में ढीला महसूस नहीं होता है।
– किरदारों को सीमित रखा गया है जिसकी वजह से कोई भी किरदार अतिरिक्त नहीं लगता है।
– सबसे अहम और महत्वपूर्ण बात जो कि इस सीरीज के अनुभव को और भी दिलचस्प बनाती है वह है सस्पेंस के अंदर सस्पेंस देखने को मिलना।

कहानी की बात करें तो, कहानी एक रूद्रकुंड नाम की जगह की है। जो पहाड़ों पर एक खूबसूरत सा गांव है, यहीं पर एक बोर्डिंग स्कूल भी है। जहां के बच्चों को कैंडी की लत्त है और यह कोई आम कैंडी भी नहीं है, यह है नशे की कैंडी तो कहने का तात्पर्य है कि इन बच्चों को नशे की लत्त है। अब यह तो हुई एक बात, इसी के साथ यहां कुछ मडर्स भी आए दिन होते रहते हैं। जिनका पता अभी तक नहीं लग पा रहा है कि इसकी वजह क्या है। अब इसी के साथ पहाड़ों में एक और दंतकथा विराजमान है जो है “मसाण” की। लोगों को लगता है कि यह सब मर्डर मसाण की वजह से हो रहे हैं। कहानी बस इतनी सी ही है लेकिन जिस तरह से इस कहानी को व्यक्त किया गया है वह बहुत ही उम्दा है।
कभी-कभी चीजों को उसका काबिल ए बयां भी दिलचस्प बना देता है और यहां भी कुछ ऐसा ही हुआ है। कहानी अच्छी है और जैसे बयां की गई है वह और भी बेहतरीन हो गई है।
निर्देशक आशीष आर शुक्ल एक बार फिर खेल गए हैं और उन्होंने बॉल को पूरी तरह से हवा में उछाल दिया है अब छक्का ना भी लगा तो, चौका तो कोई भी नहीं रोक सकता है।
अदाकारी की बात करें तो सबसे ज्यादा आपको जो प्रभावित करने वाले हैं, वह नाम है नकुल रोशन सहदेव। इनकी अदाकारी कुछ उस दर्जे की है कि आप उनके ऊपर से अपनी नजरें नहीं हटा पाएंगे। इसके बाद जो नाम आता है, वह है रिद्धि कुमार, इन्होंने भी अपनी उपस्थिति काफी पुख्ता तौर पर दर्ज कराई है। अब बात करते हैं, रॉनित रॉय, रिचा चड्ढा और मनु ऋषि चड्ढा की, बिल्कुल वही कार्य किया है जिसके लिए इनको जाना जाता है।
एकदम उम्दा और अपने किरदारों के अनुरूप।

तो कुल मिलाकर एक बेहतरीन सीरीज का आगमन हुआ है। इसका सस्पेंस आपको अपने में उलझा कर रखेगा और सुलझने के बाद भी आपके मुंह का और ज़हन का जायका बिल्कुल भी खराब नहीं होने देगा।
मेरी तरफ से यह सीरीज बिल्कुल देखे जाने योग्य है।

ग्रहण : सत्य व्यास की “चौरासी” ।

कलाकार :- जोया हुसैन, अंशुमान पुष्कर, वामीका गब्बी, सहीदुर रहमान और पवन मल्होत्रा आदि ।

निर्देशक :- रंजन चंदेल

प्रस्तुतकर्ता :- Disney Plus Hotstar ⭐⭐⭐⭐

इस कदर मैंने सुलगते हुए घर देखे हैं । अब तो चुभने लगे आंखों में उजाले मुझको ।। “कामिल बहज़दी”

कुछ लोगों ने ऐसी जिंदगी जी और ऐसी दास्तानें देखी होती हैं जिनके सिर्फ कल्पना मात्र से हमारा शरीर नम हो जाता है। उसी तरह की एक भयानक दास्तान को डिज्नी प्लस हॉटस्टार की सीरीज अपने अंदर समेटे हुए आपके समक्ष प्रस्तुत करती है।

“ग्रहण”, सत्य व्यास जी के उपन्यास “चौरासी” पर आधारित है और 1984 में हुए सिख दंगों की कहानी को अपने तरीके से बयां करती है।

मनुष्य सबसे ज्यादा घातक और खतरनाक तब होता है जब वह किसी भी तरह की कुंठा से ग्रस्त होता है,चाहे वो उसका गरीब होना हो, किसी से ईर्ष्या या द्वेष की भावना हो या फिर अपने आप को किसी भी तरह से निम्न समझना हो। किसी भी कुंठा से ग्रस्त होने पर आप नकारात्मकता की तरफ आसानी से चले जाते हैं और किसी के भड़काने पर कुछ भी कर जाते हो, अपने आपको उस कुंठा से मुक्त करने के लिए। और यही इस तरह के सांप्रदायिक दंगों की मुख्य नींव होती है। 1984 में जो सिख दंगे हुए वह इसका मुख्य उदाहरण है।

