Jogi ( 1984 की झांकी)

16 सितंबर 2022 को नेटफ्लिक्स पर एक फिल्म आई है।
नाम है जोगी, मैंने अभी कुछ दिन पहले ही देखी है और जब से देखी है कुछ चीजें सच में मेरे ज़हन में चल रही हैं। जो चाह कर भी मैं अपने मन से और दिमाग से नहीं निकाल पा रही हूं।
सबसे पहली चीज जो इस फिल्म को देखने के बाद मेरे मस्तिष्क में आई वह है
लोग इतनी नफरत लाते कहां से हैं…
फिल्म की पृष्ठभूमि 1984 की है जब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या होने पर सिख विरोधी दंगे शुरू हो गए थे और उन 3 दिनों ने भारत के नक्शे को कितना लाल और इतिहास को कितना काला किया था सभी को वह व्यथा ज्ञात ही है।
यदि हम को इंसान का जन्म मिला है तो एक इंसान में जितनी भावनाओं का वास होना चाहिए उनका होना बहुत ही सामान्य सी बात है यदि किसी व्यक्ति से बेइंतेहा प्रेम है तो उससे नफरत भी लाजमी है किंतु किसी एक से ही नफरत ना… पूरे परिवार से नफरत नहीं हो सकती… पूरी कौम से तो कदापि नहीं हो सकती !
एक और बात मानी जा सकती है कि मेरे परिवार के किसी व्यक्ति की हत्या हुई है तो मेरे अंदर बदले की भावना ने घर कर लिया है और मुझे उस व्यक्ति से बदला चाहिए तो भी यह बदला व्यक्ति विशेष का व्यक्ति विशेष से ही होगा ना उसको इस तरह के नरसंहार में परिवर्तित कर देना कहां का न्याय संगत कार्य है।
चलो लोग नफरत वाले कोण को तब भी भूना लेंगे, कि भाई हमारा व्यक्ति मरा है, हमें है गुस्सा, है आक्रोश लेकिन एक जो सबसे बड़ा पहलू इन दंगों के पीछे देखने में आता है वह है

सत्ता और पैसे की कभी ना तृप्त होने वाली चाह।
इसको राजनीतिक मुद्दा बनाकर अपनी शक्ति का प्रदर्शन उन लोगों पर करना जिनका इस घटना से दूर-दूर तक कोई लेना देना ही नहीं है। हर व्यक्ति की बोली है। जो ज्यादा आम है उसकी मौत के दाम कम हैं जो आम से थोड़ा खास है उसके दाम भी ख़ास हैं।
मारने वाले पैसों के लालच में उन व्यक्तियों को मौत के घाट उतार रहे हैं जिनको उन्होंने कभी ना देखा ना जानते ही हैं। खुद की संवेदना और स्वयं विवेक की हत्या वो पहले ही कर चुके हैं।
यदि भगवान को किसी एक व्यक्ति के पीछे ही सबको चलाना होता तो वह सबको समान रूप से विकसित करके क्यों भेजता किंतु यह सोचने की जरूरत क्या है। नफरत अपने चरम पर है कि जो शक्तिशाली व्यक्ति ने कहा वह करना है बस ।
कहने को तो कहा जाता है कि मारने वाले से बचाने वाला बड़ा होता है किंतु फिर भी लोग कितने मरते हैं। इन दंगों में भी लोग मरे लेकिन सही रिकॉर्ड किसी के पास नहीं है।
फिल्म में दंगों के साथ-साथ एक प्रेम और सद्भावना का मिश्रण दोस्ती के रूप में दिखाया गया है। जो बहुत ही पवित्र और प्यारा है। किसी की मदद करने के लिए आपको भगवान होने की जरूरत नहीं होती है सिर्फ पूर्ण रूप से इंसान होना पड़ता है। जब मारने वाले मार रहे थे तो बचाने वाले बचा भी रहे थे और अपनी जान को दांव पर लगाकर बचा रहे थे। जिसके चलते लोग बचे भी हैं और जब वह लोग यह दास्ताने सुनाते हैं तो दिल दहल जाता है।कि कैसे घरों को जलाया गया, जिंदा लोगों को जलाया गया पुलिस रक्षक ना होकर भक्षक हो गई।
फिल्म सभी भावनाओं का मिश्रण है अली अब्बास जफर की फिल्म जोगी फिल्मी अंदाज में एक डॉक्यूमेंट्री ही है। जो आपको 1984 में जो हुआ.. क्यों हुआ ? क्या वह होना चाहिए था ? क्या उसको रोका जा सकता था ? इन सब तथ्यों के बारे में सोचने और अधिक जानने की जिज्ञासा को मजबूत कर देती है।फिल्म में सभी का अभिनय काबिले तारीफ है फिर भी 4 नाम उल्लेखनीय है
दिलजीत दोसांझ
मोहम्मद जीशान अय्यूब
हितेन तेजवानी और कुमुद मिश्रा ।
फिल्म बिल्कुल देखे जाने योग्य है और देखकर सोचे जाने योग्य भी है।

Shabaash Mithu : Women in blue!

कलाकार : तापसी पन्नू , विजय राज, शिल्पा मारवाह ,इनायत वर्मा , कस्तूरी जगनाम आदि

लेखक : प्रिया एवेन

निर्देशक : सृजित मुखर्जी.

⭐⭐⭐ 3/5

यह मैदान देख, यह भी जिंदगी की तरह है।

यहां सारे दर्द छोटे हैं, बस खेलना बड़ा है।

कुछ फिल्में सिर्फ फिल्में ना होकर अपनी कहानी में जिंदगी को बयां करती हैं, और यदि कहीं पर जिंदगी को कैसे जीना है कि दुनिया याद करे सिखाया जा रहा हो तो वह फिल्म शाबाशी के भी योग्य होती है और पूर्ण रूप से देखे जाने के भी।

“शाबाश मिथु” हमारी महिला भारतीय क्रिकेट टीम की कप्तान मिताली राज की अपनी टीम को वर्ल्ड कप फाइनल में लेकर जाने तक की यात्रा को अपने तरीके से हमारे समक्ष प्रस्तुत करती है। यात्रा उनकी है किंतु हमारे समाज के बहुत सारे प्रतिबिंब उनकी कहानी हमारे तक पहुंचाती है।

जहां एक तरफ मिताली के माता पिता अपनी बेटी की प्रतिभा का पता चलने पर कि वह भरतनाट्यम से अधिक सक्षम क्रिकेट खेलने में है, उसको बिना किसी झिझक के कोचिंग के लिए सहर्ष लेकर जाने लगते हैं और निरंतर बढ़ावा देते हैं। वहीं दूसरी तरफ शादी के समय लड़के वालों की तरफ से लड़की का क्रिकेट खेलना जरूरी बात सी ही नहीं है। उसको किसी भी निजी कार्य के लिए छोड़ा जा सकता है क्योंकि पुरुष जो कार्य कर रहा है वही सर्वोपरि है और उसी का ही महत्व है, स्त्री के सभी महत्वपूर्ण कार्य उसके उपरांत ही आ सकते हैं।

एक तरफ एक ऐसा कोच है जो एक 8 साल की बच्ची को गली क्रिकेट खेलता हुआ देखकर उसकी प्रतिभा को पहचान लेता है और उसको निपुणता की चोटी पर पहुंचाने का प्रयास करता है।वहीं दूसरी तरफ क्रिकेट बोर्ड है जो महिला क्रिकेट और पुरुष क्रिकेट को उसकी योग्यता से नहीं बल्कि उनके जेंडर से आंकता है।

और अंत में आते हैं हम जैसे लोग जो बोलते तो हैं कि हमें क्रिकेट से बहुत प्रेम है और हम बड़े क्रिकेट के प्रशंसक हैं। किंतु देखते और जानते सिर्फ पुरुष क्रिकेट टीम के बारे में ही हैं।

किसी खेल को पसंद करने और उसका प्रशंसक होने का अभिप्राय यह होता है कि हम उस खेल से जुड़ी हर बात को पसंद करें चाहे वह खेल महिलाओं द्वारा खेला जाए या पुरुषों द्वारा और यदि हम सिर्फ पुरुष द्वारा खेले जाने वाले खेल को या क्रिकेट को ही देखना पसंद करते हैं तो हमको अपने आप को पुरुष क्रिकेट प्रशंसक कहना चाहिए ना कि क्रिकेट प्रशंसक।