निर्देशक रंजन चंदेल की ग्रहण की कहानी शुरू होती है एक जर्नलिस्ट की हत्या से, 2016 में किंतु उसके तार 1984 के सिख दंगों से जुड़े होते हैं। ग्रहण 2016 और 1984 को एक साथ लेकर चलती है और इन दोनों को एक साथ जोड़ने का सूत्र पिरोती हैं सीरीज की नायिका अमृता सिंह (जोया हुसैन) । अमृता सिंह रांची की एसपी हैं और दो राजनीतिक दलों के बीच में मुख्यमंत्री बनने और चुनाव जीतने की जंग के चलते बोकारो में हुए 1984 के सिख दंगों की जांच का कार्य शुरू होता है और उसकी बागडोर अमृता सिंह के हाथ में आती है। जब कहानी आगे की तरफ रुख करती है तो इन दंगों से अमृता सिंह के खुद के भी निजी तार जुड़े होते हैं, उन्हीं को सुलझाना और सच को सबके सामने लाना ही अमृता सिंह का उद्देश्य है।

अगर आपने पुराने जमाने वाला प्यार कभी भी जिया है या सच में देखना चाहते हैं तो आपको सीरीज के एक प्रेमी जोड़े से सच में प्यार हो जाएगा, वह है लेखक सत्य व्यास जी के बुने दो किरदार ऋषि (अंशुमन पुष्कर) और मनु(वामीका गब्बी)। आपको उनकी कहानी को सच में जीने का मन करेगा और वह आपको अपनी उस दुनिया का हिस्सा बना लेंगे। इन दोनों किरदारों को देखकर आपको सत्य व्यास जी की चौरासी पढ़ने की उत्सुकता और भी बलवती हो जाएगी क्योंकि मेरे साथ यही हुआ है।

ग्रहण की कहानी 2016 और 1984 को एक साथ लेकर चलती है और सही निर्देशन और कमलजीत सिंह के सधे हुए कैमरा वर्क के चलते दोनों वक्त बखूबी निखर कर पर्दे पर आए हैं और आपको वह अंतर साफ तौर पर नजर आएगा। इस दंगे भरे माहौल में जो एक ठंडी बयार का काम करता है, वह है अमित त्रिवेदी का संगीत जब ऋषि और मनु पर्दे पर होते हैं और पीछे का संगीत, मानो ऐसा लगता है वक्त कुछ समय के लिए वहीं थम सा गया है। बड़ा ही सुकून देता है।

ग्रहण में देखने योग्य बहुत कुछ है …

  • एक अच्छा विषय जो ताजगी से भरा हुआ लगता है।
  • एक मजबूत कहानी जो उस वक्त को जीवित करती है।
  • अव्वल दर्जे का अभिनय जो सब कुछ सहज बना देता है।
  • कलाकारों का चयन जो किरदारों के अनुरूप है।
  • बेहतरीन निर्देशन और कैमरा वर्क।

ग्रहण के कमजोर पक्ष पर आए तो थोड़ा अवधि खटक जाती है। जिसकी वजह से कहानी थोड़ी खींची खींची और कमजोर लगने लगती है। यहां मेकर्स को यह ध्यान देना आवश्यक था की कहानी उतनी ही बढ़ाई जाए जितनी उसकी कसावट आपको इजाजत दे। बाकी एक अच्छा विषय है और यह सीरीज हिंदी लेखकों का OTT के मंच पर स्वागत करती है और यह दर्शाती है कि अच्छे विषय और अच्छा साहित्य आपके आसपास ही होता है और है भी, बस जरूरत है तो सही और पारखी नजरों की।

My Take

  • सत्य व्यास जी के उपन्यास चौरासी को पढ़ना आवश्यक हो जाता है।
  • जोया हुसैन, अंशुमन पुष्कर, और वामीका गब्बी अतिरिक्त प्रशंसा के हकदार हैं।

The Family Man Season 2

The Family Man Season 2 सीरीज समीक्षा

निर्देशक  –  राज निदिमोरू, कृष्णा डीके, सुपर्ण वर्मा।

कलाकार  –  मनोज बाजपेई, समांथा अक्कीनेनी, शारिब हाशमी, प्रियामणि, सीमा बिस्वास, दलिप ताहिल, विपिन शर्मा, श्री कृष्ण दयाल, सनी हिंदूजा, शरद केलकर और राजेश बालाचंद्रन आदि

प्रस्तुतकर्ता    Amazon prime video
⭐⭐⭐💫 3.5/5



The Family Man Season 2 जिसका इंतजार अब 20 महीनों बाद खत्म हो चुका है और जिस जगह पर सीजन 1 का अंत हुआ था वहां से सीजन 2 के लिए विकलता एक सामान्य सी बात थी। श्रीकांत तिवारी अब आगे क्या करने वाला है दिल्ली को गैस अटैक से बचाने के बाद यह जानने के लिए सब लोग बहुत उत्सुक थे तो फिर अपने सवालों पर विराम चिन्ह लगा लीजिए। और हां, इस सीजन में आपको तेलुगू सुपरस्टार समांथा अक्कीनेनी भी नजर आएंगी जो अपना हिंदी डेब्यु इसी के साथ कर रही हैं।

कहानी की बात करें तो इस बार कहानी में बहुत सारे घुमाव नहीं हैं। सीरीज आपसे क्या कहना चाहती हैं इसका अंदाजा आपको शुरू की 3 कड़ियों के अंदर ही लग जाएगा। उसके उपरांत की कड़ियों (6) में किस तरह योजना को अंजाम तक पहुंचाया जाए, यह दिखाया गया है।


पिछली बार की तरह इस बार भी मनोज बाजपेई, फैमिली मैन की जान है और वह अपने उत्तरदायित्व को निभाना बखूबी जानते हैं और इसीलिए शायद हमेशा ख़रे भी उतरते हैं। उनका हास्य-विनोद और अनूठा अंदाज श्रीकांत के किरदार में जान डाल देता है और जेके(शारिब हाशमी) के साथ उनका तालमेल पिछली बार की तरह ही सीजन का स्तर बढ़ाते हैं। इनकी केमिस्ट्री बहुत स्वभाविक और वास्तविक लगती है। इस बार कहानी के तार श्रीलंका से भी जोड़े गए हैं, जिसके चलते तेलुगू सुपरस्टार समांथा अक्कीनेनी का अभिनय भी आपको देखने को मिलेगा जो कि काफी सटीक और सशक्त है और कहानी की मांग के अनुसार भी है। इस बार श्रीकांत के निजी जीवन पर काफी ध्यान केंद्रित किया गया है और उनका भरसक प्रयत्न भी दिखाया गया है अपनी निजी जिंदगी को सही सांचे में लाने का लेकिन हिंदुस्तानी पति कितना भी कुछ कर ले,कहीं ना कहीं तो चूक ही जाता है 🙂।


निर्देशन पिछली बार की तरह ही अच्छा है और प्रभावित भी करता है किंतु पटकथा में पिछली बार वाली सनसनी नहीं दिखती है। “अब क्या होगा… अब क्या होगा” वाली उत्सुकता का अभाव है जो कहीं ना कहीं खटकता है। कहने का तात्पर्य यह है कि आप अंदाजा लगा सकते हैं कि आगे क्या और कैसे होने वाला है। शुरुआत में सीरीज की रफ्तार भी धीमी है जो अंत आते आते अपनी गति ले लेती है।

एक बात जो आजकल आने वाली ज्यादातर सीरीज में देखने योग्य मिल रहा है, वह है उपयुक्त पात्र-निर्धारण( casting) और कलाकारों का अभिनय। जिसने OTT पर आने वाली सभी सीरीज का स्तर काफी ऊपर उठा दिया है। यहां भी इस कार्य को बखूबी अंजाम दिया गया है और सभी कलाकारों ने अपना कार्य पूर्ण लगन से किया है।
कुल मिलाकर एक देखने योग्य The Family Man Season 2 आपके सामने प्रस्तुत किया गया है, तो बिना किसी देर के आप अपना Weekend इस के साथ गुजार सकते हैं। वैसे मुझे पता है आप ये ही कर रहे होंगे 🙂।

Trivia (something interesting)

– लॉकडाउन के चलते सिर्फ २ दिन की shooting के लिए 9 महीने का इंतजार बढ़ गया ।
– सुपर्ण वर्मा का भी निर्देशन शामिल।

Maharani : साहेब की सरकार बीवी के हाथ में !!!