महिलाओं का संघर्ष हर क्षेत्र में ज्यादा ही रहा है। जहां पुरुषों को किसी भी ऊंचाई तक पहुंचने के लिए सिर्फ शारीरिक और मानसिक संघर्ष ही करना पड़ता है तो वहीं महिलाओं को एक सोच से भी टकराते रहना पड़ता है। वह सोच जो उनको या तो पुरुषों से कमतर समझती है या फिर उनको देवी ही समझती है।कहने का तात्पर्य है कि या तो तुम निम्न हो या फिर पूजनीय हो और दोनों ही सूरतों में आपके पैरों में बेड़ी ही है। अभी आते आते हम काफी आगे आ गए हैं, स्थिति पहले से करोड़ों गुना अच्छी है। किंतु सभी जगह नहीं।

मिताली राज के संघर्षों के चलते महिला क्रिकेट की हालत में काफी सुधार आया, यह एक व्यक्ति के कुछ ठान लेने को दर्शाता है जैसे कि दुष्यंत कुमार जी ने भी कहा है

कौन कहता है आसमां में सुराख नहीं हो सकता

एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों…

तो बस एक महिला की उसी तबीयत की कहानी है जो हम सबको अपने अपने लक्ष्य तक पहुंचने के लिए प्रेरित करती है।

सृजित मुखर्जी का कहानी को दर्शाने का अपना एक तरीका है, जो धीमा है किंतु बोझिल बिल्कुल भी नहीं है और कहानी की पकड़ को नहीं जाने देता।  तापसी पन्नू की बात करें तो उम्दा काम किया है एकदम मिताली राज के ढंग में ढल कर।

मिताली के बचपन का किरदार निभाया है इनायत वर्मा ने और उनकी दोस्त नूरी का किरदार कस्तूरी जगनामा ने निभाया है और इन दोनों बच्चों ने जान डाल दी है किरदारों में और बेहतरीन रूपरेखा तैयार की है आगे कहानी के लिए।

फिल्म को बिना किसी किंतु परंतु के देखा जाना चाहिए और हमें यह संदेश देना चाहिए कि हमारे पास रियल कंटेंट की कोई कमी नहीं है और हमें वह देखना भी है। अपने ही लोगों को और करीब से जानना है जो की अत्यधिक आवश्यक है।

ANEK REVIEW!

निर्देशक :- अनुभव सिन्हा
कलाकार :- आयुष्मान खुराना, एंड्रिया केवेचुसा, मनोज पाहवा कुमुद मिश्रा आदि
⭐⭐⭐ 3 / 5



सरल शब्दों में अपनी बात को कह देना, किसी भी कला से कम नहीं है क्योंकि जो सरल है वह सुंदर है और यदि वह सरलता ही आपकी पहचान बन जाए तो हर बार कुछ सुंदर प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी आपके कंधों पर आज ही जाती है और हर बार अपनी दक्षता आपको प्रकट करनी भी पड़ती है।

निर्देशक अनुभव सिन्हा भी अपनी इसी प्रतिभा का रुक्का फिल्म जगत में मनवा चुके हैं। अभी तक उनकी जो भी फिल्में रही हैं वह एक ऐसे पहलू को उजागर करती रही हैं जिसके बारे में लोग जान कर भी कुछ भी सही तौर पर नहीं जानते थे। जिनमें से मुल्क, आर्टिकल 15 और थप्पड़ जैसी फिल्में प्रख्यात हैं।

आयुष्मान खुराना और अनुभव सिन्हा इससे पहले आर्टिकल 15 में कमाल का काम कर चुके हैं। कैसे और किस प्रकार सही जगह पर चोट करनी है उसका उदाहरण यह फिल्म बखूबी स्थापित कर पाई थी।
अब जब यही दोनों लोग, जिनको आप उनके द्वारा किए गए उम्दा कार्य के लिए सौ फ़ीसदी अंक दे चुके हैं, साथ आए तो आप फिर से अपने विचार में उनकी अंकतालिका पर सौ का आंकड़ा लगा कर बैठ जाते हैं और फिर आपको वह ना मिल पाए जिसके लिए आप सौ अंक देने आए हैं तो वहां से शुरू होता है अंकों का न्यून होना।

Anek को देखते समय आपको एक बार को संदेह होने लगता है कि आप सच में अनुभव सिन्हा की ही फिल्म देख रहे हैं या किसी और की, क्योंकि फिल्म अपनी बात को उतनी सरलता से नहीं कहती जिसके लिए निर्देशक मशहूर हैं। कहानी अपने आप को पुख्ता तौर पर स्थापित नहीं कर पाती हैं जिसकी वजह से नॉर्थ-ईस्ट के लोगों के लिए वो दर्द महसूस नहीं होता है। आपको उनके लिए बुरा लगता है किंतु उनके दर्द को महसूस करके आपकी आंखें नहीं झलकती जोकि अमूमन इस तरह की फिल्म को देखकर होता है। पर्दे पर इतना कुछ हो रहा होता है कि आपकी उत्सुकता तो बढ़ती है किंतु आप किसी भी दृश्य से पूर्ण रूप से जुड़ नहीं पाते हैं।
फिल्म आपको नॉर्थ ईस्ट का वह पक्ष दिखाती है जिससे कितने ही लोग अनभिज्ञ हैं या जान कर भी अनजान है या जानते हैं किंतु पूर्ण रूप से नहीं। कैसे हमारे द्वारा कहे गए मजाक के शब्द भी उन लोगों को नश्तर की तरह चुप सकते हैं क्योंकि उसके पीछे उनका ना जाने कब समाप्त होने वाला संघर्ष है। उन लोगों को वह हक चाहिए जो हमारे लिए सामान्य सी बात है क्योंकि हम नॉर्थ इससे नहीं है, और उनके लिए वही जंग का मुद्दा है। हर एक का अपना पक्ष होता है और सही नतीजे के लिए हर पक्ष पर बात होना और विचार होना अति आवश्यक है।

नार्थ ईस्ट की आवाज बनने के लिए अनुभव सिन्हा को पूरे अंक दिए जा सकते हैं किंतु हां यह आवाज और भी बेहतर और और भी पुख्ता हो सकती थी उनकी बाकी फिल्मों की तरह इस में भी मुझे कोई संशय नहीं है।
कुछ डायलॉग जरुर उल्लेखित करना चाहूंगी जो सच में नॉर्थ ईस्ट की एक तस्वीर प्रस्तुत करते हैं, जो सच में विचारणीय है।

North east मतलब West Bengal के पूर्वी side वाला इंडिया…
– Peace is a subjective hypothesis…
– Parlour वाली है या नेपालन है…
– Aido को team में ले लेते हैं तो ये team इंडियन बनेगी या Chinese…
– Pepole’s voice, 5 साल में एक बार सुनी जा सकती है रोज-रोज नहीं सुनी जाएगी…
– अगर इंडिया की मैप से state के नाम छुपा दो तो कितनी इंडियंस हर state के नाम पर उंगली रख सकते हैं…
– हिंदी डिसाइड करती है कि कौन नॉर्थ से है कौन साउथ से…
– सिर्फ इंडियन कैसे होता है आदमी…
– कहीं ऐसा तो नहीं है यह peace किसी को चाहिए ही नहीं वरना इतने सालों से छोटी सी problem solve नहीं हुई…

A Thursday :- A Thursday not as good as A Wednesday

निर्देशक :- बेहजाद खंबाटा

कलाकार :- यामी गौतम , नेहा धूपिया , डिंपल कपाड़िया और अतुल कुलकर्णी

OTT :- Disney Plus Hotstar

⭐⭐💫 2.5 / 5

दर्द या पीड़ा सबसे ज्यादा कब महसूस होती है ???

जब वह आपकी अपनी होती है।

किसी और का दर्द उसी क्षमता से महसूस करने की क्षमता हम अभी तक अपने अंदर विकसित ही नहीं कर पाए हैं और जिन्होंने यह क्षमता जब कभी भी विकसित की है, वह समाज को हमेशा उन्नति की ओर ही लेकर गए हैं।

कुछ अपराध अक्षम्य होते हैं और उनको क्षमा की दृष्टि से देखे जाने का अर्थ है, उस अपराधिक सोच या मानसिकता को बढ़ावा देना। सही समय पर पड़ा हुआ एक थप्पड़ लोगों को पथ भ्रमित होने से बचा लेता है।

A Thursday भी हमारे सामने ऐसे ही विषय को अपने तरीके से प्रस्तुत करने का प्रयत्न करती है। फिल्म का विषय अच्छा है और फिल्म जो कहना चाहती है वह लोगों की आवाज भी है। लेकिन जब आप कोई फिल्म देख रहे होते हैं तो आपकी उम्मीद एक थ्रिलर फिल्म से क्या होती है, कि वह आपको विस्मित करें आपको चौकायें… तो यह फिल्म नहीं कर पाती है। जो भी फिल्म के अंदर हो रहा है उसका अंदाजा आप उसको देखते हुए लगा सकते हैं लेकिन हाँ यदि आप फिल्म देखना शुरू कर चुके हैं, और आपको फिल्म की कहानी का अंदाजा नहीं है, तो यह कहानी आप को पकड़ कर रखती है क्योंकि कुछ ना कुछ घटित हो रहा होता है।