महारानी सीरीज समीक्षा

निर्देशक  –  करण शर्मा
कलाकार  –  हुमा कुरैशी, सोहम शाह, अमित सियाल, प्रमोद पाठक, अतुल तिवारी और कनी कुश्रुति …
प्रस्तुतकर्ता    SonyLIV
⭐⭐⭐⭐


” कोयले की दलाली में हाथ काले “

अब आप कोयले के व्यापार में हों और आपके हाथ काले ना हों यह तो नामुमकिन सी बात है। अब राजनीति भी कोयले की दलाली स्वरूप कार्य ही है अगर आप उस में उतरे हैं तो जितनी बड़ी आपकी महत्वाकांक्षा होगी उतने ही अधिक अपयश के छींटे आपके दामन पर आएंगे।

बीते शुक्रवार (28 मई) को सोनी लिव पर एक नया सियासी ड्रामा आया है महारानी ,यह उसी की प्रस्तावना थी।

महारानी कहानी है, बिहार की राजनीति की।बिहार की राजनीति और वह भी 90 के दशक की। जी हां, आप जो सोच रहे हैं कहानी वहीं से प्रेरित है किंतु कहानी उनकी नहीं है। बिहार की राजनीति में सबसे बड़ा बदलाव 90 के दशक में ही आया था। महारानी उसी बदलाव को और जातीय समीकरण की राजनीति को अपने ढंग में प्रस्तुत करती है।

राजनीति अपने आप में एक उलझा हुआ और दांवपेच से भरा हुआ विषय है और इससे जुड़ी हुई कोई भी सीरीज या फिल्म यदि सही ढंग से और पूर्ण सतर्कता से बनाई गई हो तो वह अपने आप ही दिलचस्प हो जाती है।

महारानी की कहानी की बात करें तो जैसे इसके नाम से ही प्रतीत हो जाता है कि नारी चरित्र को केंद्र में रखा गया है। कहानी केंद्रित तो रानी भारती के ऊपर ही है किंतु बाकी राजनीतिक पक्षों और किरदारों का समीकरण भी काफी घुमावदार और देखने योग्य है।बिहार के मुख्यमंत्री भीमा भारती के ऊपर जानलेवा हमला होता है जिसके चलते वह अपनी सत्ता को बचाने के लिए अपनी चौथी पास पत्नी को मुख्यमंत्री बना देते हैं, यह सोच कर कि वह कागजी मुख्यमंत्री बनीं रहेंगी और बाकी राजनीति हम चलाएंगे किंतु परेशानी तब होती है जब यह गूंगी गुड़िया बोलने और अपने फैसले लेने लग जाती है। वहीं दूसरी तरफ विपक्ष के नेता नवीन कुमार, जो कि भूतपूर्व मुख्यमंत्री के पुराने मित्र हैं और उनकी पार्टी के युवा नेता भी रह चुके हैं,  इस नई साहिब – बीवी सरकार को गिराने की पूरी कोशिश में हैं और हर यथासंभव प्रयास भी कर रहे हैं। 90 के दशक की बिहार की राजनीति की मुख्य घटनाओं को भी दर्शाया गया है ,जिसमें चारा घोटाला और लक्ष्मणपुर व बाथे नरसंहार शामिल है।

महारानी में देखने योग्य क्या है ??

  • निर्देशन काफी उम्दा है और प्रस्तुत करने का ढंग भी रुचिकर है।
  • कहानी को यथार्थवादी रखा गया है और प्रस्तुतीकरण भी वैसा ही है।
  • किरदारों का चयन काफी सटीक और न्याय पूर्ण है।
  • सभी किरदारों को मात्रा अनुसार प्रयोग किया गया है जोकि प्रशंसनीय है।
  • सभी कलाकारों का अभिनय सीरीज की सबसे मजबूत कड़ी है।

महारानी में जो सबसे ज्यादा खटकता है, वह है इसकी अवधि जो कुल मिलाकर 450 मिनट बनती है। जो 10 कड़ियों में विभाजित है, इसकी वजह से सीरीज काफी धीरे धीरे चलती हुई प्रतीत होती है। संभवत: 2 कड़ियां तो आराम से कम हो सकती थी।

अभिनय की बात करें तो सभी कलाकारों ने अपना कार्य बहुत ही बारीकी और ईमानदारी से किया है और सभी प्रशंसा के पात्र भी हैं किंतु फिर भी यह 4 नाम मेरे अनुसार अधिक प्रशंसा के योग्य हैं।

हुमा कुरैशी,सोहम शाह,अमित सियाल,कनी कुश्रुति

यदि आप लोगों की रुचि राजनीति में है और आप उसके दांवपेच को समझना और देखना पसंद करते हैं तो यह सीरीज आप ही के लिए है। यह आपके दिमाग को थोड़े समय के लिए काम पर लगा सकती है और आप इसको देखना काफी पसंद भी करेंगें।

तो फिर देखिए और आपको यह सीरीज कैसी लगी वह कमेंट बॉक्स में बताइए 😊😊।

तांडव :- एक सियासी खेल ।।।

निर्देशक – अली अब्बास ज़फ़र
कलाकार- सैफ अली खान, डिंपल कपाड़िया, मोहम्मद जीशान अयूब, सुनील ग्रोवर, कृतिका कामरा, कुमुद मिश्रा, तिग्मांशु धूलिया, सारा जेन डायस, गौहर खान
एपिसोड संख्या – 9 (35 to 40mis/-)
प्रस्तुतकर्ता- Amazon prime video