फिल्म का मुद्दा बहुत अच्छा है लेकिन फिल्म विषय के दर्द को महसूस कराने में असफल रहती है, आप किरदार के दर्द से अपने आप को जोड़ नहीं पाते हैं तो जो भी यह फिल्म कर रही है वह बहुत ही उथला सा प्रतीत होने लगता है।

फिल्म बहुत सारे तारों को छूती है, वह सिस्टम को झंकझोर कर जगाने की बात करती है। वह मीडिया और सोशल मीडिया पर टिप्पणी करती है। फिल्म आपको सचेत और जागृत करने की तरफ प्रयासरत है। लेकिन इस तरह की जागृति पहले काफी फिल्में फैला चुकी हैं तो कुछ नया नहीं लगता है। नया है तो,

यामी गौतम को इस अवतार में देखना और वह प्रभावशाली भी दिखी हैं।

फिल्म को एक बार अवश्य देखा जा सकता है किंतु

A Wednesday को दिमाग से निकालने के उपरांत क्योंकि, नाम में समानता है काम में नहीं ।

Gehraiyaan Review

निर्देशक : शकुन बत्रा
कलाकार : दीपिका पादुकोण, अनन्या पांडे, सिद्धांत चतुर्वेदी, र्धैर्य करवा, नसीरुद्दीन शाह, रजत कपूर आदि
OTT : Amazon prime video
⭐⭐⭐



वैसे तो आज कल की दुनिया में हर कोई गहराइयों की तलाश में भटकता नजर आता है लेकिन यदि किसी फिल्म का नाम ही गहराइयां हो और उसको गहराई छू कर भी ना जाए तो आपको कैसा लगेगा… बिल्कुल वैसा ही जैसा कि इस फिल्म को देखने के बाद लगता है… “खालीपन” …शून्य सा ।
इस फिल्म के लिए कह सकते हैं “नाम बड़े और दर्शन छोटे”

इस फिल्म को देखने के बाद आपके दिमाग में जो रह जाता है वह है सिर्फ और सिर्फ दीपिका पादुकोण। सब कुछ उनके आसपास ही घूम रहा है और फिल्म देखने के बाद वह आपके दिमाग में कुछ समय के लिए घूमती रहने वाली हैं, यह तो पक्का है।

कभी-कभी चीज़ों को महसूस करना ही बहुत नहीं होता, उसको व्यक्त करना भी बेहद जरूरी पहलू होता है। यह फिल्म, इस फिल्म को बनाने वाले, फिल्म के कलाकार, सभी लोग कितनी भी गहराइयां महसूस कर रहे हों, किंतु ये सभी लोग इस को व्यक्त करने में चूक गए हैं जिसके फलस्वरूप फिल्म दर्शकों से संबंध स्थापित ही नहीं कर पाती है और बहुत ही उथलेपन से भावनाओं को प्रस्तुत करती हुई प्रतीत होती है।
कहानी को कहने का तरीका आपको किरदारों से जोड़ नहीं पाता है, जिसकी वजह से आप किसी भी किरदार की खुशी या गम को उन से जुड़ कर महसूस ही नहीं कर पाते हैं और फिल्म को सिर्फ एक फिल्म के तौर पर ही आंकने के अलावा आपके पास कोई विकल्प शेष नहीं बचता है।

फिल्म के कलाकारों की बात करें तो सब लोग अपनी जगह पर ठीक हैं, लेकिन कोई भी प्रभावित नहीं करता है, जो कि बहुत अच्छी बात नहीं है। कुल मिलाकर जो कलाकार आपको थोड़ा प्रभावित करता है, वह हैं दीपिका पादुकोण क्योंकि उन्हीं के पास कुछ करने के लिए धरातल है फिल्म की कहानी के अनुसार। बाकी कलाकारों के पास करने के लिए इतना कुछ नहीं है और यह बात कहीं ना कहीं खलती है।

अगर मैं कहूं तो मुझे फिल्म में जहां सच में गहराई नजर आती है, तो वह है, जहां नसीरुद्दीन शाह और दीपिका पादुकोण का अपनी बीती हुई जिंदगी को लेकर संवाद है, जो फिल्म के खत्म होने से कुछ समय पहले ही है। वह फिल्म का सर्वोत्तम अंश है, मेरे हिसाब से। इसके अलावा फिल्म में जो उम्दा है, वह है कौशल शाह की सिनेमैटोग्राफी, फिल्म का संगीत, फिल्म की लोकेशन और दीपिका पादुकोण की खूबसूरती।

फिल्म को एक बार जरूर देखा जा सकता है और देखा भी जाना चाहिए किंतु बहुत अधिक उम्मीद के साथ नहीं क्योंकि फिल्म जो बताने और दिखाने की कोशिश कर रही है वह सीधे तौर पर आप तक नहीं पहुंचा पाती है जिसके चलते आपको यह समझना पड़ता है कि आखिर यह फिल्म कह क्या रही है।


83 : A Historic Moment!

निर्देशक : कबीर खान
लेखक : कबीर खान, संजय पूरन सिंह चौहान, वसन बाला
संवाद : कबीर खान, सुमिता अरोरा
छायांकन : आसिम मिश्रा
Editing by : नितिन बेद
Casting by : मुकेश छाबरा
⭐⭐⭐⭐⭐ 5/5



‘ देर आए पर दुरुस्त आए ‘
यह कहावत पहली बार जब हम विश्वकप जीते थे, सन् 1983 में, तब भी सटीक बैठी थी और यह आज भी पूर्णतः सटीक है, निर्देशक कबीर खान की फिल्म 83 के लिए। फिल्म का इंतजार कब से किया जा रहा है और यह आते-आते आ भी गई है, और यहां मैं कह सकती हूं कि,
“आओ तो ऐसे आओ कि तुम्हारे आने को और आ कर छा जाने के हुनर को दुनिया याद करे..”
जिन्होंने इन पलों को जिया है या देखा है उनका तो अंदाज ए बयां कुछ और हो सकता है लेकिन जिन्होंने यह पल सिर्फ सुने या पढ़े हैं वह भी जब इन दृश्यों को पर्दे पर देखेंगे तो गर्व से छाती चौड़ी हो जाएगी और खुशी के आसुओं से आंखें दमक उठेंगी।
हर चीज को शब्दों में बयां कर पाना मुमकिन नहीं होता है और यह फिल्म 83 वही काम करती है कि आपके पास बखान करने के लिए उपयुक्त शब्दों की कमी सी प्रतीत होने लगती है।

83 शानदार क्यों है …

– क्रिकेट प्रेमी हैं तो इससे शानदार तरीके से आप 25 जून 1983 को महसूस नहीं कर सकते।
– क्रिकेट में देश की पहली जीत का जश्न मनाना चाहते हैं तो इससे बेहतर मौका नहीं मिल सकता।
– टीम वर्क किसको कहते हैं वह आपको इस फिल्म से उम्दा तरीके से कोई बता ही नहीं सकता
– एक 1983 में कपिल देव की टीम थी।
– और एक 2021 में कबीर खान की है।
– सपनों को हकीकत की पोशाक कैसे पहनाते हैं उसका इससे उत्तम उदाहरण कुछ नहीं हो सकता।
– खुद पर विश्वास और सही दिशा का ज्ञान है तो फर्क नहीं पड़ता कि लोग तुम्हारे बारे में क्या बोलते हैं और क्या सोचते हैं, यह कपिल देव की आंखें और शारीरिक हाव-भाव आपको हर बार इस फिल्म में महसूस कराते हैं।
सबसे बड़ी बात जो 1983 की जीत और फिल्म 83 हमें बताती है वह है कि
” इज्जत मांगने से कभी नहीं मिलती उसके लिए आपको हर बार अपने आपको अपनी औकात से ज्यादा साबित करना पड़ता है”



फिल्म की कास्टिंग की बात करें तो इससे उत्तम और सटीक कास्टिंग कुछ हो ही नहीं सकती थी बेहतरीन काम और vision मुकेश छाबड़ा जी का। इसी के साथ फिल्म के संवाद, फिल्म की एडिटिंग, फिल्म का संगीत सब कुछ फिल्म में चार चांद लगाता है और फिल्म को बेहतर से बेहतरीन की दिशा में अग्रसर रखता है।
अब बात करते हैं फिल्म के कलाकारों की हर एक व्यक्ति तारीफ का हकदार है मुझे कोई भी कलाकार ऐसा नहीं दिखा जो उत्तम नहीं था किंतु जहां जाकर और जिसको देखकर आप नि:शब्द हो जाते हैं, वह है रणवीर सिंह की अदाकारी। आप जो सोच भी नहीं सकते हैं वह कार्य उन्होंने करके दिखाया है।
आप पूरी फिल्म में रणवीर सिंह को ढूंढते रह जाओगे लेकिन आपको कपिल देव के अलावा कोई और दिख जाए इस चीज की गारंटी मैं दे सकती हूं।
रणवीर सिंह सच में कमाल ही हैं और हर बार वह विस्मित ही करते हैं ।

अब आप मुझे बताइए कि आपको यह फिल्म देखने से कोई भी ताकत कैसे रोक सकती है तो बिना किसी देरी के थियेटर्स की तरफ प्रस्थान कीजिए…
⭐⭐⭐⭐⭐

Bell Bottom Review !!!