⭐⭐⭐ / 5

“सही और गलत के बीच में जो चीज आकर खड़ी हो जाती है उसे राजनीति कहते हैं”
उसी तरह अच्छी और बहुत अच्छी के बीच के फर्क को साफ तौर पर जो दर्शाती है उसे कहते हैं तांडव सीरीज..
तांडव सीरीज जब शुरू होती है तो आपको ऐसा लगेगा कि एक बहुत ही बेहतरीन और बारीकी सेेेे बुना हुआ राजनीतिक थ्रिलर आपके समक्ष प्रस्तुत किया जाा रहा है जो अपनी पकड़़ आपके मस्तिष्क पर धीरे धीरे मजबूत करता जाएगा, क्योंकि किरदारों का चयन काफी दिलचस्प है और हर एक किरदार एक दूसरे से जिस प्रकार से जुड़ा हुआ है वह आपकी जिज्ञासा को हवा देनेे के ढंग से ही रचा गया है।

तांडव में आपको वह सभी घटक उपस्थित मिलेंगे जो आपको किसी भी बेहतरीन रचनात्मक सृजन के लिए चाहिए होते हैं किंतु किसी भी उत्तम व्यंजन के लिए सभी मसालों को सही अनुपात में प्रयोग मेंं लाना ही एक अभिष्ट कला होती है और इसी कला का सही उपयोग करने से निर्देशक अली अब्बास ज़फ़र थोड़ा सा चूक गए हैैं।

तो यहां यह कहना कदापि गलत नहीं होगा कि
” नाम बड़े और दर्शन छोटे”
तांडव एक सियासी ड्रामा है। जिसमें यह दिखाया गया है कि अपनी सत्ता को बनाए रखने के लिए आपका कुछ भी कर जाना या किसी भी हद तक चले जाना नाजायज नहीं है। झूठ को किस तरह से झाड़ पोछ़ कर सफेद लबादे में जनता के सामने प्रस्तुत किया जा सकता है, वह तांडव आपको बताएगा। साम दाम दंड भेद की राजनीति और यही है असली राजनीति भी शायद।
कहानी की बात करें तो एक राजनीतिक पार्टी और परिवार की कहानी है। जो देवकी नंदन (तिग्मांशु धूलिया) से शुरू होती है। जिसकी पार्टी जनता लोक दल देश की सबसे मजबूत पार्टी है। और इस बार भी चुनाव में सफलता प्राप्त करने वाली है। जिसके चलते देवकी नंदन एक बार फिर प्रधानमंत्री बनने वाले हैं किंतु नतीजों से पूर्व ही उनकी मृत्यु हो जाती है। और फिर शुरू होता है राजनीतिक दांवपेच का खेल… कि अगला पी एम कौन बनेगा, पुत्र समर प्रताप (सैफ अली खान), पार्टी प्रमुख अनुराधा किशोर(डिंपल कपाड़िया) या फिर पार्टी के वरिष्ठ नेता गोपाल दास मुंशी(कुमुद मिश्रा)। इसी के साथ प्रवेश होता है छात्र राजनीति का जिसके चलते छात्र नेता शिव शेखर(मोहम्मद जीशान अयूब) और छात्र राजनीती का मुख्यधारा की राजनीति से जुड़ाव का। यह सब देखना काफी दिलचस्प भी है। सीरीज में छात्र राजनीति, मुख्यधारा की राजनीति, किसान आंदोलन, मीडिया की भूमिका मौजूदा राजनीति में, सब कुछ है और यह सब किस तरह से कार्य करता है उसकी भी झलक है किंतु सीरीज का climax उस की कमजोर कड़ी है। जिसके चलते अंत में एक अधूरेपन का स्वाद आता है।
अभिनय की बात करें तो सुनील ग्रोवर और सैफ अली खान के किरदारों ने पूर्ण अधिपत्य स्थापित किया हुआ है और वह आपको अपने अभिनय से पूर्ण रूप से विस्मित भी करेंगे और इसी कड़ी को आगे बढ़ाने का कार्य मोहम्मद जीशान अयूब ने भी किया है। किरदारों का चित्रण, लेखन और उनका चयन ही सीरीज की सबसे मजबूत कड़ी है और जिसके चलते आप सभी को यह सीरीज अवश्य देखनी चाहिए और अपनी प्रतिक्रिया को मुझ तक पहुंचाना भी चाहिए।

SCAM 1992- The Harshad Mehta Story !

SCAM 1992 The Harshad Mehta Story वेब सीरीज समीक्षा

⭐⭐⭐⭐/ 5*

  • शैली (Genre) बायोपिक ड्रामा
  • द्वारा निर्देशित (Directed by) हंसल मेहता
  • भाषा (Language) हिंदी
  • एपिसोड संख्या 10 ( 50 to 55 mins/-)

जब किसी कार्य को पूरी श्रद्धा और कड़ी मेहनत के साथ किया जाए और उसका परिणाम उम्दा ना आए, यह तो संभव ही नहीं होता और ‘स्कैम 1992’  निर्देशक हंसल मेहता कि कड़ी मेहनत और उसको बनाने की निष्कपट श्रद्धा का जीवंत उदाहरण स्वरूप सोनी लिव पर गत सप्ताह प्रसारित किया गया है।’स्कैम 1992′ कहानी है हर्षद मेहता की। पहली बात अगर आप हर्षद मेहता को नहीं जानते तो आप इस सीरीज के अंत तक इस विषय में पारंगत हो जाएंगे और अगर जानते हैं तो यह सीरीज आपके उस ज्ञान में बढ़ोतरी कर देगी।

  • RISK है तो ISHQ है।
  • EMOTION में इंसान हमेशा गलती करता है।
  • SUCCESS क्या है ?? FAILURE के बाद का नया CHAPTER ।
  • देखो मैं CIGARETTE नहीं पीता पर जेब में LIGHTER जरूर रखता हूं, धमाका करने के लिए।
  • जब जेब में MONEY हो तो कुंडली में शनि होने से कुछ फर्क नहीं पड़ता।

इन डायलॉग के द्वारा आपको ज्ञात हो जाएगा कि हर्षद मेहता को शेयर मार्केट का अमिताभ बच्चन क्यों कहा जाता था।
आप जैसा सोचते हैं, वैसा ही बनते हैं। ‘
यह कहावत हर्षद मेहता के ऊपर पूर्ण रूप से खरी उतरती है। उन्होंने जो चाहा, जैसे चाहा, वैसा किया और वैसा जिया भी लेकिन जिस तरह शिखर पर पहुंचने के उपरांत धरातल पर ही आना पड़ता है, वहीं कुछ हर्षद मेहता के साथ भी हुआ।
इस सीरीज के जरिए आप हर्षद मेहता की जिंदगी के उतार-चढ़ाव के साथ साथ शेयर मार्केट की गणित को भी बखूबी समझ पाएंगे। निर्देशक हंसल मेहता ने हर एक बारीकी का ध्यान रखा है। जिससे किसी भी तरह की गलती की संभावना समाप्त ही हो गई है, चाहे वह…

  • हर्षद मेहता के स्वभाव और उनकी सोच को पर्दे पर उतारना हो।
  • उनके परिवार की मनोदशा का वर्णन करना हो।
  • शेयर मार्केट किस तरह से कार्य करता है या कैसे संचालित किया जाता है अर्थात उसकी कार्यप्रणाली के बारे में हो।
  • 90 के दशक को पर्दे पर किस प्रकार जीवंत किया जाए।
  • भाषा को सरल रखते हुए दर्शकों पर किस तरह पकड़ स्थापित की जाए।

‘ स्कैम 1992’ में जिस स्कैम के बारे में बात हुई है, वह है 500 करोड़़ का बैंक फ्रॉड और यह कैसे हर्षद मेहता के साथ-साथ उस समय के दिग्गजों को भी अपने लपेटे में ले लेता है। यह सीरीज देवाशीष बसु व सुचेता दलाल की किताब ‘ द स्कैम ‘ से प्रेरित है।
अभिनय की बात करें तो हर किरदार इतना प्रभावशाली और सहज है कि आपको प्रतीत होगा कि आप कोई डॉक्यूमेंट्री देख रहे हैं। जिसमें मुख्य किरदार निभाने वाले प्रतीक गांधी और श्रेया धनवंतरी काबिले तारीफ है। उनको देखकर आपको आभास भी नहीं होता है कि वह अभिनय कर रहे हैं। यह सीरीज मेरी 2020 की अब तक की देखी हुई  सीरीजों में ‘असुर ‘ के बाद सबसे उम्दा है और निस्संदेह देखने योग्य है।