निर्देशक : रंजीत एम तिवारी

कलाकार : अक्षय कुमार, वाणी कपूर, लारा दत्ता,
हुमा कुरैशी, आदिल हुसैन, ज़ैन ख़ान…

OTT : Prime Video
⭐⭐⭐💫 3.5 / 5
अवधि : 2 hours 5 mins



कभी-कभी कुछ नया करने के लिए आपको नई सोच और नई चीजों पर दांव लगाना ही पड़ता है और वहीं से शुरुआत होती है एक नए इतिहास की।
फिल्म बेल बॉटम भी इसी तरह की एक चुनौतीपूर्ण घटना से प्रेरित फिल्म है, घटना पर आधारित फिल्म इसलिए नहीं कह सकते क्योंकि फिल्म को एक मसाला फिल्म बनाने के लिए रचनात्मक स्वतंत्रता ली गई है और वहीं पर यह फिल्म थोड़ा चूकती भी है क्योंकि सत्य घटनाओं को किसी भी मसाले की जरूरत नहीं होती है। यह शायद उनको नकली बना देता है।


बेल बॉटम की कहानी 80 के दशक की है और जिस तरह से प्रस्तुत की गई है वह आपको 80 के दशक का पूर्ण अनुभव कराती भी है। यह 1984 में हुए विमान अपहरण को हमारे सामने प्रस्तुत करती है और उस समय की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी जी के एक सराहनीय फैसले को भी हमारे सामने प्रस्तुत करती है। यहां मैं एक बात और जोड़ना चाहूंगी कि RAW की स्थापना में इंदिरा गांधी का पूर्ण समर्थन और योगदान रहा है।
फिल्म पूर्ण रूप से खिलाड़ी कुमार की फिल्म है और वह पूरी तरह से खेल भी गए हैं। उन्होंने कोई चूक का मौक़ा नहीं दिया है और अपने सभी रंग (shades) प्रदर्शित किए हैं। फ़िल्म में वह एक Raw एजेंट की भूमिका में हैं, जितना कोड नेम बेल बॉटम है। इसके अलावा फ़िल्म में लारा दत्ता भी इंद्रा गांधी जी के किरदार में हैं और उनकी वेष भूषा भी बिल्कुल उपयुक्त रही है इस क़िरदार के लिए किंतु उनके पास करने को कुछ खास नहीं था कि वह अपनी छाप छोड़ पातीं और यही कहीं ना कहीं वाणी कपूर और हुमा कुरैशी के साथ भी हुआ है। क़िरदार ज़रूर हैं किंतु कुछ अलग कर दिखाने की संभावना उन किरदारों में नहीं है। इसी के साथ एक किरदार जो आपके ज़हन में रह जाएगा, वह है ज़ैन खान का, वह भी सिर्फ उनकी अदाकारी की वजह से क्योंकि करने के लिए इस किरदार के पास भी बहुत कुछ नहीं था किंतु जितना किया वह उनकी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए काफी था शायद। अच्छी अदाकारी।


फिल्म की रफ्तार फ़िल्म का सबसे बड़ा सकारात्मक पहलू है, जिसके चलते आप फ़िल्म से जुड़े रहते हैं। फ़िल्म में भूत और वर्तमान की कहानी का समिश्रण भी काफी बेहतरीन तरीके से बिठाया गया है।
फ़िल्म की कहानी आप को पूरी तरह से पकड़ कर रखती है और आप सोचते हैं, अब क्या होगा अब क्या होगा…
जो चीजें थोड़ी सी खड़कती हैं, वे हैं,
फिल्म का सिर्फ सत्य घटना से प्रेरित होना, आधारित ना होना।
सभी किरदारों को पूर्ण रूप से उपयोग ना करना।
फिल्म उतना भावुक और देश भक्ति का जज़्बा उत्पन्न नहीं करती जितना जरूरी था।


बाकी एक अच्छी फ़िल्म है। बिल्कुल देखे जाने योग्य है।

MIMI :- कहानी MIMI की !

कलाकार :- कृति सेनन, पंकज त्रिपाठी, मनोज पाहवा सुप्रिया पाठक, सई ताम्हणकर ।

निर्देशक :-  लक्ष्मण उतेकर

प्रस्तुतकर्ता :- Netflix & Jio Cinema।

⭐⭐⭐💫 3.5/ 5

अवधि :- 2 hours 12 mins.

कुछ फिल्में, फिल्म ना होकर एहसास होती हैं। निर्देशक लक्ष्मण उतेकर की फिल्म MIMI भी उसी श्रेणी की फिल्मों में आती है। इससे पहले वह मराठी फिल्म टपाल और हिंदी फिल्म लुका छुपी का भी निर्देशन कर चुके हैं लेकिन कोई फिल्म जो उनको सही मायने में एक निर्देशक के रूप में स्थापित करती है, तो वह है फिल्म MIMI

फिल्म को जिस तरह से प्रदर्शित किया गया है, वह काफी सहज और स्वाभाविक सा लगता है। फिल्म का कोई भी किरदार अतिरिक्त नहीं नजर आता और ना ही अव्यवस्थित लगता है। सभी किरदारों को सही अनुपात में फिल्म के अंदर रखा गया है जो कि एक अच्छी फिल्म के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बात है।

फिल्म MIMI, मराठी फिल्म मला आई व्हायचय पर आधारित है जिससे सर्वश्रेष्ठ मराठी फिल्म का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिल चुका है।

फिल्म MIMI का विषय सरोगेसी है। यदि आपने फिल्म का ट्रेलर देखा है, तो यह बात तो आपको वहीं पर स्पष्ट हो गई होंगी। एक ऐसा समय था जब भारत विदेशी लोगों के लिए सरोगेसी का ठिकाना बन गया था और यहां के लोगों के लिए यह एक व्यापार। इस फिल्म के जरिए उसी चित्र को प्रदर्शित करने की चेष्टा की गई है। इस विषय के साथ फिल्म एक और मुद्दे को भी उठाती है जो है ADOPTION (गोद लेना)। फिल्म यह कहने का प्रयास करती हुई भी नजर आई है कि “सरोगेसी ही सिर्फ एकमात्र विकल्प नहीं है, उन दंपतियों के लिए जो संतान सुख से वंचित हैं, वह बच्चे को गोदी भी ले सकते हैं।

“मां-बाप बनने के लिए बच्चा अपना होना ही जरूरी नहीं है।”

यह सच में एक महत्वपूर्ण और सुंदर संदेश है समाज के लिए।

MIMI, एक स्त्री प्रधान फिल्म है। जिसमें कोई Hero type Hero नहीं है लेकिन यह आपको फिल्म देखते समय कहीं भी महसूस नहीं होगा और इसका सारा श्रेय जाता है पंकज त्रिपाठी और कृति सेनन को।

सर्वप्रथम बात करते हैं पंकज त्रिपाठी जी की, यदि वह किसी भी फिल्म के कलाकार हैं तो आपको एक बात के लिए तो बिल्कुल आश्वस्त हो जाना पड़ेगा कि उनका किरदार आपको बिल्कुल भी निराश नहीं करेगा और आपकी अपेक्षाओं पर उसी रूप में खरा उतरेगा जिस रूप में आपने आशा की है।यह अभी तक का उनका फिल्मों का रेखाचित्र है।यहां भी वह जिस भी दृश्य में हैं वह देखने योग्य है और उम्दा है। वह सच में अपनी प्रतिभा के धनी हैं। अब बात करते हैं कृति सेनन की, वह देखने में जितनी सुंदर हैं यहां अदाकारी भी उन्होंने उसी श्रेणी की दिखाई है। एक नटखट और चुलबुली लड़की से एक परिपक्व मां तक का उनका सफर, इन 2 घंटों में बड़ा ही सहज लगता है और यह ही उनके अभिनय का स्तर भी दिखाता है। उनकी और पंकज त्रिपाठी जी की केमिस्ट्री भी काफी स्वभाविक और वास्तविक लगती है।

बाकी सहायक कलाकारों की बात करें तो, चुनाव ही ऐसा था कि चूक की कोई गुंजाइश ही नहीं थी। मनोज पहावा, सुप्रिया पाठक मतलब कहें तो नाम ही काफी हैं। इसी के साथ सई ताम्हणकर ने सभी का बेहतरीन ढंग से साथ दिया है, और अपनी उपस्थिति भी पूर्ण रूप से दर्ज कराई है।

फ़िल्म के कमजोर पक्ष की बात करें तो, फिल्म का तकनीकी पक्ष उतना सशक्त नहीं है और फिल्म अंत में थोड़ी खींची-खींची हुई सी लगती है बाकी एक मजेदार फिल्म है देखने के लिए और आप लोग देखें भी जरूर । 😊

Note : फिल्म 30 जुलाई को प्रसारित की जाने वाली थी किंतु 26 जुलाई को सुबह ऑनलाइन लीक हो जाने की वजह से, 26 जुलाई को शाम ही प्रसारित कर दी गई।

हसीन दिलरूबा : दिनेश पंडित की कोई किताब…

कलाकार :-  तापसी पन्नू, विक्रांत मेस्सी ,हर्षवर्धन नाराणे, यामिनी दास, आदित्य श्रीवास्तव आदि।
निर्देशक :-  विनिल मैथ्यू
लेखक  :-  कनिका ढिल्लों
प्रस्तुतकर्ता :- Netflix
⭐⭐⭐💫 3.5/ 5
अवधि :- 2 hours 15 mins

आपने दिनेश पंडित जी की कोई किताब पढ़ी है ???
क्या लिखते हैं वो… वह छोटे-छोटे शहरों में ना बड़े-बड़े कत्ल करा देते हैं… पता भी नहीं चलता..।

तो यह डायलॉग है कनिका ढिल्लों की लिखी नई फिल्म हसीन दिलरूबा का, जहां इस डायलॉग से ही पता चल जाता है कि कोई मर्डर मिस्ट्री है। 

जब हम ट्रेन के सफर पर जाया करते थे और लगता था कि सफर आसानी से कट जाए और हमें पता भी ना चले तो कई बार स्टेशन से कोई किताब ले लिया करते थे, जिसमें हमें हर तरह का तत्व या कहें तड़का मिल जाए। रोमांच और रोमांस सब कुछ एक साथ। तो हसीन दिलरूबा को देखते हुए आपको वही वाली अनुभूति होगी, जैसे कि आप दिनेश पंडित की लिखी हुई कोई किताब पढ़ रहे हैं। लेखक ने जो कुछ भी लिखा है या वह जो बता रहा है वही उस समय की वास्तविकता है। जिसमें आपके दिमाग की कोई भी आवश्यकता नहीं है और यदि आपने लगाया तो आप उस आनंद से वंचित रह सकते हैं जो वह किताब आपको देना चाहती है या दे रही है।
कहने का तात्पर्य है कि यह फिल्म भी आपको वास्तविक दुनिया से अलग अपनी ही दुनिया में ले जाती है और उसमें जो घटित हो रहा है वह सब देखने लायक है यदि आप उसको एक फिल्म की कहानी के तौर पर ही वजन दें क्योंकि उसका वास्तविकता से कोई लेना-देना ही नहीं है। एक अलग तरह की कहानी को विनिल मैथ्यू ने एक अलग ढंग से प्रस्तुत किया है। जो फिल्म को दिलचस्प बनाता है और आपको पैसा वसूल कराने वाली अनुभूति कराता है।
फिल्म की मजबूत कड़ी, फिल्म की कहानी का थोड़ा हटकर होना और सभी कलाकारों का अभिनय है, जो इस कहानी को आप तक इस तरह से पहुंचाते हैं कि आप उसका हिस्सा बन जाते हैं। इसी के साथ अमित त्रिवेदी का संगीत फिल्म की कहानी को परिष्कृत करने का कार्य करता है और इसी कड़ी को जयकृष्ण गुम्मड़ी की सिनेमैटोग्राफी आगे बढ़ाती है।
फिल्म की कहानी प्रेम त्रिकोण है लेकिन ऐसा त्रिकोण जो आपको पुराना होते हुए भी नया लगेगा। कनिका ढिल्लों ने इसके अंदर कई परतों को शामिल किया है जिसके चलते आपको प्यार और नफरत के अलग-अलग रंग दिखाई देंगे जो नए और अनूठे लगते हैं।
फिल्म के कमजोर पक्ष की बात करें तो फिल्म वास्तविकता से काफी दूर है, जिसके चलते तर्क से भी इसका कोई वास्ता नहीं है। तो यदि आपने दिमाग लगाया तो  निराशा ही हाथ लगेगी और वहीं दूसरी तरफ यदि आप एक मसाला फिल्म देखना चाहते हैं तो अच्छा चुनाव है इस वीकेंड के लिए। 😊



My Take :-

यामिनी दास (सास) और तापसी पन्नू (बहू) का रिश्ता बड़ा अजब है, जो मन को भाता है ।
तापसी पन्नू, विक्रांत मेस्सी, हर्षवर्धन नाराणे अपने-अपने किरदारों के अनुरूप लगे हैं ।

Sherni : अनछुई दुनिया…

लेखक :-  आस्था टीकू, यशस्वी मिश्रा, अमित मसुरकर।

निर्देशक :- अमित मसुरकर

अवधि :-  2 घंटा  10 मिनट

OTT :-  Amazon Prime video
⭐⭐⭐💫 3.5 / 5

किसी भी निर्देशक को सर्वप्रथम यह पता होना बहुत अनिवार्य होता है कि वह फिल्म किस प्रकार के दर्शकों के लिए बना रहा है।या उसका दर्शक वर्ग क्या देखना चाहता है और यही प्रश्न किसी भी फिल्म का भविष्य काफी हद तक निर्धारित करता है। क्योंकि,

हर फिल्म हर व्यक्ति के लिए नहीं होती,उसी प्रकार हर व्यक्ति हर फिल्म के लिए।

निर्देशक अमित मसुरकर ने भी अपनी फिल्म उसी तरह के दर्शक वर्ग के लिए बनाई है, जो उनके सिनेमा को समझने का हुनर रखते हैं। जब आप किसी व्यक्ति को समझदार मानते हो तो यह आशा करते हो कि वह कम शब्दों में भी आपकी बात को पूर्ण रूप से समझ जाएगा और अमित मसुरकर भी कम शब्दों में अपनी बात को पुख्ता तौर पर रखने में माहिर हैं, जो कि हम लोग न्यूटन में भी देख चुके हैं।

फिल्म में एक संवाद है, जो नीरज कबि के द्वारा बोला गया है और यह फिल्म के मर्म को काफी हद तक बयां कर देता है।

अगर विकास के साथ जीना है तो पर्यावरण को बचा नहीं सकते और अगर पर्यावरण को बचाने जाओ तो विकास बेचारा उदास हो जाता है।

कहने का तात्पर्य है कि विकास और पर्यावरण दोनों अनिवार्य हैं और दोनों के बीच में सामंजस्य बिठाना ही आज की सबसे बड़ी चुनौती है। शेरनी का मुद्दा आदमी वर्सेस जानवर की कहानी को बिना किसी चांदी का बर्क पहनाए आप लोगों के सामने जैसे का तैसा प्रस्तुत कर देना है। कहने को तो कहानी एक शेरनी को बचाने की है जो आदमखोर हो चुकी है, लेकिन कोई शेरनी को सच में बचाना भी चाहता है कि नहीं यह सोचने योग्य विषय है। वहीं एक ईमानदार और अपने काम को लगन से करने में विश्वास रखने वाली वन विभाग की प्रमुख विद्या विन्सेंट(विद्या बालन) हैं, जो सच में शेरनी को सुरक्षित उसके सही स्थान पर पहुंचाना चाहती हैं और उसमें उनका साथ देते हैं प्रोफेसर हसन(विजय राज) और गांव के कुछ लोग। इसी के विपरीत उनके कार्य में बाधा बन रहे हैं … गांव की राजनीति, विभागीय राजनीति,कुछ प्राइवेट शिकारी और काफी हद तक पितृसत्ता जहां उनका अकेला आदमियों के बीच में कार्य करना आता है। फिल्म की कहानी में ऐसा कुछ नहीं है जो पहले देखा या सुना ना गया हो, बस इसको प्रस्तुत करने का ढंग अमित मसुरकर का है जो इसे बाकी फिल्मों से भिन्न करता है।