नोट :- प्रतीक गांधी का अभिनय इस सीरीज को चार चांद लगाता है ।

Breathe: into the Shadows

Breathe: into the Shadows वेब सीरीज समीक्षा
3.5* / 5*
  • शैली (Genre) सस्पेंस ड्रामा
  • द्वारा निर्देशित (Directed by) मयंक शर्मा
  • अभिनीत (Starring) अभिषेक बच्चन, अमित साध, नित्या मेनन
  • भाषा (Language) हिंदी
  • एपिसोड संख्या 12 ( 45 to 50 mins/-)
Breathe: into the Shadows आपको एक ऐसी कहानी की दुनिया में ले जाता है जहांं हर लम्हा आप अपनी breath पर काबू पाने में लगे रहते हैं। निर्देशक मयंक शर्मा ने जिस अनूठे ढंग से इस सीरीज में कहानी को प्रस्तुत किया है वह काबिले तारीफ है। उन्होंने एक अलग स्तर अन्य निर्देशकों के लिए तैयार कर दिया है। इस सीरीज की पकड़ आपके दिमाग पर इस कदर असर करती है कि आप कहानी से और उसके किरदारों से अपनेेे आपको पूर्ण रूप से जुड़ा हुआ महसूस करते हैं और उन्हीं की तरह सोचने का प्रयत्न करना शुरू कर देते हैं। इसका सारा श्रेय कहानी लिखने वालों को और उसको प्रस्तुत करनेे वालों को जाता है।
Breathe: into the Shadows यह बताता है कि एक परिवार अपने बच्चेे को बचानेेे के लिए किस हद तक जा सकता है और किसी की जान लेने से भी परहेज नहीं करता है। अब ये कहां तक सही है ये तो सब के खुद के विवेक पर निर्भर करता है।
ये कहानी है दिल्ली के अविनाश सभरवाल (अभिषेक बच्चन) जो कि एक साइकैटरिस्ट है और उनके परिवार की। उनके परिवार में पत्नी आभा (नित्या मेनन) और 6 वर्ष कि सिया (इवाना कौर) हैं। यह एक संपूर्ण रूप से खुश परिवार है। कहानी में मोड़ तब आता है जब 6 वर्ष की सिया का अपहरण हो जाता है और अविनाश को सिया को बचाने के लिए अपहरणकर्ता कुछ लोगों को मारने के लिए कहता है। इसी बीच कहानी में प्रवेश होता है एक और हीरो कबीर सावंत (अमित साध) का, उनको क्राइम ब्रांच ने इस केस को सुलझाने मेंं लगाया है। सीरीज में बहुत ही जिज्ञासु तरीके से रावण के 10 सिरों को इन हत्याओं से संलग्न किया गया है, जो कि कहानी को और भी रोमांचक बनाता है। अब प्रश्न आतेे हैं
  • सिया का अपहरण किसने किया ?
  • अविनाश अपहरणकर्ता के कहने पर हत्याएं
    करेगा कि नहीं ?
  • कबीर सावंत इस श्रंखला को तोड़ पाएंगे या नहीं ?
  • इस श्रंखला के पीछे रावण के 10 सिरों का क्या संबंध है ?
इन सभी प्रश्नों के उत्तर के लिए आपको सीरीज को देखना पड़ेगा 🙂
अभिनय :-
  • अभिषेक बच्चन :- एक सधा हुआ बेहतरीन अभिनय का प्रदर्शन उन्होंने यहां किया है। वह उस बेचारे पिता को पर्दे पर उतारते हैं जो असहाय है, डरा हुआ है और वह अपने अभिनय के द्वारा आपको उस पिता की भावनाओं से जोड़ देते हैं। जो लोग उनके अभिनय क्षमता को कम आंकते हैं, उनको यह सीरीज अवश्य देखनी चाहिए।
  • अमित साध :- कम शब्दों में या कह सकते है कि बिना कुछ बोले हुए भी जो अपनी बात दूसरों तक पहुंचा दे, इस हुनर को अगर आप देखना चाहते हैं तो आप अमित साध का अभिनय यहां देख सकते हैं। उन्होंने आंखों और चेहरे के हाव भाव से जो खेला है वह प्रशंसा योग्य है। लड़कियां उनकी कायल हुए बिना नहीं रह पाएंगी।
  • नित्या मेनन :- जैसा कि हम सब जानते हैं की नित्या एक बेहतरीन अदाकारा है, तो यहां भी उन्होंने ये साबित किया है और उस मां को बखूबी पर्दे पर उतारा है जिसका बच्चा उससे दूर हो गया है।
सायमी खेर, श्रुति बापना, रेशम श्रीवर्धन, हरिशिकेह जोशी, श्रीकांत वर्मा, प्लाबिता बॉर्थकुर और इवाना कौर ये वो नाम है जिनको आप नजर-अंदाज नहींं कर सकते और जब यह लोग पर्दे पर होते हैं तो भी आप अपनी आंखों को उन पर से नहीं हटा सकते। हर एक व्यक्ति अपने किरदार में जान डाल देता है।
कुल मिलाकर अमेजॉन प्राइम ऐसी सीरीज लेकर आया है जिसकी पकड़ दर्शकों पर अच्छी है और जो उनके दिमाग को काम पर लगा सकता है। वह भी साथ में हर कड़ी को सुलझाने और बुनने में लग जाएंगे। जो काम नहीं करता है वह है इसका 12 एपिसोड में बंटा होना, जिसकी वजह से थोड़ी खींची-खींची लगती है और देखने में 9 घंटे का समय देना पड़ता है और दूसरी चीज अभिषेक बच्चन और नित्या मेनन की केमिस्ट्री जो कि एक पति-पत्नी के रूप में थोड़ी सी फीकी लगती है। इसके अलावा सब कुछ उपयुक्त है और देखने योग्य है।
अब आप अपने परिवार के लिए किस हद तक जा सकते हैं देखिए और निर्णय लीजिए…

Aarya: गलत और कम गलत !!!

आर्या वेब सीरीज समीक्षा ( Web Series Review)
3.5*/5*
  • शैली (Genre) क्राइम, ड्रामा
  • द्वारा आधारित (Based on) पेनोजा (डच सीरीज)
  • द्वारा लिखित (Written by) संदीप श्रीवास्तव,
    अनु सिंह चौधरी
  • द्वारा निर्देशित (Directed by) राम माधवानी,
    संदीप मोदी
  • अभिनीत (Starring) सुष्मिता सेन
  • भाषा (Language) हिंदी
  • एपिसोड्स संख्या 9 (50 to 55 mins/-)
जितना ऊंचा नाम उतने उलझे हुए काम डिज्नी हॉटस्टार की नई सीरीज आर्या की कहानी भी कुछ इसी प्रकार की है। आर्या का निर्देशन राम माधवानी का है जिन्होंने इस से पहले नीरजा फ़िल्म का निर्देशन कर के अपनी एक अलग छाप छोड़ी थी। सुष्मिता सेन एक दशक के बाद इस सीरीज से वापसी कर रही हैं, जिनको हम आर्या के रूप में यहां देेेेेेेेखेंगे। उनके लिए इससे बेहतर और दमदार वापसी नहीं हो सकती थी। सुष्मिता सेन का खुद का किरदार आर्या से इतना मेल खाता है कि लगता है, आर्या का किरदार उन्हीं से प्रेरित हो कर लिखा गया है। एक सशक्त और आत्मनिर्भर महिला, जिसको बखूबी पता है कि अपना काम किस प्रकार से कराना है। एक बेहतरीन चुनाव।
[]‘ फिर से वो बनो जो तुम हो पंजे बाहर निकालो शेरनी की तरह…’
[]‘ मैं अपनी फैमिली को बचाने के लिए कुछ भी कर सकती हूं…’
[]” पहले क्यों नहीं संभाला तूने धंधा ?
[]क्योंकि पहले धंधा मर्द संभालते थे, अब बचे नहीं…”
इन सभी डायलॉग्स से आप इस सीरीज में सुष्मिता सेन के आधिपत्य का अंदाजा लगा सकते हैं।
आर्या राजस्थान के अमीर परिवार की कहानी हैै जो अफ़ीम के कारोबार से जुड़ा हुआ है। आर्या (सुष्मिता सेन) इस परिवार की बड़ी बेटी है, जो कारोबार कि वजह से पति की मृत्यु के बाद अपने ३ बच्चों व परिवार को बचाने के लिए इस धंधे में आती है।
चंद्रचूड़ सिंह ने भी काफी अरसे बाद पर्दे पर वापसी की है और अपनी छाप भी छोड़ी है। इस सीरीज की कास्टिंग काफी शानदार है और सभी किरदारों का दमदार अभिनय इस बात को सही भी साबित करता है। सभी कलाकार अपने-अपने किरदार के हिसाब से एकदम सटीक है। विशेष रुप से मनीष चौधरी, नमित दास, विकास कुमार और सिकंदर खेर। कहानी को दर्शकों तक सही रूप में पहुंचाने के लिए कास्टिंग एक मजबूत कड़ी होती है, जो यहां बखूबी नजर आया है।
आर्या में बड़े़े घरों की चकाचौंध है, उनकी शान-ओ-शौकत हैै और उसके पीछेे छुपा हुआ उनका काला सच है। जिसकी वजह से जो खून खराबे होतेे हैं और फिर उनको छुपाने केे लिए जो जाल बुने जातेे हैंं, वह सब है। कुल मिलाकर आर्या में वह सब कुछ है जो आपको उस सीरीज को देखने के लिए मजबूर कर सकता है। सीरीज थोड़ी लंबी जरूर है तो समय ज्यादा लेती है लेकिन कहानी भी धीरे-धीरेे गति पकड़ती है तो आपको काफी हद तक बांधे रखती है और जब अंत पर आती है तो एक और सीरीज के प्रारंभ का रास्ता खोल कर जाती है। कुल मिलाकर देखने योग्य है।