फिल्म एक फिल्म ना लग कर डॉक्यूमेंट्री ज्यादा लगती है, जो फिल्म के पक्ष में भी है और विपक्ष में भी। यहां किसी भी फिल्मी मसाले का प्रयोग नहीं किया गया है। फिल्म बड़ी सादगी से अपनी बात कहती है और आपके दिमाग में एक छाप और कई सवालों को जन्म देती है। जैसे कि पहले भी कहा है कि यह वाला सिनेमा सबके लिए नहीं है और यदि आपको चकाचौंध, मसाला और सब कुछ सुंदर-सुंदर चाहिए होता है तो यह फिल्म आपके लिए बिल्कुल भी नहीं है।

फिल्म की जान विद्या बालन का अभिनय है। वह जो भी सोच रही हैं, जी रही हैं, महसूस कर रही हैं… वह सब, वह आप तक बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के बड़ी सहजता से पहुंचा देती हैं। उनका यही सादगी से भरा हुआ अभिनय उनका कद फिल्म दर फिल्म बढ़ाता जा रहा है।यदि आप विद्या बालन के फैन हैं तो भी यह फिल्म आपके लिए है। 😊

Saina… ( Saina Nehwal)

निर्देशक – अमोल गुप्ते

लेखक अमोल गुप्ते, अमितोश नागपाल 

अवधि-  2 घंटा  15 मिनट

OTT Amazon Prime
⭐⭐⭐ 3/5

“मांगने वाली चीज नहीं

ये मौका उसका जिसने छीना…”

जिंदगी की सबसे बड़ी विशेषता और विडंबना यह है कि वह परियों की कहानी की तरह नहीं होती है। यहां सब कुछ पाने के लिए आपका हुनर और कड़ी मेहनत ही आपका सबसे बड़ा शस्त्र होता है।निर्देशक अमोल गुप्ते की फिल्म साइना जो विश्व की नंबर वन बैडमिंटन खिलाड़ी रह चुकी साइना नेहवाल की बायोपिक है। विश्व में नंबर एक का खिताब हासिल करना कोई आसान कार्य नहीं होता है और यह कितना मेहनत से भरा होता है, वह यह फिल्म हमें बताने की कोशिश करती है। जिंदगी में एक ऐसा मुकाम पाना जहां पर खड़े होकर आप कितनों की प्रेरणा का सबब बन सकते हैं, वहां तक जाने की डगर पर काफी कुछ निर्भर करता है। फिल्म साइना बहुत सी बातों की महत्वता को दर्शाती है, जिसमें से मुख्य हैं…

  • आशावादी माता पिता !
  • सही दिशा और फोकस की आवश्यकता !
  • दिशा निर्धारकों व गुरुओं का योगदान !
  • सही दिशा में सही कदम !
  • लक्ष्य प्राप्ति के लिए मेहनत का साथ !

यदि आपकी जिंदगी में प्रेरणा की कमी महसूस हो रही है तो आप को यह फिल्म जरूर देखनी चाहिए क्योंकि यह आपको थोड़ा उछाल तो अवश्य ही दे सकती है। कुछ Dialogue जो सच में प्रेरणादायक है…

  • मेरा ध्येय एकदम सरल… सामने वाले को मात देना ।
  • रास्ते पर चलना एक बात है साइना… और रास्ते बनाना दूसरी बात है… तू ना बेटा वो दूसरी बात करने की सोच ।
  • Game जीतने के लिए तुम क्या करते हो वो important नहीं है… important है कि game जीतने के लिए तुम क्या छोड़ते हो ।
  • मुझे वो champion नहीं चाहिए जो मन में जीत के बारे में सोचते हैं… मुझे वो champion चाहिए जो जीत के अलावा और कुछ नहीं सोचता है।

फिल्म बहुत ही सरलता से अपनी बात को कहती है, जो कि फिल्म की खास और आम दोनों ही बात है। जो आसान लगे वह लोगों को मामूली भी लग सकता है, तो यहां भी यही मतभेद है किंतु जिंदगी तो सहज और सरल की होती है। वो तो आपके कार्य होते हैं जो उसको फिल्म बनाने योग्य और लोगों को प्रेरणा देने लायक बनाते हैं। तो निर्देशक अमोल गुप्ते ने उस सहजता को बरकरार रखते हुए साइना नेहवाल के उन कार्य को दिखाने का प्रयत्न किया है जो उनको नंबर 1 के शिखर तक लेकर गए थे। किसी भी खिलाड़ी केेे जीवन पर फिल्म बनानाा कोई आसान कार्य नहीं है क्योंकि उसके लिए कलाकारों का सही चुनाव सबसे दुर्लभ और अहम कड़ी बन जाती हैै । यहां हम अभिनय की बात करें तो नयशा कौर भटोये, परिणीति चोपड़ा, मेघना मलिक और मानव कौल काफी प्रशंसनीय है।

कुछ लोगों के जीवन के बारे में जानना बहुत महत्वपूर्ण और सुखद होता है कहने का तात्पर्य है कि आपको यह फिल्म एक बार अवश्य ही देखनी चाहिए और अपनी प्रतिक्रिया को भी मुझ तक जरूर पहुंचाएं 😊।

Ajeeb Daastaans : Thought-Provoking Cinema

निर्देशक – शशांक खेतान, राज मेहता, नीरज घेवान, कायोज ईरानी
अवधि- 2 घंटा 22 मिनट
प्रस्तुतकर्ता- Netflix
⭐⭐⭐⭐ 4/5
अजीब दास्तान्‌स एक एंथोलाजी यानी एक संकलन है। 4 कहानियों का संकलन, जिनमें समानता उनकेेे किरदारों की सोच हैै, जो बाहर से कुछ और तथा अंदर से कुछ अलग ही भावों को अपने अंदर समेटे हुए हैं। कहनेे का तात्पर्य है कि अंदर का शख्स बाहर वाले शख्स से मेल ही नहीं खाता हैै और वही इन सब कहानियों का असली चेहरा भी है।
इन कहानियों में आपको लाचारी, बेचारगी, बर्बरता, दृढ़ता, द्वेष, ईष्या, पूर्व-निर्माण, जहरीलापन, सभी तरह के भावों का समावेश मिलेगा।
अजीब दास्तान्‌स आपको परिपक्व सिनेमा की तरफ ले जाएगा और आपके मस्तिष्क में ऐसे सवाल छोड़कर जाएगा जिनका उत्तर ढूंढते हुए आपको भी अपने अंदर के छुपे हुए भावों की झलक देखने को मिल सकती है।

विचारोत्तेजक सिनेमा (Thought-provoking Cinema)।

अजीब दास्तान्‌स चार कहानियों का समूह है
मजनू :

जिसमेंं प्रथम शशांक खेतान द्वारा निर्देशित है और फातिमा सना शेख, जयदीप अहलावत और अरमान रहलान मुख्य कलाकारों की भूमिका में हैं। यह कहानी एक अधूरी शादी की दास्तान को बयां करती है। जहां पति पत्नी सिर्फ नाम के रिश्ते में हैै, समाज में अपने आधिपत्य को सुनिश्चित करने के लिए। फिर यहां “वो” का प्रवेश होता है और कहानी अलग मोड़ लेती है। मजनू में सब कुछ अच्छा है। किरदार काफी मजबूत हैं किंतु जो थोड़ा नहीं जमा है, वह है कहानी में नयेेपन की कमी। सब कुछ देखा और सुना हुआ सा प्रतीत होता है।

खिलौना :

दूसरी कहानी है खिलौना, जिसका निर्देशन राज मेहता ने किया है, यहां नुसरत भरुचा और अभिषेक बैनर्जी मुख्य कलाकारों की भूमिका में हैं। यह समाज के दो वर्गों को प्रस्तुत करती है, कोठीवाले और कटियावाले। कटियावालों का मानना है कि “कोठीवाले किसी केेे भी सगे नहीं होते” और यही इस कहानी का दर्द भी हैै। सभी किरदारों ने बहुुत ही सहज अभिनय किया है इस कहानी का अंत आपको हिला कर रख देगा। कहानी आपको पूरी तरह से बांध कर रखती है और बोर नहीं होने देती हैै। यहां जो थोड़ा खटकता है वह कहानी का अंत है, जो बहुत ही डरावना है किंतु कहानी इस अंत के साथ पूर्ण न्याय नहींं करती या कह सकतेेे हैं की इतनी घृणा का सबब पूर्ण रूप सेे निकल कर नहीं आता है।

गीली पुच्ची :

तीसरी और कई विषयों को सामने लाती हुई कहानी है गीली पुच्ची, जिसका निर्देशन नीरव घेवान द्वारा किया गया है और मुख्य किरदारों में कोंकणा सेन शर्माअदिति राव हैदरी हैं। यह कहानी दो विषयों को छूती है,- “वर्ण व्यवस्था” और “समलैंगिकता”। कहानी को सटीक ढंग से लिखा और प्रस्तुत किया गया है। किरदारों केेे बीच की कड़वाहट और खिंचापन साफ पता चलता है। दोनों अभिनेत्रियों नेे बहुत ही उम्दा और सहज अभिनय का प्रदर्शन कियाा है जो इस कहानी का सबसे मजबूत पक्ष है।

अनकही :

चौथी और आखिरी कहानी है निर्देशक कायोज़ ईरानी की, जो बहुुुुत ही गहरी और प्यारी है जिसके मुख्य कलाकार हैं शेफाली शाह, तोता राय चौधरी और मानव कौल। यह कहानी बोलती बहुत कम है लेकिन समझा सब कुछ जाती है और रिश्तो के उतार-चढ़ाव को भी बड़ी सहजता से समझा जाती है। सभी कहानियों में यह सबसे अधिक सशक्त और छाप छोड़ने वाली है। इसी के साथ शेफाली शाहमानव कौल इतने सटीक और निश्छल हैं कि आप अपनी नजर उन से हटा ही नहीं पाएंगे।

यदि आप चारों कहानियों की तुलना करते हैं तो प्रथम कहानी प्रभावित करने से थोड़ा सा चूक जाती है, बाकी सब अपने-अपने संदेश को आप तक पूरी तरह से पहुंचाती है। सभी किरदार अपने अपने चयन में पूर्ण रूप से न्याय संगत है और आपको मनोरंजन के साथ साथ सोचने पर विवश करते हैं, जो कि इस फिल्म का भी उद्देश्य है। एक बेहतरीन फिल्म काफी समय के बाद आपके समक्ष है और आप देखने से कृपया ना चूके।

फिल्म का मजबूत पक्ष, निर्देशन और किरदारों का चयन है।

SILENCE…can you hear it?

लेखक, निर्देशक – अबन भरुचा देवहंस
कलाकार- मनोज बाजपेयी, प्राची देसाई, अर्जुन माथुर
अवधि- 2 घंटा 16 मिनट
प्रस्तुतकर्ता- ZEE 5
⭐⭐⭐🌠 3.5/5
“बुलबुल को सैयाद का इंतजार है”

चलो केस सॉल्व करते हैं …

अबन भरुचा देवहंस जिनको हम एक अभिनेत्री के रूप में उनके अभिनय के लिए जानते हैं, वह निर्देशक केेे तौर पर अपनी दूसरी फिल्म
Silence… can you you hear it के साथ एक बार फिर हमारे दिमाग को काम पर लगाने के लिए तैयार है। यह एक मर्डर मिस्ट्री हैै, जिसको आप zee5 पर देख सकते हैं। फिल्म के मुख्य कलाकार, हम सबके चहेते मनोज वाजपेयी जी हैं और उन्हीं के कंधों पर है इस फिल्म की सारी जिम्मेदारी। जैसा कि हम जानते हैं कि एक खाकी वर्दी के अंदर उनका रुतबा देखते ही बनता है और एक पुलिस वाले के तौर पर उनके तेवर हमेशा काबिले तारीफ होते हैं। यहां भी उन्होंने अपने उसी उम्दा अभिनय का प्रदर्शन किया है और फिल्म के साथ पूर्ण न्याय भी किया है।
फिल्म की कहानी की बात करें तो वह काफी सरल सी है लेकिन उसको प्रस्तुत करने का ढंग उसको आकर्षक बनाता है और दर्शकों पर अपनी पकड़ बनाए रखता है कहने का तात्पर्य यह है कि फिल्म आपको बोर नहीं होने देगी और आप भी एसीपी अविनाश के साथ केस को सुलझाने में व्यस्त हो जाएंगे। आजकल जिस तरह से थ्रिलर फिल्मों की बाढ़ आई हुई है जिसके चलते हम सभी केस को सुलझाने में और कातिल तक पहुंचने में महारथ हासिल कर चुके हैं, तो वहां पर यह काफी हद तक महत्वपूर्ण हो जाता है कि आपको कोई ऐसी फिल्म ला कर दे जो निष्कर्ष तक आपको आसानी से ना पहुंचने दे और अपने में थोड़ा उलझा कर रखें। इस फिल्म में भी निर्देशन और अभिनय जिस प्रकार का है वह कहानी के सरल होने के बावजूद भी आपको कातिल तक इतनी आसानी से नहीं पहुंचने देता है।
फिल्म में एक चीज जो खटकती है वह है, पुलिस अपना कार्य पुलिसनुमा तरीके से नहीं करके केस को बातों के जरिए सुलझाती हुई नजर आती है जोकि अटपटा और थोड़ा अधकचरा लगता है। जहाँ ऐसी ऐसी फिल्में और सीरीज आपके सामने प्रस्तुत की जाती हैं जहां आपको पुलिस की कार्यप्रणाली का पूर्ण बारीकी से ज्ञान दिया जाता है, वहाँ पुलिस को बातों से केस को सुलझाने हुए देखना होमवर्क की कमी को उजागर करता है। फिल्म का सारा का सारा दारोमदार मनोज बाजपेयी पर है, जिसके चलते किसी भी और किरदार को उतनी अच्छी तरीके से उभरा नहीं गया दूसरी तरफ प्राची देसाई इस तरह के किरदार में उतनी प्रभावी नहीं लगती है कहने का तात्पर्य है कि पुलिस वालों की कठोरता उनके चेहरे पर नजर नहीं आती है जो थोड़ा अस्वभाविक सा लगता हैै।
एक और चीज जिसका OTT पर फिल्मों को प्रसारित करने वाले सभी निर्देशकों को ध्यान देना चाहिए वह है, फिल्म की अवधि। OTT के लिए फिल्मों की अवधि का कम होना देखने वालों के लिए फिल्म को दिलचस्प रखता है। Silence… can you hear it ? भी अगर थोड़ी और छोटी होती तो ज्यादा असरदार रहती। कुल मिलाकर फिल्म को देखा जा सकता है और देखना भी चाहिए उसकी मुख्य और अहम वजह हैं, मनोज बाजपेयी जी (जिया हो बिहार के लाला)…

Bombay Begums Review

बॉम्बे बेगमस सीरीज समीक्षा

लेखक,निर्देशक – अलंकृता श्रीवास्तव, बोरनीला चटर्जी

कलाकार – पूजा भट्ट, शहाना गोस्वामी, अमृता सुभाष, प्लबिता बोरठाकूर, आध्या आनंद, दानिश हुसैन, राहुल बोस, मनीष चौधरी

प्रस्तुतकर्ता Netflix

⭐⭐⭐

Survival is the battle for every woman…
अस्तित्व, हर महिला की लड़ाई है...

अंतरष्ट्रीय महिला दिवस(8 मार्च) पर आयी Netflix की नई प्रस्तुति बॉम्बे बेगम्स भी 5 महिलाओं की अस्तित्व की लड़ाई को हमारे सामने प्रस्तुत करता है। हमेशा वही सही नहीं होता जो सीधे तौर पर आपको दिखता या दिखाया जाता है। हर व्यक्ति कई तरह की परतों से मिलकर बना होता है और किस परत को अंतिम रूप में दुनिया के सामने प्रस्तुत करना है या किस परत को अपना चरित्र बना कर समाज को दिखाना है, यह सब वह स्वयं निर्धारित करता है। बॉम्बे बेगमस लोगों की उन्हीं परतों को उतारकर बड़ी ही पारदर्शिता के साथ परदे पर प्रस्तुत करता है, खासकर महिलाओं की परतों को, उनके संघर्षों को, अपने आप को एक मुकाम दिलाने के जुनून को और उनकी विचित्र सोच को।

सब एक दौड़ का हिस्सा हैं, सबको कहीं न कहीं पहुंचना है किन्तु किसी के लिए रास्ता महत्वपूर्ण है तो किसी के लिए मंज़िल। इसी के चलते सब एक उलझन में रहते हैं कि क्या सही है, क्या नहीं…
बॉम्बे बेगमस की ये 5 महिलाएं भी कुछ इसी उलझन का सामना करती हैं और अपने हिस्से के आसमा की तलाश में जिंदगी उलझाती और सुलझाती सी नजर आती हैं।
बॉम्बे बेगमस की कहानी 5 किरदारों को हमारे सामने प्रस्तुत करती है, जिनमें से प्रथम है रानी सिंह ईरानी जो रॉयल बैंक ऑफ बॉम्बे की ceo हाल ही में नियुक्त की गई है। उनको यहां तक पहुंचने के लिए किन – किन संघर्षों का सामना करना पड़ा है, वह एक दिलचस्प पहलू है बॉम्बे बेगमस का और अब इस मुकाम पर बने रहने का भी उनका अपना ही दांवपेच है। पूजा भट्ट ने रानी के किरदार में जान डाल दी है और यह सीरीज इसी किरदार की मजबूती पर खड़ी प्रतीत होती है। बड़ा ही सुलझा हुआ और परिपक्वता से भरा हुआ अभिनय का प्रदर्शन आपको पूजा भट्ट के द्वारा इस किरदार में मिलेगा। इसके बाद आती हैं
फातिमा वारसी (शहाना गोस्वामी) जिनको रानी ने अभी हाल ही में प्रमोशन दिया है, जिसके चलते वह हेड ऑफ प्राइवेट इक्विटी एंड वेंचर की डिप्टी मैनेजिंग डायरेक्टर बन गई है। उसकी जिंदगी की अपनी जंग है। जहां इतना बड़ा पद मिलना एक सपने का सच होना जैसा है, वही दूसरी तरफ व्यक्तिगत जिंदगी पूरी तरह उलझी हुई है। इसी ही बैंक की एक नई सदस्य है आयशा अग्रवाल (प्लबिता बोरठाकूर) जो इंदौर से मुंबई पहुंची है, अपने सपनों को अलग मुकाम देने के लिए लेकिन अपने ही आप में उलझी सी हैं। कुछ चाहती हैं और कुछ करती है, यही उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी विडंबना है यह तीनों किरदार कॉरपोरेट जगत में अपने आप को स्थापित करने के लिए पुरजोर कोशिश लगाते नजर आते हैं। इनसे हटकर जो किरदार है वह है लिली (अमृता सुभाष) का जो जिस्मफरोशी के धंधे में है लेकिन अपने बच्चे को इज्जत की जिंदगी देना चाहती है और उसी के चलते उसकी जिंदगी बाकी तीनों किरदारों से जुड़ती है।
बॉम्बे बेगमस का पांचवा किरदार है रानी की सौतेली बेटी शाय (आध्या आनंद) का जो महज 13 वर्ष की है लेकिन अपनी उम्र से काफी बड़ी है और समझती भी खुद को बड़ा ही है। वह अपने आपको अपने तरीके से परिभाषित करना चाहती है और जीवन को अपनी स्केच बुक में बुनती रहती है। उसी के भावों और मनोदशा को पार्श्व स्वर ( voice over) के रूप में सभी एपिसोडस में प्रयोग किया गया है।

बॉम्बे बेगमस महिलाओं की जिंदगी के काफी पहलुओं को छूने की कोशिश करता है और काफी चीजों को सही तरह से प्रस्तुत भी करता है। जिनमें प्रमुख हैं कॉर्पोरेट जगत में Me too, यहां इसको काफी समझदारी से प्रस्तुत किया गया है और किस तरह यह महिलाओं को अपना शिकार बनाता है वह समझने और देखने योग्य है। एक ही पुरुष किसी के लिए देवता और किसी के लिए दानव का रूप किस प्रकार से हो सकता है यह काफी अच्छे से प्रस्तुत किया गया है।

बॉम्बे बेगमस के कमजोर पक्ष की बात करें तो, यह पुरुष पात्रों के साथ पूर्ण रूप से न्याय नहीं करता जिसके चलते महिलाओं की कहानी का दर्द सही रूप से निखर कर नहीं आता इसी के साथ सेक्स को बहुत ही सामान्य सी चीज प्रस्तुत किया गया है जिसे कोई भी किसी के भी साथ कभी भी कर सकता है।
महिलाओं के आजाद होने या आत्मनिर्भर होने का अर्थ यही तो नहीं है शायद ???
कहीं ना कहीं यह बात खटकती है ।।।
शहाना गोस्वामी का अभिनय अचंभित करता है। इसी के साथ मनीष चौधरी का पूर्ण रूप से प्रयोग ना होना खलता भी है। कुछ किरदारों को उनकी पूर्ण क्षमता तक नहीं प्रयोग किया गया है जिनमें दानिश हुसैन और राहुल बोस प्रमुख हैं।
कुल मिलाकर बॉम्बे बेगमस को देखना बनता है वह आपके सामने काफी सवालों को लाकर खड़ा करती है।
जिनका समाधान सच में जरूरी है …

The Last Color : रंग गुलाबी…

निर्देशक – विकास खन्ना
कलाकार- नीना गुप्ता, अक्सा सद्दीकी,
रूद्राणी छेत्री, असलम शेख
अवधि- 90 मिनट
प्रस्तुतकर्ता- Amazon prime video
⭐⭐⭐🌠 3.5/5
“चांद तो सबके पास होता है लेकिन जिनके दिल खुले होते हैं उनको चांद नजर आते हैं, हाथों के”

है ना कितनी खूबसूरत सी बात और समझने वाली भी

Michelin star Chef विकास खन्ना की फिल्म The Last Colour उसी खूबसूरती के एहसास को आपके अंदर से निकालकर आपके सम्मुख लेकर आती हैै। शर्त यह है कि आप उसे समझने की ओर अग्रसर हो। सरल शब्दों में कहा जाए तो यह फिल्म व्यक्ति के उन मनोभावों को प्रस्तुत करती है जो वास्तविकता में उसकेे अपने होते हैंं या परिस्थिति वश वह जैसा बन गया है यानी उसके चरित्र के भाव… यहां व्यक्ति से मेरा तात्पर्य फ़िल्म के किरदारों से है।
फिल्म वाराणसी की विधवाओं को केंद्र में रखकर बनाई गई है जिसके चलते नूर ( नीना गुप्ता) फिल्म का केंद्र बिंदु है। Chef विकास खन्ना की फिल्म विधवाओं की जिंदगी को रंंगहिन कर उनको सिर्फ और सिर्फ प्रभु भक्ति में अपना बचा हुआ जीवन बिताने की प्राचीन परंपरा को प्रस्तुत करती है, जहां पर उनको होली खेलने तक का अधिकार नहीं था क्योंकि वह भी रंगों का त्योहार है।
फिल्म विधवाओं के साथ-साथ छुआछूत और किन्नरों की व्यथा को भी कुछ हद तक प्रस्तुत करती है। यहां फिल्म के निर्देशक विकास खन्ना की तारीफ सही मायनों में बनती है उन्होंने यह साबित किया है कि जिस प्रकार अच्छे व्यंजन के लिए सभी मसालों का सही अनुपात आवश्यक है, तो उसी प्रकार एक बेहतर फिल्म बनाने के लिए भी सभी तरह के भावों का सही अनुपात अनिवार्य है और वह इस फिल्म में आपको बेहतरीन रूप से देखने को मिलेगा। इसी के साथ फिल्म का हर एक फ्रेम अपने आप में खूबसूरत है, सिनेमैटोग्राफी कमाल की है जिस के चलते बनारस के घाटों और गलियों की सजीवता देखते ही बनती है।
अदाकारी की बात करें तो नीना गुप्ता नूर के किरदार में बड़ी ही सहज और ईमानदार लगी है और उनके चेहरे का नूर सच में देखते ही बनता है इसी के साथ छोटी के किरदार में अक्सा सिद्दीकी ने कमाल कर दिया है। दोनों की केमस्ट्री पर्दे पर काबिले तारीफ है, जिसकी वजह से आपको उनका आत्मीय रिश्ता बहुत ही पाक नजर आएगा। फिल्म में रुद्राणी छेत्री और असलम शेख भी अपनी उपस्थिति दर्ज करानेे में कामयााब रहे हैं।
फिल्म पितृसत्ता के मुद्दे को भी उजागर करती है और इसी के साथ शक्ति का प्रयोग कर लोग किस तरह कमजोर लोगों को दबाने का प्रयास करते हैं, का भी छोंक लगाती है।
यहां यह कहना कदापि अनुचित नहीं होगा कि जिस दिन हम एक इंसान के रूप में अपने दर्द और बाकी सभी प्राणियों के दर्द को समान समझने लग जाएंगे उसी दिन से इस तरह की अमानवीय परंपराएं जो कभी उपजा करती थी वो ना तो कभी उपजती और जो अमानवीय कृत्य होते आ रहे है वह भी कभी जन्म ना लेते किंतु “मेरा है तो ही मुझे दर्द है” इस प्रवृत्ति ने इंसानियत को हर बार अलग-अलग रूप में शर्मसार ही किया है। यह पूर्णतया मेरा दृष्टिकोण है।
फिल्म की बात करें तो वह आपके संवेदना के तारों को अपने सरल और सहज अंदाज में छेड़ती है। जोकि देखे जाने और सराहे जाने के लिए पूर्ण रूप से उपयुक्त है। तो कृपया जरूर देखिए और मुझे अपना पक्ष भी बताइए …😊।